Sunday, April 12, 2026

वैराग्य-बोध (मनहरण घनाक्षरी)

​वैराग्य बोध (मनहरण घनाक्षरी)
​कागज के टुकड़े जो, मिटाते हों दुखड़े तो,
मौत टाल सके रखो, जारी मारा-मारी है।
ये सोना जो कमाया तू , क्या साथ ले जा पाया तू ,
कफन में जेब कहाँ, कब्र आलमारी है।।
साँसें जो उधार की, न रीति समझी यार की,
माया की ये कोठरी तो, जलने की बारी है।
संचय कर हारे जो, न सत्य को विचारे जो,
 'अशोक आकाश' मिट्टी, देह देखो भारी है।। 1 ।। 
​महलों की शान में तू , भूल गया भान में तू , 
खड़ा यमराज देखो, द्वारे पे सवारी है।
सिंहासन छूट जाए, नाता-गोता टूट जाए,ऐसी इस जगत की, रीति ही अनारी है।।
धन ज्ञान दंभ भरे, शक्ति का घमंड करे,
पाप की ये पोटली तो, तूने ही सँवारी है।
अहंकार छोड़ दे तू , नाता प्रभु से जोड़ दे,
'अशोक आकाश' मौत, आनी बारी- बारी है।। 2 ।। 
​नेकी जो कमाई गई, वही तो सहाई होई,
बाकी सब ढोंग यहाँ, दुनिया में जारी है।
स्वार्थ में जो अंधा हुआ, पाप में ही बंधा हुआ,
ईश्वर के पास अब, तेरी जिम्मेदारी है।
मुट्ठी बांधे आया था, न कुछ साथ लाया था,
हाथ पसारके जाना, सबकी लाचारी है। 
मौत पर रिश्ते सभी, काम कोई आये कभी, 
लिखे 'अशोक आकाश' भारी लाचारी है।। 3 ।। 
​रैन का बसेरा यहॉं, नहीं  कुछ तेरा यहॉं,
झूठी सुख-शांति वाली, ये तो होशियारी है।
राम नाम गाता चल, प्रेम रस पाता चल,
सत्य की ये राह देखो, जग से ही न्यारी है।।
काया जो ढलेगी अब, चिता ही जलेगी अब,
पंचतत्व की ये कैसी, अद्भुत चित्रकारी है।
चेत ले रे प्राणी तू, न बन अब ज्ञानी तू,
'अशोक आकाश' अंत, होना ही विदाई है।। 4 ।। 

डॉं.अशोक आकाश
कोहंगाटोला बालोद छत्तीसगढ़... 
9755889199

Thursday, April 2, 2026

मातु भवानी कृपा कीजिये

मातु भवानी कृपा कीजिये
गीत - प्रदीप छंद-16,13 पदांत 212 

मातु भवानी कृपा कीजिये, दो ऐसा वरदान मॉं।
हो अखंड सौभाग्य हमारा, पुलकित रहे जहान मॉं।।

व्रती निर्जला सदा सुहागन, भादो तीज तिहार में।
शिव गौरी पूजन करती हैं, सज सोलह शृंगार में॥
हम सबका सिन्दूर अमर हो, वर दो कृपानिधान मॉं...
हो अखण्ड सौभाग्य हमारा, पुलकित रहे जहान मॉं...

लाली चूड़ी बिंदी चूनर, सिन्दूर लाली से सजूँ।
लाली साड़ी लाल महावर, होठों में लाली रचूँ ॥
जवाकुसुम सी नित लाली हो, दो जीवन सम्मान मॉं ।
हो अखण्ड सौभाग्य हमारा, पुलकित रहे जहान मॉं...

मधुर ध्वनि शुचि वन्दन गाऊँ, मंगल गीत उचारते।
घंटा शंख मृदंग बजाऊँ, माता तुम्हें पुकारते।
फूल कनेर  मदार चढ़ाऊँ, कर लूँ शिव आह्वान मॉं।
हो अखंड सौभाग्य हमारा, पुलकित रहे जहान मॉं॥

*डॉ.अशोक आकाश✍️दिनॉंक-27-8-2025

Thursday, March 26, 2026

विधाता छंद- सदा व्यवहार ही हमको दिखाता आईना ऐसा

विधाता छंद

सदा व्यवहार ही हमको, दिखाता आइना ऐसा। 
इसी से ही हमें मिलती, सफलता प्रशंसा पैसा।।

दुखी करते सुखी जन को,  बिखरता आग मन ढँपकर। 
शिखर का सूर्य भी डूबे, दहककर दर्प से खपकर।। 
करें व्यवहार हम जैसा, मिलेगा हमको भी वैसा। 

सदा व्यवहार ही हमको, दिखाता आइना ऐसा... 
इसी से ही हमें मिलती, सफलता प्रशंसा पैसा... 

जरा सा पा गया जो भी, तनिक आकाश छूलोगे ? 
तुम्हारी हैसियत क्या है, शिखर पे बैठ भूलोगे !! 
कभी गिरकर उठोगे क्या ? न सोचा हो गया वैसा... 

सदा व्यवहार ही हमको, दिखाता आइना ऐसा... 
इसी से ही हमें मिलती, सफलता प्रशंसा पैसा.. 

खुशी तुमको मिलेगी ही, चहक कर बात कर लोगे। 
किसी से प्रेम से बोलो, जगत में राज कर लोगे।। 
नहीं शैतान सा झूमो, रहो इंसान केे जैसा... 

सदा व्यवहार ही हमको, दिखाता आइना ऐसा... 
इसी से ही हमें मिलती, सफलता प्रशंसा पैसा... 
डॉ.अशोक आकाश
बालोद छत्तीसगढ़
9755889199
दिनॉंक 8/11/2025 दिन शनिवार

सुम्मत के अंजोर (छत्तीसगढ़ी कहानी) ​राम्हेपुर गाँव विकास के नव गाथा गढ़त सुन्दर अउ शिक्षित परिवार वाले समृद्ध गॉंव रीहिस। जिहाँ तक नजर परे हरियर-हरियर खेत । ये गॉंव में अमीरी के शान रीहिस त गरीबी के ओतके इज्जत करैया मनखे मनके सहृदयता । ये गॉंव में अब्बड़ सुग्घर एक ठन जुन्ना घर रहिस जेकर नॉंव रीहिस शिवा सुमन निवास। ये घर शर्मा परिवार के रहिस, जिहाँ तीन पीढ़ी के मन एक संग रहत रहिन – शिवा शर्मा ओकर बाई सुमन शर्मा, ओखर बेटा रविन्द्र, बहू प्रियंका अउ आठ साल के नाती अर्पण। ये घर म हँसी-खुशी के माहौल रहिस, फेर कुछ दिन ले एमा दरार आवन लगिस । रविन्द्र अउ प्रियंका के बीच छोटे-छोटे बात म झगरा होवन लगिस, अउ ओखर मन के कड़वाहट धीरे-धीरे पूरा घर ला अपन चपेट म लेवत रहिस। दादाजी जऊन शांत स्वभाव के रहिन, ए सब ला देख के बहुत दुखी रहिन, फेर ओखर मन ला समझ नइ आवत रहिस कि का करँव। ​एक साँझ, रविन्द्र अउ प्रियंका कोनो बात बर फेर लड़ाई होवत रीहिस। अर्पण अपन दाई-ददा ला लड़त देखत रहिस, ओला बहुत खराब लागत रहिस। ओ अपन दादाजी करा गिस, जऊन बाहिर के बरामदा म बइठ के सुरुज ला बूड़त देखत रीहिस । अर्पण ओखर ले पूछिस- "दादाजी, दाई-ददा हमेशा काबर लड़थे? का हमर घर टूट जाही ?" ​दादाजी अर्पण के मुड़ म हाथ फेरिस अउ गहिर साँस लिस- "नइ रे मोर बेटा, हमर घर नइ टूटे, कभू-कभू मनखे एक-दूसर ले कोनो बात के असहमति में लड़ भले जाथे, फेर मया हमेशा ओला वापिस ले आथे।" ​अगला दिन, दादाजी एक अनोखा तरीका अपनाइस, ओ रविन्द्र अउ प्रियंका दुनों ले कहिस कि ओला घर म कुछ बदलाव करना हे। ओ कहिस, "मैं चाहत हँव कि तुमन दुनों एक-एक ठन जुन्ना चीज चुनौ, जौन बेकार हे, जऊन ला तुमन घर ले निकालना चाहत हव, अउ फेर एक-एक ठन नवा चीज चुनौ जऊन ला तुमन घर म लाना चाहत हव।" रविन्द्र अउ प्रियंका पहिली तो हैरान होइन, फेर दादाजी के कहे मँ ओ मन मानगे। ​रविन्द्र अपन जुन्ना स्टडी रूम मँ परे, एक ठन टूटे कुर्सी ला निकाले के फैसला करिस, जऊन ओला हमेशा ओखर लंगड़ा होय के सुरता देवावत रहिस, जब रविन्द्र के पौर साल एक्सीडेंट में गोड़ टूटगे रीहिस, बहुत ईलाज के बाद ठीक होय रीहिस, फेर ये पीरा आज भी वो टुटहा कुर्सी ल देख के सुरता आ जावत रीहिस। दादाजी ओ ला बढ़ई करा लेगके बनवा के ले आनिस। प्रियंका रसोई ले एक ठन फूलकॉंस के जुन्ना अउ सुन्दर लोटा निकालिस, जेकर पेंदा में छेदा होगे रीहिस अउ ओला ओखर खराब मूड के सुरता देवावत रिहिस, दादा जी ओला कसेर करा लेगके टपरवा के ले आनिस, अउ बेटा बहू दूनो ला समझावत कीहिस--"घर हा सुम्मत के रद्दा में रेंगके ही स्वर्ग बन सकथे बेटा, जब कोनो जिनीस टूट फूट जथे त ओला टपरवा देबो या बदल देबो, लेकिन जब कोनो रिश्ता में दरार आथे त ओला टपरे के एके तरीका हे, एक दूसरा के प्रति विश्वास, धीरज अउ संयम के साथ एक दूसरा ला समझना अउ एक दूसरा के सहयोग करना। जीवन के सफर बहुत लम्बा हे बेटा, लड़त रहिबो त ये डोंगा बूड़ जही । जब जिनगी के नैया पार करना हे त सहयोग अउ मया के पतवार चाही, एला कभू नई छोड़ना हे, अउ न कभू टूटन देना हे। ​अब नवा चीज लाने के बारी रहिस । दादाजी सुझाव दिस कि ओ दुनों मिल के कुछ अइसे चुनव जऊन पूरा परिवार बर होय। बहुत सोचे के बाद, रविन्द्र सुझाव दिस कि एक ठन नवा बड़े डाइनिंग टेबल खरीदन, ताकि सबे झन संग बइठ के खाना खा सकन, प्रियंका सहमति जतइस, अउ कहिस कि हमन टेबल के ऊपर एक ठन सुग्घर झूमर घलो लगा सकत हन, ताकि घर म अंजोर अउ खुशी आए। ​जब नवा डाइनिंग टेबल अउ झूमर आगे, त पूरा घर के माहौल बदलगे । ओ मन सबो अब संग बइठ के खाना खावय त उही फुलकँसहा लोटा मँ पानी पीययँ अउ कुर्सी में बैठत रहिन। उदसहा घर में अब सुम्मत के अंजोर बगरगे रीहिस। रविन्द्र अउ प्रियंका अउ घर के सबे सदस्य हँसी खुशी घरू काम में एक दूसर के मदद करे लगिन। झूमर के अंजोर मँ ओखर घर पहिली ले ज्यादा सुग्घर शांत अउ अंजोर दिखत रिहिस। ​एक दिन, खाना खावत खानी दादाजी रविन्द्र ले कहिस, "देख बेटा, ये घर ईंटा अउ सीमेंट ले नइ बनय, ये मया अउ समझदारी ले बनथे। जब कोनो चीज टूटथे, त ओला फेंके के बजाय, सुधारे के कोसिस करना चाही। ऐसने कई बेर एक दूसर के विचार नई मिले से टकराव के स्थिति आ जथे, ऐसन बेरा में एक दूसरा के सम्मान करत सबे झन ला स्थिति के अनुरूप शांति से काम लेना चाही। तभे तो सुम्मत के अंजोर ले नानचुन घर हा घलो घर स्वर्ग बन जथे। " डॉ.अशोक आकाश ग्रा लोद 9755889199

  

नवम सिद्धिदात्री मैया

नवम दिवस माईं, सिद्धिदात्री सुखदायी, 
साधक बाधा मिटाने, आई झकझोर के। 
चक्र गदा धनु शंख, धारी पूजे राजा रंक, 
फूल धूप दीप संग, नारियल फोड़ के ।। 
उलट पुलट करे, दुष्ट जो गलत करे, 
विनाश संकट करे, पल में निहोर के। 
अशोक आकाश लिखे, चरणों में जो भी झुके, 
मैया जी को देख मिटे, पीरा पोर पोर के।। 
सृजन दिनॉंक
18/12/2025

मनहरण घनाक्षरी - षष्ठम कात्यायिनी

षष्ठम दिवस मुनि, कात्यायिनी कन्या गुनि, 
दावन दलन धुनि, जग में जलाती है। 
खूंखार सिंह सवार, लाल वस्त्र भुजा चार, 
शहद पी हलवा खा, अहम पचाती है।। 
एक हाथ तलवार, दूसरे कमल धार, तीसरा अभय चौथा, वर मुद्रा छाती है। 
अशोक आकाश कहे, जो देवी शरण रहे, 
संकट विवाह बाधा, पल में भगाती है।। 
सृजन दिनॉंक
13/11/2025

मनहरण घनाक्षरी - पंचम स्कंध माता

पंचम दिवस माईं, द्वार स्कंध माता आई, 
कमल सिंहासन मे, देवी जी विराज के। 
भवानी मैया जी लक्ष, असुर संहार दक्ष, 
विषधर नाग भक्ष, धारे रूप बाज के।। 
ममता मूरत भूप, करुणा वात्सल्य रूप, 
पूजे वो न गिरे कूप, सूनो पूत आज के।
सर्व दुख निवारिणी, स्नेह रूप धारिणी हे, 
अशोक आकाश मातु, धारे धर्म साज के।।
सृजन दिनॉंक
29/9/2025 

मनहरण घनाक्षरी- चतुर्थ कुष्मांडा

चतुर्थ दिवस न्यारी, कुष्माण्डा मैया जी प्यारी, 
अमृत कलश हाथ, लिये जग आती है। 
शूल पुष्प शंख धरे, बाघ की सवारी करे, 
भयातुर भगतों को, अभय दिलाती है।। 
दूध मखाना मॉं हिय, लागे अतिशय प्रिय, 
दुखी भगतों की टोली, चैन से सुलाती है। 
अशोक आकाश लेख, निशिचर वृंद देख,
मैया होती क्रुद्ध और, युद्ध को बुलाती है।। सृजन दिनॉंक
21/10/2025

घनाक्षरी- तृतीय चन्द्रघण्टा

तृतीय दिवस मात, चन्द्रघण्टा रौद्रगात, 
असुर संहार करे, बहे वीर धार है। 
शक्ति समृद्धि प्रतीक, सिंह में विराजे निक, 
महिषासुर वध कर, हरे भुईं भार है।। 
कमल का फूल चढ़े, चामुण्डाय विच्चे पढ़े, 
नवारण मंत्र शक्ति, अपरम्पार है। 
अशोक आकाश कहे, तप बल संयम से, 
मातु का आह्वान करो, हुआ बेड़ा पार है।। 

सृजन दिनॉंक 
23 सितंबर 2025

घनाक्षरी- द्वितीय ब्रह्मचारिणी

द्वितीय दिवस भूप, दुर्गा जी धारे अनूप, 
द्वैत अद्वितीय रूप, माता ब्रह्मचारिणी। 
निर्मल ज्ञान स्वरूप, देखे वो गिरे न कूप, 
अखण्ड तपस्विनी है, पूज्य भय हारिणी।। 
धवल वसन धार, गल रुद्रअक्ष हार, 
मस्तक त्रिपुण्ड सार, भगत उद्धारिणी। 
कर में कमंडल धरे, मुख मुस्कान भरे, 
अशोक आकाश कहे, संकट निवारिणी।।
 
सृजन दिनॉंक
23 सितंबर 2026


घनाक्षरी- प्रथम शैलपुत्री

प्रथम दिवस प्रात, मातु शैलपुत्री आत, 
बाल वृद्ध युवजन, भावे नवरात है। 
दुर्गा अवतार धरे, भगत उद्धार करे, 
जगत कल्याण नव रूप सिरजात है।। 
चन्द्र दोष हरन को, सुख शॉंति करन को, 
सर्व भ्रांति टारन को, भक्त गुण गात है। 
अशोक आकाश कहे, जो भी त्रय ताप सहे, 
मातु पूजो शैल सम, दुख टर जात है।। 
सृजन दिवस
23 सितंबर 2025

Wednesday, March 25, 2026

अष्टम महागौरी

अष्टम दिवस दौड़ी, डग आती पौड़ी पौड़ी, 
जगदम्बा महागौरी, पग छाप छोड़ती। 
श्वेताम्बरी वृषारूढ़ी, चतुर्भूजी ज्ञान गूढ़ी, 
महादेवी चन्द्रचूढ़ी, ललन बगोड़ती।। 
राहू ग्रह शासक मॉं, दीनों के उपासक मॉं, 
कन्या रूप तारक मॉं, भगत निहोरती। 
अशोक आकाश दास, बैठे चरणों के पास,
महाप्रलयंकारी मॉं, दुख धारा मोड़ती।। 
सृजन दिनॉंक
23/11/2025

घनाक्षरी - सप्तम कालरात्रि

सप्तम दिवस मातृ, उग्र रूप कालरात्रि, 
महाप्रलय प्रदात्रि, कालों के भी काल है। 
गर्दभ वाहन चढ़े, त्रिनेत्रों में ज्वाला भरे, 
भजो शुभंकरी माता, रूप विकराल है।। 
बिखराये जटा जूट, चीख चीख अवधूत, 
नाचे नटराज संग, अनहद ताल है। 
अशोक आकाश कहे, संकट अपार ढहे, 
नेहामिय धार बहे, सुमिरन ढाल है।। 
सृजन दिनॉंक
21/11/2025

Monday, March 23, 2026

हजारी लाल के ऑंसू (छत्तीसगढ़ी कहानी)

"हजारी लाल के ऑंसू"  छत्तीसगढ़ी कहानी 


    हजारी लाल जैसने अपन घर ले बाहिर गोड़ मड़ाईस, परोसी मन घूर-घूर के देखे लगीस। परोन दिन बिहनिया ओकर बेटा शोभित ला पुलिस ऊपर पथरा फेंके के जुलुम में गिरफ्तार करे गे रीहिस। नेता अफसर मन के दिन भर चक्कर काटे के बाद भी शोभित ला घर लाय के कोनो जुगाड़ नइ जमीस। ओकर ऊपर दंगा भड़काय, शासकीय काम में बाधा डाले अउ आतंक मचाय के धारा लगादीस। पारा के सबे मनखे मन ईंकर परिवार के मेहनत अउ तरक्की ला देख के अब्बड़ जलन भाव राखय। एकर सेती ये मन ला दुखी देखके, ओ मन ला पहिली बेर सुख के अनुभति होईस। 
      हजारी लाल अउ ओकर बाई मोना दिन रात इहॉं ले उहॉं घूम-घूमके थकगे, ओकर बदन करियागे, मुहूँ सुटकगे रीहस फेर ओकर दुलरवा बेटा ला छोड़ाय के कोनो जुगाड़ नइ जमिस, न दिन में आराम न रात में नींद। 
इही तो दुनिया आय, मुसीबत में घिरे मनखे के सहारा बने ला छोड़ के ओकर मजबूरी के लाभ उठैया कतको हे। बखत के मार हा बड़े - बड़े बलशाली ला कोकराके मड़ियाय ल मजबूर कर देथे। शोभित प्रजातंत्र के चौथा स्तम्भ पत्रकारिता के क्षेत्र में ईमानदारी से काम करत रीहिस। ओहा जानत रीहिस कि जीवन कैसे जीना हे, का अच्छा हे का बुरा हे। ओकर बचपन के एक दू झन संगवारी मन मंदहा होगे रीहिसे, महतारी मोना के कतको रोक टोक के बाद भी ऊँकर दोस्ती नई छूट सकिस। गलत संगति के सजा अच्छा मनखे ला घलो भुगते ला पर जथे। बेरा के पटकनी में शोभित के उज्जर जिनगी में फोकटे फोकट दाग लगगे। 
ठोकर जीवन के पाठशाला हरे, कुछ मनखे ठोकर खाके सम्हल जथे अउ सुधर जथे, कुछ मनखे मन नवॉं तरीका ले अपडेट होके फेर उही रद्दा में चल पड़थे त कुछ मनखे के जिनगी के दिशा बदल जथे। शोभित हा पत्रकारिता के माध्यम ले सच ला जनता के आगू लाके, भ्रष्टाचारी मन ला एकक करके लाईन में खड़े कर दे रीहिस। एकर सेती शोभित के पॉंव पुट दुश्मन बन गे रीहिस। 
        
​शोभित ह "प्रजातंत्र के चौथा स्तंभ" के मर्यादा निभात, शहर म बनत एक बड़े सरकारी पुल के भ्रष्टाचार के भंडाफोड़ कर दे रीहिस। ओहा अपन रिपोर्ट म सप्रमाण देखाय रीहिस कि कैसे नेता अउ बड़े अफसर मन मिलके घटिया निर्माण सामग्री के प्रयोग करत हें, जेकर सेती कतको मनखे मन के जान ला खतरा हे।
शहर म उही पुल के पास जनता ह विरोध प्रदर्शन करत रीहिस। मंदहा संगवारी मनके उभरौनी में शोभित उहॉं केवल एक पत्रकार के नाते सच ला रिकार्ड करे बर गे रीहिस। अचानक भीड़ म कुछ "भाड़ा के गुंडा" मन घुँसगे, जे मन ला उही भ्रष्टाचारी नेता मन भेजे रीहिन। जइसे ही पुलिस ह भीड़ ला तितर-बितर करे के कोशिश करिस, उही गुंडा मन पुलिस ऊपर पथरा फेंके बर शुरू कर दीस। तब जवाब में शोभित के मंदहा संगवारी मन तक पथरा चला दे रीहिन। शोभित ह अपन कैमरा म ऊँकर मन के चेहरा कैद कर ले रीहिस, जे मन असल म पथरा फेंकत रीहिन त ओकर कैमरा ला छीने बर पुलिस के भेस म कुछ मनखे ओकर ऊपर टूट पड़िन।
​शोभित ह अपन कैमरा ला बचाए बर जब संघर्ष करिस, त ओला "शासकीय काम म रुकावट" अउ "पुलिस ऊपर हमला" के झूठा आरोप में फँसा दीस। ओकर ऊपर पुलिस ऊपर पथरा फेंके, भीड़ ला उकसायके, सरकारी काम में बाधा डारे के झूठ मूठ आरोप लगादीन ताकि दुनिया ला ये लगे कि एक पत्रकार ह दंगा भड़कावत हे।
​हजारी लाल जब जेल म शोभित ले मिलिस, त ओकर ऑंखी म आँसू रीहिस। शोभित ह सिसकत कहिस-
​"बाबू, मैं हाथ म कलम एकर बर धरेंव कि मैं सच लिख सकँव, फेर ये भ्रष्ट तंत्र ह मुहीं ला अपराधी बना दीस।  मैं पुलिस ऊपर पथरा नइ फेंके हौं, मैं तो ओ मनखे मन के चेहरा ला दुनिया ला देखाना चाहत रहेंव, जे मन आम जनता के हक नँगावत हें।"
​हजारी लाल ला अब समझ आइस कि शोभित ला ओकर ईमानदारी के सजा मिले हे। शोभित ह भ्रष्टाचारी मन के ऑंखी के किरकिरी बन गे रीहिस, जेकर सेती ओ मन ओला अपराधी साबित करे म लगगे रीहिन।


​हजारी लाल जैसे ही अपन घर के ओसारी ले बाहिर गोड़ मड़ाईस, आगू चउपाल म बइठे परोसी गजाधर अउ बिदेसी जेन ह मंत्री के चापलूस कार्यकर्ता रीहिन तौन मन एक-दूसर कोती देखके मुस्कुराइन। गजाधर ह जोर से सुनावत कहिस—
​"का होगे हजारी भाई? बड़े जोर-सोर ले बेटा ला पढ़ा-लिखा के पत्रकार बनाये रेहे, अब तो ओहा 'बड़का नाम' कमा लीस! पेपर म ओकर फोटो छपे हे, फेर हाथ म कलम नइ, पथरा हे। अब बताव पुलिस ऊपर हमला करना अउ दंगा भड़काना ही तुहर संस्कार आय का?"
​बिदेसी ह घलो बहती गंगा म हाथ धोवत कहिस— "सही कहत हस गजाधर, अतका घमंड रीहिस एकर परिवार ला अपन तरक्की ऊपर। देख ले, भगवान के घर म अंधेर नइ हे। अइसने औलाद ले त निसंतान रहना अच्छा हे, जेकर सेती कुल म दाग लग जाय।"
​हजारी लाल के भीतर जैसे कोनो ज्वालामुखी फूट पड़े रीहिस। ओकर बदन गुस्सा अउ दुख ले कांपे लगीस। ओहा थिरकत आवाज संग कड़ा स्वर म कहिस - ​"चुप रहा बिदेसी! अउ तहूँ चुप रा गजाधर! तुमन ला का लगथे कि मोर शोभित अपराधी आय? जेन लइका ह रद्दा म गिरत मनखे ला देख के हॉंसे नहीं, तुरत उठाय बर दौड़ पड़थे, कोनो चहकत चिरई मन ला कभू नइ मारिस, ऊँकर चहकन भरे आजाद जिंदगी में अपन मन के खुशी देखथे। ओहा कभू पुलिस ऊपर पथरा फेंकही? दुशमनी करैया, जलन मरैया मनखे संग हॉंस के गोठियाथे मोर बेटा हा। तुमन तो ओकर मेहनत ले जरत रहेव, एकर सेती आज तुमन ला सुख मिलत हे। फेर सुरता राखहू शोभित के हाथ म पुलिस ह जबरदस्ती के आरोप लगायहे, काबर कि ओकर कलम ह तुँहर चहेता नेता मन के भ्रष्टाचार के पोल खोलत रीहिस।"
​हजारी लाल के ऑंखी ले अंगारा बरसत रीहिस। ओहा आगू कहिस - ​" का सच्चाई ला कालिख पोत के लुकाये जा सकथे, अउ कतक दिन ले? आज मोर बेटा के उज्जर जिनगी में दाग लगादीन बेईमान मन, फेर मोर अंतरात्मा काहत हे कि मोर बेटा निर्दोष हे। तुमन ला तमाशा देखे म मजा आवत हे न? देख लेव... फेर जब सच बाहिर आही, त तुमन अपन मूंह लुकाये बर जगा नइ पाहू।"
​अतका कहिके हजारी लाल हफरगे, मोना ह भीतर ले दौड़ के आइस अउ हजारी के हाथ ला धरके सम्हाल लिस। परोसी मन ह हजारी के अइसे उग्र रूप ला देख के सन्न रहिगे। हजारी लाल के ऑंखी म आँसू अउ गुस्सा के अइसे संगम रीहिस कि सकलाय दसों मनखे मनके बोले के हिम्मत नइ होइस।

       हजारी लाल के गोड़ ह भारी होगे रीहिस, मानो कोनो ओकर गोड़ म मन भर के सांकर बांध दे होही। परोसी मन के खुसुर-फुसुर अउ ओकर तिरछी नजर ह ओला बाण कस चुभत रीहिस। जेन मनखे काली तक शोभित ला "गाँव के गौरव" कहत थकें नइ, आज उही मन ओला "आतंकवादी" कहे बर तइयार बइठे रीहिन।
​हजारी लाल ह कछेरी के सीढ़ी चढ़त-चढ़त थक गे रीहिस। ओकर ऑंखी के आँसू ह घलो अब सूख के पथरा होगे रीहिस। वकील मन के फीस अउ दलाल मन के दलाली म ओकर घर के गहना-गूँठा सब बेंचागे। फेर शोभित जेल के करिया कोठी ले नइ निकल पईस। ​हजारी लाल जब जेल के भारी लोहा के दरवाजा तीर पहुँचिस, त ओकर भेंट जेल के संतरी बचपन के संगवारी भोला ले होईस। भोला के ऑंखी म कोनो दया भाव नई रीहिस, बस एक लालच के चमक रीहिस। हजारी लाल ह हाथ जोड़ के बिनती करिस, "भोला भाई, मोर लइका शोभित ले एक बेर मिला दे।"
​भोला ह तिरछी नजर ले देखिस अउ खैनी थूँकत कहिस, "अतका अराम ले नई मिले हजारी। ये जेल आय, इहॉं हवा घलो बिना कीमत के नई मिले। अउ तोर बेटा ऊपर तो 'आतंक' के धारा लगे हे।"
​उही मेर एक दूसर संतरी बंधू घलो आ गे। ओहा धीरे से हजारी लाल ला बाजू म ले जाके फुसफुसाइस, "देख हजारी, हमर साहब मन ला खुश करना पड़थे। जेल के भीतर अपराधी मन ला बीड़ी, सिगरेट, दारू अउ मोबाइल रिचार्ज तक के बेवस्था हो जाथे, फेर एकर बदला मोटा रकम लगथे अगर तोर बेटा ला बिना मार-पीट के अराम से रखना हे, त 'खर्चा-पानी' के इंतजाम कर।"
​हजारी लाल सन्न रह गे। ओहा सोचिस—बाहिर नेता मन भ्रष्टाचार करत हें अउ ये रक्षक मन भक्षक बने हें। बंधू ह आगू कहिस, "जेन मनखे मन ह शोभित ला फँसाए हे, ओ मन हम ला पैसा दे हे, ओला तंग करे बर। अब अगर तूमन शोभित ला बचाना चाहत हव, त ओकर ले दोगुना रकम देना पड़ही।"
​हजारी लाल के ऑंखी ले टपटप आँसू गिरे लगीस। ओकर मन म हूक उठीस— 'मोला काय मालूम रीहिस भगवान कि न्याय के मंदिर कहे जाने वाले ये जगह म ईमानदारी के नीलामी होथे।'
​शोभित ले मिले बर भोला अउ बंधू ह हजारी लाल ले ओकर हटहा अंगूठी अउ गॉंठ म बंधाय आखिरी के पाँच सौ रूपया घलो झपट लीन। जब हजारी लाल ह शोभित ला देखिस, त ओकर कलेजा फटे कस होगे। शोभित एक कोना म डर्राय दुबके बइठे रीहिस, धीरे से कहिस, "बाबू, इहॉं सबे जिनिस बिकाऊ हे। संतरी मन मोला मोबाइल में बात करे बर कहत रीहिन ताकि मैं तुँहर मन करा फोन लगाके अउ पैसा मंगा सकौं, फेर मैं मना कर देंव। बाबू, ये मन मोला तोड़ना चाहत हें।"
​हजारी लाल ह अपन बेटा के काँपत हाथ ला थामिस अउ संतरी मन कोती देखिस, जेन मन दूरिहा में खड़े होके अइसे हॉंसत रीहिन मानो कोनो शिकार ला फँसा ले हें। हजारी लाल ला समझ आगे कि ये लड़ाई सिर्फ कानून ले नई, बल्कि ये सड़े हुए तंत्र ले घलो हे।
         कोनो मनखे राहय मुसीबत के बेरा सबके मति छिंही-बिंही हो जथे, का करँव काकर करा जाके गोहराँव, कुछू समझ नइ आय। हजारी लाल कोनो बड़ा रहीश नइ रीहिस जे अपन खजाना खोलके लइका ला नियॉंव देवा सकय। ऐसन में ओला अपन बचपना के संगवारी अजीत के सुरता आईस, नवॉंपारा महामाईं मंदिर के पाछू किराया के घर में रहिके न्याय के मंदिर के सेवा करथे, ओकर सहयोगी ममता अउ भारती दूनो के दूनो कई ठन गंभीर मामला ला आसानी से निपटाय हवे। हजारी लाल के मन में जइसे एक आस के दीया जर उठिस। जब दुनिया के रद्दा बंद हो जाथे, तब पुराना संगवारी के सुरता अइसने आथे, जइसे अंधियारी रात में ध्रुव तारा।
      हजारी लाल ह तेवर मंझनिया अपन थके जॉंगर ला घसीटत नवापारा महामाईं मंदिर के पाछू पहुँचिस। उहॉं टीन छानी के साधारण घर के बाहिर बोर्ड टंगे रीहिस— "न्याय अउ सेवा केंद्र"। खिड़की में लगे गुलाबी परदा भीतर ले गोठियाय के आवाज आवत रीहिस।
​हजारी लाल ह थरथरात आवाज लगाईस, "अजीत... ओ अजीत भाई?"
​अंदर ले एक मनखे ह बाहर निकलिस, ओकर चेहरा म सादगी अउ ऑंखी म न्याय के चमक रीहिस। ओकर संग म ममता अउ भारती घलो आईन, वो मन फाइल अउ कानूनी सलाह वाले कागजात धरे रीहिन।
​अजीत ह हजारी लाल ला देखिस त ओकर चेहरा म अचंभा आ गे। "हजारी? तैं ? ये का हाल बना डारे हस?"
​हजारी लाल ह ओकर गोड़ म गिर गे अउ फफक-फफक के रोए लगीस। "अजीत, मैं उजरगे हौं। मोर शोभित... मोर दुलरवा बेटा ला 'दंगाबाज' बना के जेल म डाल दे हें। पुलिस-प्रशासन, संतरी-मंत्री सब ओकर पीछे पड़गे हे। मोला कोनो रद्दा नइ मिलत हे।"
अजीत तुरते उठाइस ​ममता ह पानी पियाइस। भारती ह ओकर बात ला ध्यान से सुनत रहीस अउ झटपट पेन उठा के लिखत रहीस।
​अजीत ह हजारी लाल के खांध में हाथ मड़ाके कहिस, "हजारी, बिपत के बेरा में कोनो मनखे के ताकत नहीं, ओकर हिम्मत हा साथ देथे, में रोवत बर हस? हिम्मत रख हमर जवानी के दोस्ती कभू हार मानय? हम न्याय के मंदिर के सेवा करथन, अउ जब तक हमर कलम चलत हे, तब तक कोनो बेकसूर ला जेल म सड़न नइ देन।"
​ममता ह ओकर तरफ देख के कहिस, "हजारी कका, घबरा झन। हमन सुनत अउ पढ़त हन कि शोभित ह भ्रष्टाचार के कोनो बहुत बड़े राज ला उजागर करे बर चाहत रीहिस। ओही राज के डर ले ओला फंसाए गे हे।"
अजीत का सबे मामला ला पूछतगीस हजारी बतावतगीस त भारती ह ओकर फाइल म शोभित के केस के सारा विवरण लिख लीस। सबे मामला ला समझके ममता के मंता भोगागे वो भड़क के कीहिस "कका, ये जेल के संतरी भोला अउ बंधू के भ्रष्टाचार के जतेक सबूत हे, ओकर जमा-जोखा हमन करबो। ईंकर मन के 'मोटा रकम' मांगे के खेल ला हमन मुख्यमंत्री के जनदर्शन अउ बड़े अधिकारी तक पहुंचाबो।"
​हजारी लाल ला लागिस जइसे ओला कोनो संजीवनी मिल गे हे। अजीत ह ओला भरोसा दिलाइस, "तें चिंता झन कर। आज के रात हमन योजना बनाबो। कल जब तें फेर जेल जाबे, तब शोभित ला कहिबे कि ओकर डरे के कोनो जरूरत नइ हे। शेर के बच्चा हे ओहा, शेर कस बाहर आही।"


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        ​हजारी लाल ओकर संगवारी अजीत, ममता अउ भारती जेल के गेट के आगू खड़ें रिहिन। आज ओ मन के हाथ म न्यायालय के वो आदेश रीहिस, जेकर बर हजारी लाल ह अपन जीवन के सब ले बड़े संघर्ष करे रीहिस। शोभित के बेकसूर होय के प्रमाण मिल गे रीहिस, अउ ओकर रिहाई के हुकुम हो गे रीहिस।
​हजारी लाल के धड़कन बढ़त जात रीहिस। ओकर मन म एक आस रीहिस— 'अपन बेटा ला फेर देखूं, ओकर हाथ ला थाम के घर ले जाहूं।'
​जेल के भीतर के आखिरी दृश्य
​जेल के भीतर संतरी भोला अउ बंधू के चेहरा आज उतरी गे रीहिस, काबर कि गिरिराज अउ मंटू के स्टिंग ऑपरेशन ह ओ मन के कमर तोड़ दे रीहिस। जब हजारी लाल शोभित के कोठरी म पहुँचे, त शोभित ह दीवाल ला टेक के बइठे रीहिस। ओकर देह म जगह-जगह जखम के निसान रीहिस।
​हजारी लाल ह दौड़ के ओला गोदी म उठा लीस, "बेटा शोभित! देख, ददा आ गे हे। तूं अब आजाद हस, कोनो तोर बाल घलो बांका नइ कर सकय।"
​शोभित ह अपन ददा के कांधा म सिर रखिस। ओकर सांस ह उखड़त रीहिस, फेर ओकर चेहरा म एक संतोष के भाव रीहिस। ओहा थथरावत आवाज म कहिस— "ददा, मोला रिहाई के दरकार अब नइ हे। ये जेल के कोठरी म ये मन मोर देह ला त तोड़ डारिन, फेर मोर कलम ला नइ तोड़ पाइन। भोला अउ बंधू ह मोला बीड़ी-सिगरेट के लालच देके घूस ले बर मजबूर करत रिहिन, अउ नेता मन के इसारा म मोर ऊपर टार्चर करिन... ददा, मैं सच ला देख के मरत हौं, इही मोर सबसे बड़े जीत आय।"
​इतका कहत-कहत शोभित के प्राण ह ओकर ददा के गोदी म ही पखेरू कस उड़ गे। हजारी लाल के चित्कार ले जेल के दीवार मन घलो कांप उठिन।
​एक महान फैसला
​हजारी लाल के ऑंखी ह अब पथरा गे रीहिस। ओकर बेटा ह त मर गे रीहिस, फेर ओकर ऑंखी म अभी घलो वो चमक रीहिस, जेमा दुनिया ला सही रद्दा देखे के ताकत रीहिस। मोना (ददा के साथी) ह कांपत हाथ ले ओकर ऑंखी ला देखिस।
​हजारी लाल ह भारी मन ले कहिस, "शोभित ह हमेशा सच के पहरेदार बन के जिये हे। आज ओकर देह नइ हे, फेर ओकर ऑंखी मन तो ये दुनिया म रहिहीं। ये ऑंखी मन वो भ्रष्टाचारी मन ला देखिहीं, जे मन आज भी खुल्लम-खुल्ला घूमत हें।"
​अजीत ह आगे बढ़ के कहिस, "हजारी काका, तुमन आज एक महान काम करत हव। शोभित के ऑंखी ला दान कर देबो, त ओहा फेर से कोनो अइसे लइका के रूप म देखिही, जेन ह न्याय बर लड़ही।"
​जेल के गेट ले बाहर निकरत हजारी लाल के हाथ म शोभित के देह नइ, ओकर अमर विचार रीहिस। शहर भर म शोभित के बलिदान के चर्चा रीहिस। कतको दिन बाद, अस्पताल ले खबर आइस कि शोभित के ऑंखी ला एक गरीब लइका ला लगाय गे हे।
​आज जब हजारी लाल वो लइका ला देखथे, त ओला लागथे कि शोभित फेर लौट के आ गे हे। वो लइका के ऑंखी म हजारी लाल ला शोभित के ओ ईमानदारी अउ ओकर "ऑंखी" के तेज दिखथे। हजारी लाल के अब कोनो दुख नइ रीहिस, ओला लागिस कि ओकर बेटा कभू नइ मरिस—ओहा त अब एक नइ, बल्कि हज़ारों ऑंखी बन के सच ला देखत हे।
​सीख:
​"सच ला दबाए बर कतको कोशिश कर लेव, फेर सच ह कोनो न कोनो रूप म सामने आके ही रहिथे। मनखे मर जाथे, फेर ओकर देखे के नजरिया अउ ओकर विचार अमर रहिथे।"
​हजारी लाल के गोड़ ह भारी होगे रीहिस, मानों कोनो ओकर पॉंव म मन भर के सांकर बांध दीस होही। परोसी मन के खुसुर-फुसुर अउ ओकर तिरछी नजर ह ओला बाण कस चुभत रीहिस। जेन मनखे कल तक शोभित ला "गांव के गौरव" कहत थकें नइ, आज उही मन ओला "आतंकवादी" कहे बर तइयार बइठे रीहिन।
​हजारी लाल ह कचहरी के सीढ़ी चढ़त-चढ़त थक गे रीहिस। ओकर ऑंखी के आंसू ह घलो अब सूख के पथरा होगे रीहिस। वकील मन के फीस अउ दलाल मन के दलाली म ओकर घर के गहना-गुंठा सब बिक गे। फेरह शोभित? ओहा त जेल के करिया कोठरी म बंद रीहिस।
​ओ काल राति
​एक दिन खबर आइस कि शोभित ला अस्पताल ले जाए गे हे। हजारी लाल अउ मोना पागुल कस अस्पताल कोति दौड़िन। पुलिस के कड़ा पहरा रीहिस। जब हजारी लाल ह भीतर जाके देखिस, त ओकर परान ह उही मेर थम गे। शोभित के देह म नील के निसान रीहिस, मानों ओला कोनो बेरहम मनखे ह नइ, बल्कि कोनो जंगली जानवर ह नोच डारे होवय। ओकर पत्रकारिता के धरम ह आज ओकर सजा बन गे रीहिस।
​शोभित ह धीरे से अपन ऑंखी खोलिस। ओकर ऑंखी म आंसू नइ, बल्कि एक अजब किसम के चमक रीहिस। ओहा थथरावत आवाज म कहिस— "ददा, मै पथरा नइ फेंके हौं... मै त बस भ्रष्टाचार के करिया मूंह ला उज्जर करत रेहेंव।"
​मर्मस्पर्शी मोड़
​हजारी लाल ह शोभित के हाथ ला थामिस, फेर शोभित के सांस ह उही बखत ओकर साथ छोड़ दीस। हजारी लाल के दुनिया उजर गे। पारा-परोसी मन जेन मन तमाशा देखत रीहिन, शोभित के मौत के खबर सुनके सन्न रह गे।
​फेर कहानी म असली मोड़ तब आइस जब शोभित के अंतिम संस्कार के तैयारी के पहिली शोभित के पत्रकार संगवारी मंटू हा हजारी लाल ला बताईस कि जब वोहा शोभित ला देखे हर जेल गे रीहिस त ओ हा केहे रीहिस " ध्यान लगा के सुन मंटू भाई, ददा ला बता देबे अगर मोला कुछू कहीं हो जाही, त रोवय झन। मोर ऑंखी ला दान करवा देबे, ताकि मोर मरे के बाद भी ये दुनिया म सच ला देखे बर कोनो के ऑंखी में जीयत राहँव।"


​हजारी लाल ह अपन बेटा के आखिरी इच्छा पूरा करिस। शोभित के ऑंखी ला दान कर दीस। कुछ दिन बाद, हजारी लाल ला पता चलिस कि शोभित के ऑंखी एक अइसे गरीब लइका ला लगे हे, जेकर ददा ला उही भ्रष्ट नेता मन ह जमीन ले बेदखल कर दे रीहिन।
​आज जब हजारी लाल ह उही लइका ला देखथे, त ओला लागथे कि शोभित मरे नइ हे। आज भी ओकर "ऑंखी" जिंयती हे अउ उही ईमानदारी के नजर ले दुनिया ला देखत हे। हजारी लाल के ऑंखी ले आंसू गिरिस, फेर आज ओ आंसू म गम नइ, बल्कि एक गर्व रीहिस।

​"सत्य ला दबाए जा सकथे, फेर ओकर जोत ला बुझाय नइ जा सके। मनखे मर जथे, फेर ओकर विचार अउ ओकर देखे के नजरिया हमेशा अमर रहिथे।

​हजारी लाल के गोड़ ह भारी होगे रीहिस, मानों कोनो ओकर गोड़ म मन भर के सांकर बांध दे होही। परोसी मन के खुसुर-फुसुर अउ ओकर तिरछी नजर ह ओला बाण कस चुभत रीहिस। जेन मनखे काली तक शोभित ला "गाँव के गौरव" कहत थकें नइ, आज उही मन ओला "आतंकवादी" कहे बर तइयार बइठे रीहिन।
​हजारी लाल ह कचहरी के सीढ़ी चढ़त-चढ़त थक गे रीहिस। ओकर ऑंखी के आंसू ह घलो अब सूख के पथरा होगे रीहिस। वकील मन के फीस अउ दलाल मन के दलाली म ओकर घर के गहना-गुंठा सब बिक गे। फेर शोभित? ओहा त जेल के करिया कोठरी म बंद रीहिस।

​एक दिन खबर आइस कि शोभित के तबीयत खराब होगे हे, ओला अस्पताल ले जाए गे हे। हजारी लाल अउ मोना बइहाय कस अस्पताल कोति दौड़िन। पुलिस के कड़ा पहरा रीहिस। जब हजारी लाल ह भीतर जाके देखिस, त ओकर परान ह उही मेर थम गे। शोभित के देह म नील के निसान रीहिस, मानों ओला कोनो बेरहम मनखे ह नइ, बल्कि कोनो जंगली जानवर ह नोच डारे होवय। ओकर पत्रकारिता के धरम ह आज ओकर सजा बन गे रीहिस।
​शोभित ह धीरे से अपन ऑंखी खोलिस। ओकर ऑंखी म आंसू नइ, बल्कि एक अजब किसम के चमक रीहिस। ओहा थथरावत आवाज म कहिस— "ददा, मैं पथरा नइ फेंके हौं... मैं तो बस भ्रष्टाचार के पहिचान करात रेहेंव, सफेदपोश लोगन के करिया मुहूँ ला उज्जर करत रेहेंव।"

​हजारी लाल ह शोभित के हाथ ला थामिस, फेर शोभित के सांस ह उही बखत ओकर साथ छोड़ दीस, हजारी लाल के दुनिया उजर गे। पारा-परोसी मन जेन मन तमाशा देखत रीहिन, शोभित के मौत के खबर सुनके सन्न रह गे।
​फेर कहानी म असली मोड़ तब आइस जब शोभित के अंतिम संस्कार के बाद, हजारी लाल ला शोभित के एक पुरान डायरी मिलीस। ओ डायरी म शोभित ह लिखे रीहिस— "ददा, अगर मोला कुछू हो जाही, त रोबे झन। मोर ऑंखी मन ला दान कर देबे, ताकि मोर मरे के बाद भी ये दुनिया म सच ला देखे बर कोनो के ऑंखी जिंयती राहय।"
​कहानी के अंत
​हजारी लाल ह अपन बेटा के आखिरी इच्छा पूरा करिस। शोभित के ऑंखी ला दान कर दीस। कुछ दिन बाद, हजारी लाल ला पता चलिस कि शोभित के ऑंखी एक अइसे गरीब लइका ला लगे हे, जेकर ददा ला उही भ्रष्ट नेता मन ह जमीन ले बेदखल कर दे रीहिन।
​आज जब हजारी लाल ह उही लइका ला देखथे, त ओला लागथे कि शोभित मरे नइ हे। आज भी ओकर "ऑंखी" जिंयती हे अउ उही ईमानदारी के नजर ले दुनिया ला देखत हे। हजारी लाल के ऑंखी ले आंसू गिरिस, फेर आज ओ आंसू म गम नइ, बल्कि एक गर्व रीहिस।
​कहानी के सीख:
​"सत्य ला दबाए जा सकथे, फेर ओकर जोत ला बुझाय नइ जा सके। मनखे मर जथे, फेर ओकर विचार अउ ओकर देखे के नजरिया हमेशा अमर रहिथे।"

लेखक
डॉ.अशोक आकाश 
दिन भर चक्कर काटे के बाद भी शोभित ला घर लाय के कोनो जुगाड़ नइ जमीस। ओकर ऊपर दंगा भड़काय, शासकीय काम में बाधा डाले अउ आतंक मचाय के धारा लगादीस। पारा के सबे मनखे मन ईंकर परिवार के मेहनत अउ तरक्की ले अब्बड़ जलन भाव राखथे एकर सेती ओ मन ला दुखी देखके, एमन ला पहिली बेर सुख के अनुभति होईस। 
      हजारी लाल अउ ओकर बाई मोना दिन रात इहॉं ले उहॉं घूम-घूमके थकगे, ओकर बदन करियागे, मुहूँ सुटकगे रीहस फेर ओकर दुलरवा बेटा नउ छूटिस। न दिन में आराम न रात में  नींद। 
इही तो दुनिया आय, मुसीबत में घिरे मनखे के सहारा बने ला छोड़ के ओकर मजबूरी के लाभ लेना चाहथे। बखत के मार कतको बड़े बलशाली ला कोकरा देथे। शोभित प्रजातंत्र के चौथा स्तम्भ पत्रकारिता के क्षेत्र में ईमानदारी से काम करत रीहिस। ओहा जानत रीहिस कि जीवन कैसे जीना हे, का अच्छा हे का बुरा हे लेकिन ओकर दोस्ती एक दू झन मंदहा पत्रकार मन संग रीहिसे, महतारी मोना के कतको रोक टोक के बाद भी ऊँकर दोस्ती नई छूट सकिस। गलत संगति के सजा अच्छा मनखे ला घलो भुगते ला पर जथे। बेरा के पटकनी में शोभित के उज्जर जिनगी में फोकटे फोकट दाग लगगे। 
ठोकर जीवन के पाठशाला हरे, कुछ मनखे ठोकर खाके सम्हल जथे अउ सुधर जथे त कुछ मनखे मन नवॉं तरीका ले अपडेट होके फेर उही रद्दा में चल पड़थे। शोभित हा पत्रकारिता के माध्यम ले सच ला जनता के सामने लाके भ्रष्टाचारी मन ला एकक करके लाईन में खड़े कर दे रीहिस। एकर सेती शोभित के पॉंव पुट दुश्मन बन गे रीहिस। 
        

​शोभित ह "प्रजातंत्र के चौथा स्तंभ" के मर्यादा ला निभात, सहर म बनत एक बड़े सरकारी पुल के भ्रष्टाचार के भंडाफोड़ कर दे रीहिस। ओहा अपन रिपोर्ट म सप्रमाण देखाय रीहिस कि कैसे नेता अउ बड़े अफसर मन मिलके घटिया निर्माण सामग्री के प्रयोग करत हें, जेकर सेती कतको मनखे के जान ला खतरा हे।
शहर म उही पुल के पास जनता ह विरोध प्रदर्शन करत रीहिस। मंदहा पत्रकार संगवारी मनके उभरौनी में शोभित उहॉं केवल एक पत्रकार के नाते सच ला रिकार्ड करे बर गे रीहिस। अचानक, भीड़ म कुछ "भाड़ा के गुंडा" मन घुस गे, जे मन ला उही भ्रष्टाचारी नेता मन भेजे रीहिन। जइसे ही पुलिस ह भीड़ ला तितर-बितर करे के कोसिस करिस, उही गुंडा मन पुलिस ऊपर पथरा फेंके बर शुरू कर दीस। तब शोभित ह अपन कैमरा म ऊँकर मन के चेहरा कैद कर ले रीहिस, जे मन असल म पथरा फेंकत रीहिन। ओला डराय बर अउ ओकर कैमरा ला छीने बर पुलिस के भेस म कुछ मनखे ओकर ऊपर टूट पड़िन।
​शोभित ह अपन कैमरा ला बचाए बर जब संघर्ष करिस, त ओला "शासकीय काम म रुकावट" अउ "पुलिस ऊपर हमला" के झूठा आरोप म फंसा दीस। ओकर ऊपर पुलिस ऊपर पथरा फेंके, भीड़ ला उकसायके, शासकीय काम में बाधा डारे के झूठ मूठ आरोप लगादीन ताकि दुनिया ला ये लगे कि एक पत्रकार ह दंगा भड़कावत हे।
​हजारी लाल जब जेल म शोभित ले मिलिस, त ओकर ऑंखी म आँसू रीहिस। शोभित ह सिसकत कहिस-
​"ददा, मैं हाथ म कलम एकर बर धरेंव कि मैं सच लिख सकँव, फेर ये भ्रष्ट तंत्र ह मुहीं ला अपराधी बना दीस।  मैं पुलिस ऊपर पथरा नइ फेंके हौं ददा, मैं तो ओ मनखे मन के चेहरा ला दुनिया ला देखाय बर चाहत रहेंव, जे मन आम जनता के हक नँगावत हें।"
​हजारी लाल ला अब समझ आइस कि शोभित ला ओकर ईमानदारी के सजा मिले हे। शोभित ह भ्रष्टाचारी मन के ऑंखी के किरकिरी बन गे रीहिस, जेकर सेती ओ मन ओला अपराधी साबित करे म लगगे रीहिन।


​हजारी लाल जैसे ही अपन घर के ओसारी ले बाहिर गोड़ मड़ाईस, आगू चउपाल म बइठे परोसी गजाधर अउ बिदेसी जेन ह मंत्री के चापलूस कार्यकर्ता रीहिन तौन मन एक-दूसर कोती देखके मुस्कुराइन। गजाधर ह जोर से सुनावत कहिस—
​"का होगे हजारी भाई? बड़े जोर-सोर ले बेटा ला पढ़ा-लिखा के पत्रकार बनाये रेहे, अब तो ओहा 'बड़का नाम' कमा लीस! पेपर म ओकर फोटो छपे हे, फेर हाथ म कलम नइ, पथरा हे। अब बतावा, पुलिस ऊपर हमला करना अउ दंगा भड़काना ही तुहर संस्कार आय का?"
​बिदेसी ह घलो बहती गंगा म हाथ धोवत कहिस— "सही कहत हस गजाधर, अतका घमंड रीहिस एकर परिवार ला अपन तरक्की ऊपर। देख ले, भगवान के घर म अंधेर नइ हे। अइसने औलाद ले त निसंतान रहना अच्छा हे, जेकर सेती कुल म दाग लग जाय।"
​हजारी लाल के भीतर जैसे कोनो ज्वालामुखी फूट पड़े रीहिस। ओकर बदन गुस्सा अउ दुख ले कांपे लगीस। ओहा थिरकत आवाज म फेर कड़ा स्वर म कहिस—
​"चुप रहा बिदेसी! अउ तहूँ चुप रा गजाधर! तुमन ला का लगथे कि मोर शोभित अपराधी आय? जेन लइका ह रद्दा म गिरत मनखे ला देख के हॉंसे नहीं, तुरत उठाय बर दौड़ पड़थे, कोनो चहकत चिरई मन ला कभू नइ मारिस, ऊँकर चहकन भरे आजाद जिंदगी में अपन मन के खुशी देखथे। ओहा कभू पुलिस ऊपर पथरा फेंकही? दुशमनी करैया, जलन मरैया मनखे संग हॉंस के गोठियाथे मोर बेटा हा। तुमन तो ओकर मेहनत ले जरत रहेव, एकर सेती आज तुमन ला सुख मिलत हे। फेर सुरता राखहू शोभित के हाथ म पुलिस ह जबरदस्ती के आरोप लगायहे, काबर कि ओकर कलम ह तुहर चहेता नेता मन के भ्रष्टाचार के पोल खोलत रीहिस।"
​हजारी लाल के ऑंखी ले अंगारा बरसत रीहिस। ओहा आगू कहिस—
​"सच्चाई ला कालिख पोत के लुकाये नइ जा सके। आज ओकर उज्जर जिनगी म दाग लगाय के कोसिस करे जावत हे, फेर मोर अंतरात्मा कहत हे कि मोर बेटा निर्दोष हे। तुमन ला तमाशा देखे म मजा आवत हे न? देख लेव... फेर जब सच बाहिर आही, त तुमन अपन मूंह लुकाये बर जगा नइ पाहू।"
​अतका कहिके हजारी लाल हफरगे। मोना ह भीतर ले दौड़ के आइस अउ हजारी के हाथ ला धर लीस। परोसी मन ह हजारी के अइसे उग्र रूप ला देख के सन्न रहिगे। हजारी लाल के ऑंखी म आँसू अउ गुस्सा के अइसे संगम रीहिस कि कोनो म अउ बोले के हिम्मत नइ होइस।

       हजारी लाल के गोड़ ह भारी होगे रीहिस, मानों कोनो ओकर गोड़ म मन भर के सांकर बांध दे होही। परोसी मन के खुसुर-फुसुर अउ ओकर तिरछी नजर ह ओला बाण कस चुभत रीहिस। जेन मनखे काली तक शोभित ला "गाँव के गौरव" कहत थकें नइ, आज उही मन ओला "आतंकवादी" कहे बर तइयार बइठे रीहिन।
​हजारी लाल ह कछेरी के सीढ़ी चढ़त-चढ़त थक गे रीहिस। ओकर ऑंखी के आँसू ह घलो अब सूख के पथरा होगे रीहिस। वकील मन के फीस अउ दलाल मन के दलाली म ओकर घर के गहना-गूँठा सब बेंचागे। फेर शोभित जेल के करिया कोठी ले नइ निकल पईस। ​हजारी लाल जब जेल के भारी लोहा के दरवाजा तीर पहुँचिस, त ओकर भेंट जेल के संतरी बचपन के संगवारी भोला ले होईस। भोला के ऑंखी म कोनो दया भाव नई रीहिस, बस एक लालच के चमक रीहिस। हजारी लाल ह हाथ जोड़ के बिनती करिस, "साहब, मोर लइका शोभित ले एक बेर मिला देव।"
​भोला ह तिरछी नजर ले देखिस अउ खैनी थूँकत कहिस, "अतका अराम ले नई मिले हजारी। ये जेल आय, इहॉं हवा घलो बिना कीमत के नई मिले। अउ तोर बेटा ऊपर तो 'आतंक' के धारा लगे हे।"
​उही मेर एक दूसर संतरी बंधू घलो आ गे। ओहा धीरे से हजारी लाल ला बाजू म ले जाके फुसफुसाइस, "देख हजारी, हमर साहब मन ला खुश करना पड़थे। जेल के भीतर अपराधी मन ला बीड़ी, सिगरेट, दारू अउ मोबाइल रिचार्ज तक के बेवस्था हो जाथे, फेर एकर बदला मोटा रकम लगथे अगर तोर बेटा ला बिना मार-पीट के अराम से रखना हे, त 'खर्चा-पानी' के इंतजाम कर।"
​हजारी लाल सन्न रह गे। ओहा सोचिस—बाहिर नेता मन भ्रष्टाचार करत हें अउ भीतर ये रक्षक मन भक्षक बने हें। बंधू ह आगू कहिस, "जेन मनखे मन ह शोभित ला फंसाए हें, ओ मन हम ला पैसा दे हें ओला तंग करे बर। अब अगर तूमन ओला बचाना चाहत हव, त ओकर ले दोगुना रकम देना पड़ही।"
​हजारी लाल के ऑंखी ले टपटप आँसू गिरे लगीस। ओकर मन म हूक उठीस— 'मोला काय मालूम रीहिस भगवान कि न्याय के मंदिर कहे जाय वाला ये जगह म ईमानदारी के नीलामी होथे।'
​शोभित ले मिले बर भोला अउ बंधू ह हजारी लाल ले ओकर अंगूठी अउ गॉंठ म बंधाय आखिरी के पाँच सौ रूपया घलो झपट लीन। जब हजारी लाल ह शोभित ला देखिस, त ओकर कलेजा फटे कस होगे। शोभित एक कोना म दुबके बइठे रीहिस।
​शोभित ह धीरे से कहिस, "ददा, इहॉं सबू चीज बिकाऊ हे। संतरी मन मोला मोबाइल दे बर कहत रीहिन ताकि मैं कोनो ला फोन लगाके अउ पैसा मंगा सकौं, फेर मैं मना कर देंव। ददा, ये मन मोला तोड़ना चाहत हें।"
​हजारी लाल ह अपन बेटा के कांपत हाथ ला थामिस अउ संतरी मन कोति देखिस, जेन मन दूरिहा खड़े होके अइसे हॉंसत रीहिन मानो कोनो शिकार ला फँसा लेहे। हजारी लाल ला समझ आगे कि ये लड़ाई सिर्फ कानून ले नई, बल्कि ये सड़े हुए तंत्र ले घलो हे।
         कोनो मनखे राहय मुसीबत के बेरा सबके मति छिंहीबिंही हो जथे, का करँव काकर करा जाके गोहराँव, कुछू समझ नइ आय। हजारी लाल कोनो बड़ा रहीश नइ रीहिस जे अपन खजाना खोलके लइका ला नियॉंव देवा सकय। ऐसन में ओला अपन बचपना के संगवारी अजीत के सुरता आईस, नवॉंपारा महामाईं मंदिर के पाछू किराया के घर में रहिके न्याय के मंदिर के सेवा करथे, ओकर सहयोगी ममता अउ भारती दूनो के दूनो कई ठन गंभीर मामला ला आसानी से निपटाय हवे।
       हजारी लाल के मन म जइसे आशा के दीया बरगे। जब दुनिया के रद्दा बंद हो जथे, तब पुराना संगवारी के सुरता अइसने आथे, जइसे अंधियारी रात म ध्रुव तारा।

​        हजारी लाल ह अपन लचर-पचर गोड़ ला घसीटत-घसीटत नवापारा के उही महामाईं मंदिर के पाछू पहुँचिस। उहॉं एक साधारण से घर के बाहर बोर्ड टंगाय रीहिस— "न्याय अउ सेवा केंद्र"। भीतर काकरो हँसे अउ चर्चा करे के आवाज आवत रीहिस।
​हजारी लाल ह थरथरात आवाज म कीहिस, "अजीत... ओ अजीत भाई?"
​अंदर ले अजीत बाहिर निकलिस, ओकर चेहरा म सादगी अउ ऑंखी म न्याय के एक अजब चमक रीहिस। जब दुनो कोई बैठक मैं पहुँचिन त आगू के सोफा में ममता अउ भारती घलो बइठे रीहिन, जेन मन फाइल अउ कानूनी सलाह के कागजात मन के बीच म मगन रीहिन।
​बाजू में बैठत अजीत ह हजारी लाल लाल ला कीहिस "हजारी? तें  ये का हाल बना डारे हस?"
​हजारी लाल ह ओकर जांग में गिरगे अउ फफक-फफक के रोए लगीस। "अजीत, मैं उजर गे हौं, बरबाद होगे हँस, मोर ऊपर विपत्ति के पहाड़ गिरगे हवे। मोर शोभित... मोर दुलरवा बेटा ला 'दंगाबाज' बना के जेल म डाल दे हें। पुलिस-प्रशासन, संतरी-मंत्री सब ओकर पीछे पड़ गे हें। मोला कोनो रद्दा नइ मिलत हे।"
​ममता ह पास आके ओला उठाइस अउ पानी पियाइस। भारती ह ओकर बात ला ध्यान से सुनत रहीस अउ झटपट पेन उठा के लिखत रहीस।
​अजीत ह हजारी लाल के खॉंध में हाथ रख के कीहिस, "हजारी, तें अनपढ़ अनाड़ी कस काबर रोवत हस? हमर जवानी के दोस्ती कभू हार नई मानय? हम न्याय के मंदिर के सेवा करथन, अउ जब तक हमर कलम चलत हे, तब तक कोनो बेकसूर ला जेल म सड़न नइ देन।"
​ममता ह ओकर तरफ देख के कहिस, "हजारी काका, घबरा झन। हमन सुनत हन कि शोभित ह भ्रष्टाचार के कोनो बहुत बड़े राज ला उजागर करे बर चाहत रीहिस। ओही राज के डर ले ओला फँसाए गेहे।"
​भारती ह ओकर फाइल म शोभित के केस के सारा विवरण लिख लीस। "काका, ये जेल के संतरी भोला अउ बंधू के भ्रष्टाचार के जतेक सबूत हें, ओकर जमा-जोखा हमन करबो। ये लइका मन के 'मोटा रकम' मांगे के खेल ला हमन मुख्यमंत्री के जनदर्शन अउ बड़े अधिकारी तक पहुंचाबो।"
​हजारी लाल ला लागिस जइसे ओला कोनो संजीवनी मिल गेहे। अजीत ह ओला भरोसा दिलाइस, "तैं चिंता झन कर। आज के रात हमन योजना बनाबो। कल जब तें फेर जेल जाबे, तब शोभित ला कहिबे कि ओकर डरे के कोनो जरूरत नइ हे। शेर के बच्चा आय ओ हा, शेर कस बाहर आही।"

हजारी लाल के आँसू अब ओकर कमजोरी नइ रीहिस, बल्कि एक ठन संकल्प बन गे रीहिस। अजीत, ममता अऊ भारती के संग मिलके, वो मन जऊन योजना बनाइन, ओमा शोभित के दू भरोसेमंद साथी—गिरिराज अऊ मंटू—के भूमिका सबले ज्यादा महत्वपूर्ण रीहिस। ये दूनो झन शोभित के पत्रकारिता के सफर के संगवारी रहिन, जऊन मन आज घलो अपन दोस्त के ईमानदारी म गर्व महसूस करथें।
आगू दिन हजारी लाल जेल के बाहिर फेर ओही संतरी भोला अऊ बंधू के आगू खड़े रहिस। फेर आज ओकर संग गिरिराज अऊ मंटू घलो रहिन। गिरिराज अपन कुर्ता के बटन म छिपे हिडन कैमरा लगाय रहिस, अऊ मंटू दूरिहा ले पूरा मंजर रिकॉर्ड करे बर एक हाई-टेक रिकॉर्डर तैयार रखे रहिस।
हजारी लाल रोय असन नाटक करत कीहिस,
“भोला भइया, घर ले कुछ गहना गिरवी रखके पैसा लाय हवँव। शोभित ला थोड़ा अच्छा खाना दे देहू अऊ एक बेर फोन में बात करा देव।”
लालच म अंधा होगे भोला अऊ बंधू तुरंत पैकेट ले लीन। भोला हॉंसत कहिस,
“हजारी, तैं चिंता झन कर। इहाँ मोबाइल के रिचार्ज अऊ दारू सब मिलथे, बस तैं पैसा देत रह। ये ले मोबाइल, 10 मिनट बात कर ले, फेर ध्यान राखबे अंदर के बात बाहिर नई जाना चाही।”
ओही बखत मंटू इशारा करके गिरिराज ला संकेत दीस। गिरिराज बड़े चालाकी ले बात ला घुमा दिस,
“अरे भोला भइया, ये शोभित तो बड़े जिद्दी हवे। कहिथे बाहिर मोर बदनामी हो गे हे। फेर ये बतावव, तुंहर मन जऊन ‘मोटा रकम’ लेथव, वो ऊपर तक जाथे का?”
भोला, जऊन ओ बखत नशा म धुत रहिस, अपन बहादुरी अऊ ‘नेटवर्क’ के घमंड म सब राज खोल दीस। वो कहिस,
“ऊपर तक? बेटा, जेल के हर कोना हमर हवे। हम जेन ला चाहबो अपराधी बना देबो, अऊ जेन ला चाहबो रिहा करवा देबो। ये तो नेताजी के आदेश रहिस कि शोभित ला तोड़ना हे, एकरे सेती हमन ओला तड़पाथन।”
सब कुछ रिकॉर्ड होगे रहिस—घूस लेय के वीडियो, जेल के भीतर दारू अऊ मोबाइल के व्यवस्था, अऊ सबले बड़े बात—नेताजी के इशारा म एक निर्दोष ला फंसाय के इकबालिया बयान।

उही साँझ, जब हजारी लाल अजीत, ममता अऊ भारती के संग वापस आइस, तब गिरिराज अऊ मंटू वो रिकॉर्डिंग ला बड़े-बड़े स्थानीय अखबार अऊ सोशल मीडिया म वायरल कर दीन।
अगला दिन सुबेरे होते-होते पूरा शहर म हड़कंप मच गे। जऊन पत्रकार ला ‘दंगाबाज’ कहिके बदनाम करे गे रहिस, ओकर समर्थन म जनता सड़क म उतर आइन। मुख्यमंत्री के दफ्तर ले जांच के आदेश जारी हो गे।
जेल प्रशासन म जऊन संतरी मन ‘राजा’ बनके बैठे रहिन, ओ मन ला तुरंत सस्पेंड कर दीस।

​हजारी लाल अउ ओकर संगवारी अजीत, ममता अउ भारती जेल के गेट के सामने खड़ें रिहिन। आज ओ मन के हाथ म न्यायालय के वो आदेश रीहिस, जेकर बर हजारी लाल ह अपन जीवन के सब ले बड़े संघर्ष करे रीहिस। शोभित के बेकसूर होय के प्रमाण मिल गे रीहिस, अउ ओकर रिहाई के हुकुम हो गे रीहिस।
​हजारी लाल के धड़कन बढ़त जात रीहिस। ओकर मन म एक आस रीहिस— 'अपन बेटा ला फेर देखूं, ओकर हाथ ला थाम के घर ले जाहूँ।'
​जेल के भीतर संतरी भोला अउ बंधू के चेहरा आज उतरगे रीहिस, काबर कि गिरिराज अउ मंटू के स्टिंग ऑपरेशन ह ओ मन के कमर तोड़ दे रीहिस। जब हजारी लाल शोभित के कोठरी म पहुँचिस, त शोभित ह दीवाल ला टेक के बइठे रीहिस। ओकर देह म जगह-जगह जखम के निसान रीहिस।
​हजारी लाल ह दौड़ के ओला गोदी म उठा लीस, "बेटा शोभित! देख, ददा आ गे हे। तें अब आजाद हस, कोनो तोर बाल घलो बांका नइ कर सकय।"
​शोभित ह अपन ददा के गोदी में मुड़ी रखिस। ओकर साँस ह उखड़त रीहिस, फेर ओकर चेहरा म एक संतोष के भाव रीहिस। ओहा थथरावत आवाज म कहिस— "ददा, मोला रिहाई के दरकार अब नइ हे। ये जेल के कोठरी म ये मन मोर देह ला त तोड़ डारिन, फेर मोर कलम ला नइ तोड़ पाइन। भोला अउ बंधू ह मोला दुनिया भर के लालच देके घूस ले बर मजबूर करत रिहिन, अउ नेता मन के इशारा म मोर ऊपर टार्चर करिन... ददा, मैं सच ला देख के मरत हौं, इही मोर सबसे बड़े जीत आय।"
​इतका कहत-कहत शोभित के प्राण ह ओकर ददा के गोदी म ही चिरई कस उड़ागे। हजारी लाल के चित्कार ले जेल के दीवार मन घलो काँपगे।
​हजारी लाल के ऑंखी ह अब पथरा गे रीहिस। ओकर बेटा ह मर गे रीहिस, फेर ओकर ऑंखी म अभी घलो वो चमक रीहिस, जेमा दुनिया ला सही रद्दा देखे के ताकत रीहिस। महतारी मोना ह कांपत हाथ ले ओकर ऑंखी ला देखिस।
​हजारी लाल ह भारी मन ले कहिस, "शोभित ह हमेशा सच के पहरेदार बन के जीये हे। आज ओकर देह नइ हे, फेर ओकर ऑंखी मन तो ये दुनिया म रहिहीं। ये ऑंखी मन वो भ्रष्टाचारी मन ला देखिहीं, जे मन आज भी खुल्लम-खुल्ला घूमत हें।"
​अजीत ह आगे बढ़ के कहिस, "हजारी काका, तुमन आज एक महान काम करत हव। शोभित के ऑंखी ला दान कर देबो, त ओहा फेर से कोनो अइसे लइका के रूप म देखिही, जेन ह न्याय बर लड़ही।"

​जेल के गेट ले बाहर निकरत हजारी लाल के हाथ म शोभित के देह नइ, ओकर अमर विचार रीहिस। शहर भर म शोभित के बलिदान के चर्चा रीहिस। कतको दिन बाद, अस्पताल ले खबर आइस कि शोभित के ऑंखी ला एक गरीब लइका ला लगाय गे हे।
​आज जब हजारी लाल वो लइका ला देखथे, त ओला लागथे कि शोभित फेर लौट के आ गे हे। वो लइका के ऑंखी म हजारी लाल ला शोभित के ओ ईमानदारी अउ ओकर "ऑंखी" के तेज दिखथे। हजारी लाल के अब कोनो दुख नइ रीहिस, ओला लागिस कि ओकर बेटा कभू नइ मरिस—ओहा त अब एक नइ, बल्कि हज़ारों ऑंखी बन के सच ला देखत हे।
​"सच ला दबाए बर कतको कोशिश कर लेव, फेर सच ह कोनो न कोनो रूप म सामने आके ही रहिथे। मनखे मर जाथे, फेर ओकर देखे के नजरिया अउ ओकर विचार अमर रहिथे।"
​हजारी लाल के गोड़ ह भारी होगे रीहिस, मानों कोनो ओकर पइर म मन भर के सांकर बांध दीस होवय। परोसी मन के खुसुर-फुसुर अउ ओकर तिरछी नजर ह ओला बाण कस चुभत रीहिस। जेन मनखे कल तक शोभित ला "गांव के गौरव" कहत थकें नइ, आज उही मन ओला "आतंकवादी" कहे बर तइयार बइठे रीहिन।
​हजारी लाल ह कचहरी के सीढ़ी चढ़त-चढ़त थक गे रीहिस। ओकर ऑंखी के आंसू ह घलो अब सूख के पथरा होगे रीहिस। वकील मन के फीस अउ दलाल मन के दलाली म ओकर घर के गहना-गुंठा सब बिक गे। फेरह शोभित तो जेल के करिया कोठरी म बंद रीहिस।
​एक दिन खबर आइस कि शोभित के जेल में तबीयत बिगड़ हे ओला अस्पताल ले जाए गे हे। हजारी लाल अउ मोना पगलाय कस अस्पताल कोति दौड़िन। पुलिस के कड़ा पहरा रीहिस। जब हजारी लाल ह भीतर जाके देखिस, त ओकर परान ह उही मेर थम गे। शोभित के देह म नील के निसान रीहिस, मानों ओला कोनो बेरहम मनखे ह नइ, बल्कि कोनो जंगली जानवर ह नोच डारे होवय। ओकर पत्रकारिता के धरम ह आज ओकर सजा बन गे रीहिस।
​शोभित ह धीरे से अपन ऑंखी खोलिस। ओकर ऑंखी म आंसू नइ, बल्कि एक अजब किसम के चमक रीहिस। ओहा थथरावत आवाज म कहिस— "ददा, मै पथरा नइ फेंके हौं... मै त बस भ्रष्टाचार के करिया मूंह ला उज्जर करत रेहेंव।"
​हजारी लाल ह शोभित के हाथ ला थामिस, फेर शोभित के साँस उही बखत ओकर साथ छोड़ दीस। हजारी लाल के दुनिया उजर गे। पारा-परोसी मन जेन मन तमाशा देखत रीहिन, शोभित के मौत के खबर सुनके सब सन्न रह गे। शोभित के पत्रकार संगवारी मंटू हा हजारी लाल ला बताईस कि जब वोहा शोभित ला देखे बर जेल गे रीहिस त ओ हा केहे रीहिस " ध्यान लगा के सुन मंटू भाई, ददा ला बता देबे अगर मोला कुछू कहीं हो जाही, त रोवय झन। मोर ऑंखी मन ला दान करवा देबे, ताकि मोर मरे के बाद भी ये दुनिया म सच ला देखे बर कोनो के ऑंखी में जीयत राहँव।"


​हजारी लाल ह अपन बेटा के आखिरी इच्छा पूरा करिस। शोभित के ऑंखी ला दान कर दीस। कुछ दिन बाद, हजारी लाल ला पता चलिस कि शोभित के ऑंखी एक अइसे गरीब लइका ला लगे हे, जेकर ददा ला उही भ्रष्ट नेता मन ह जमीन ले बेदखल कर दे रीहिन।
​आज जब हजारी लाल ह उही लइका ला देखथे, त ओला लागथे कि शोभित मरे नइ हे। आज भी ओकर "ऑंखी" जिंयत हे अउ उही ईमानदारी के नजर ले दुनिया ला देखत हे। हजारी लाल के ऑंखी ले आंसू गिरिस, फेर आज ओ आंसू म गम नइ, बल्कि एक गर्व रीहिस।
​"सत्य ला दबाए जा सकथे, फेर ओकर जोत ला बुझाय नइ जा सके। मनखे मर जथे, फेर ओकर विचार अउ ओकर देखे के नजरिया हमेशा अमर रहिथे।

​हजारी लाल के गोड़ ह भारी होगे रीहिस, मानों कोनो ओकर गोड़ म मन भर के सांकर बांध दे होही। परोसी मन के खुसुर-फुसुर अउ ओकर तिरछी नजर ह ओला बाण कस चुभत रीहिस। जेन मनखे काली तक शोभित ला "गाँव के गौरव" कहत थकें नइ, आज उही मन ओला "आतंकवादी" कहे बर तइयार बइठे रीहिन।
​हजारी लाल ह कचहरी के सीढ़ी चढ़त-चढ़त थक गे रीहिस। ओकर ऑंखी के आंसू ह घलो अब सूख के पथरा होगे रीहिस। वकील मन के फीस अउ दलाल मन के दलाली म ओकर घर के गहना-गुंठा सब बिक गे। फेर शोभित? ओहा त जेल के करिया कोठरी म बंद रीहिस।
​ओ काल राति
​एक दिन खबर आइस कि शोभित ला अस्पताल ले जाए गे हे। हजारी लाल अउ मोना पागुल कस अस्पताल कोति दौड़िन। पुलिस के कड़ा पहरा रीहिस। जब हजारी लाल ह भीतर जाके देखिस, त ओकर परान ह उही मेर थम गे। शोभित के देह म नील के निसान रीहिस, मानों ओला कोनो बेरहम मनखे ह नइ, बल्कि कोनो जंगली जानवर ह नोच डारे होवय। ओकर पत्रकारिता के धरम ह आज ओकर सजा बन गे रीहिस।
​शोभित ह धीरे से अपन ऑंखी खोलिस। ओकर ऑंखी म आंसू नइ, बल्कि एक अजब किसम के चमक रीहिस। ओहा थथरावत आवाज म कहिस— "ददा, मै पथरा नइ फेंके हौं... मै त बस भ्रष्टाचार के करिया मूंह ला उज्जर करत रेहेंव।"
​मर्मस्पर्शी मोड़
​हजारी लाल ह शोभित के हाथ ला थामिस, फेर शोभित के सांस ह उही बखत ओकर साथ छोड़ दीस। हजारी लाल के दुनिया उजर गे। पारा-परोसी मन जेन मन तमाशा देखत रीहिन, शोभित के मौत के खबर सुनके सन्न रह गे।
​फेर कहानी म असली मोड़ तब आइस जब शोभित के अंतिम संस्कार के बाद, हजारी लाल ला शोभित के एक पुरान डायरी मिलीस। ओ डायरी म शोभित ह लिखे रीहिस— "ददा, अगर मोला कुछू हो जाही, त रोबे झन। मोर ऑंखी मन ला दान कर देबे, ताकि मोर मरे के बाद भी ये दुनिया म सच ला देखे बर कोनो के ऑंखी जिंयती राहय।"
​कहानी के अंत
​हजारी लाल ह अपन बेटा के आखिरी इच्छा पूरा करिस। शोभित के ऑंखी ला दान कर दीस। कुछ दिन बाद, हजारी लाल ला पता चलिस कि शोभित के ऑंखी एक अइसे गरीब लइका ला लगे हे, जेकर ददा ला उही भ्रष्ट नेता मन ह जमीन ले बेदखल कर दे रीहिन।
​आज जब हजारी लाल ह उही लइका ला देखथे, त ओला लागथे कि शोभित मरे नइ हे। आज भी ओकर "ऑंखी" जिंयती हे अउ उही ईमानदारी के नजर ले दुनिया ला देखत हे। हजारी लाल के ऑंखी ले आंसू गिरिस, फेर आज ओ आंसू म गम नइ, बल्कि एक गर्व रीहिस।

​"सत्य ला दबाए जा सकथे, फेर ओकर जोत ला बुझाय नइ जा सके। मनखे मर जथे, फेर ओकर विचार अउ ओकर देखे के नजरिया हमेशा अमर रहिथे।"

लेखक
डॉ.अशोक आकाश

Friday, March 20, 2026

मनहरण घनाक्षरी समय का देख रुख

समय का देख रुख, मुस्कान सजायें मुख, 
मिले नित नेह सुख, मान न घटाये हैं।
वक्त की बिसात पर, बाजियॉं पलटकर, 
भूल कर भी किसी का, दिल न दुखाये हैं।।
​शक्ति संजोयें हैं ऐसी, मोड़ें धारा ऐसी वैसी,
मोम बन ढलने की, कला भी जगाये हैं।
दिल से शुक्रिया भाई, खोदते रहे जो खाई,
 यूँ ऊँची छलॉंग हेतु, सामर्थ्य बढ़ाये हैं।। 
डॉ.अशोक आकाश
12/3/2026

तेल अउ तेली के महिमा

         तेल अउ तेली के महिमा 

तेली के महिमा बड़े, तेली तेल उपजाय। 
तेल के खोज करैया भैया, तेलिच मन तो आय।। 

साहू साहू सब कहे, तेली कहे न कोय। 
जे कोई तेली कहे, वंश उजागर होय।। 


जे तेल ला तरिया में भर, हाथी बूड़ नहवाय। 
ऐसन कर्मा माता ला, राजा नरवर शीश झुकाय।। 

तेल के महिमा भारी भैया, तेली के महिमा भारी गा। 
तेल पेरई बैपार करई में, तेली के हवे चिन्हारी गा।। 

अरसी तेल हा गरमी लाथे, तिली के तेल हा ठंडा जी। 
अंडी तेल हा गैस भगाथे, तेली के पेरे के धंधा जी।। 
लीम तेल हा कीरा मारे, खरी में होय ओन्हारी गा... 
       तेल के महिमा भारी भैया, तेली के महिमा भारी गा... 

सरसों तेल हा पीरा भगाथे, फल्ली तेल के राजा जी। 
तेल पेरई बर सबो जात में, तेली के बाजे हे बाजा जी।। 
तेल के खोज करैया मन के, छुटही कोन उधारी गा... 
           तेल के महिमा भारी भैया, तेली के महिमा भारी गा... 

नरियर तेल हा चुंदी मुड़ी बर, होथे बड़ गुनकारी जी। 
टोर्री करन कुसुम कपसा, सब तेल के महिमा भारी जी।। 
राजा भोज तक गंगू तेली ले तेल ला ले हे उधारी गा... 
           तेल के महिमा भारी भैया, तेली के महिमा भारी गा... 

कहे अशोक आकाश तेली अउ तेल के ओतका महिमा हे। 
जतका सबो जात के अपन, करम अउ गौरव गरिमा हे।। 
सबे जात में पुरुष संग कंधा, मिलाके रेंगे हे नारी गा... 
               तेल के महिमा भारी भैया, तेली के महिमा गा... 
रचयिता 
डॉ.अशोक आकाश
1मार्च 2015
9755889199

Thursday, March 19, 2026

प्रथम शैलपुत्री - प्रदीप छंद

मातु शैलपुत्री प्रथम दिन, आती हो नवरात मॉं। 
दुख हर कर सुख शॉंति सदा ही, देती हो सौगात मॉं।। 

नित कल्याण करे कल्याणी, मॉं दुर्गा अवतार है। 
भक्त वत्सला माता करती, भक्तों का उद्धार है।। 
चन्द्रदोष हर शॉंत करे मन, भ्रांति हरे दिन रात मॉं। 
मातु शैलपुत्री प्रथम दिन, आती हो नवरात मॉं।। 

सोहे शस्त्र त्रिशूल हाथ में, साधक के अनुकूल है। 
बाम हस्त में कमल लिये हैं, मॉं ममता की मूल है।। 
हिमगिरि पावन धाम विराजे, भगत नवाये माथ मॉं। 
मातु शैलपुत्री प्रथम दिन, आती हो नवरात मॉं।। 

माता सती शैलपुत्री बन, भय हरती जगदम्बिका। 
दैहिक दैविक भौतिक हरती, त्रयी ताप त्रयंबिका।। 
मन के सकल विकार भस्म कर, सर पर रख दो हाथ मॉं। 
मातु शैलपुत्री प्रथम दिन, आती हो नवरात मॉं।। 
सृजन दिनॉंक
23 सितंबर 2025

Sunday, March 15, 2026

मॉं कर्मा आरती

             वंदना 
मॉं कर्मा गुण रोज भज, निज मन मलिन उजार। 
बरनऊ तैलिक वंश जसु, साहू शक्ति अपार।। 

             आरती
जय हो कर्मा मैय्या तेरी आरती उतारूँ। 
आरती उतारूँ तुझ पर तन मन वारूँ।। 
जय हो कर्मा मैय्या तेरी आरती उतारूँ... 

झॉंसी में जनमी मैय्या, बहू नरवर की। 
रतन अनमोल माईं, साहू सरोवर की।। 
मैय्या तेरी बन्दगी में, जिन्दगी गुजारूँ... 
जय हो कर्मा मैय्या तेरी आरती उतारूँ... 

तैलिक वंश के मैय्या संकटमोचन। 
नारी कुल तारक, साहू वंश विभूषण।। 
पड़े हैं शरण तेरी, चरण पखारूँ... 
जय हो कर्मा मैय्या तेरी आरती उतारूँ... 

जिस घर होवे कर्मा मैय्या तेरी पूजा। 
होवे सिध भगतन केे काज अजूबा।। 
कर जोरे मैया तेरी मूरत निहारूँ... 
जय हो कर्मा मैय्या तेरी आरती उतारूँ... 

हे जगननी तू ही आदि भवानी। 
लक्ष्मी सरस्वती दुर्गा भवानी।। 
पार करो नैया मैय्या मन से पुकारूँ... 
जय हो कर्मा मैय्या तेरी आरती उतारूँ... 

रचयिता
डॉ.अशोक आकाश
दिनॉंक 14 अप्रेल 2013

Saturday, March 14, 2026

अमेरिका ईरान जंग पर घनाक्षरी

मनहरण घनाक्षरी
                1
​रूस वाली देखी रार, यूक्रेन में बार बार,
छोटा जान छेड़ दोगे, हठ भारी पड़ेगी।
धन शक्ति मान भज, एटम की धौंस तज ,
लौ की एक चिंगारी से, लंका जारि धरेगी।।
​इजरायल-ईरान, ताने अस्त्र शस्त्र बाण,
घमंड की आँच देख, दुनिया क्या डरेगी।
बल की न भूल करो, चींटी भी कुबूल करो, 
हाथी को भी सूँड़ चढ़, मौत बन छरेगी।।
                  2
पुतिन को देख हँसे, कीचड़ में खुद फँसे, 
जेलेंस्की से जंग वाली, रीत तुम भूले हो। 
घमंड उड़ान जारी, तंज खूब कसे भारी,
खुद बुने जाल बीच, फँसना कुबूले हो।
​खामनेई संग अब, ठन गई जंग जब,
बातों वाले 'डोनाल्ड' जी, होश सब भूले हो।
दूसरों को सीख दई, अपनी न सुधि रही,
शेर तन आए अब, चूहा बन झूले हो।।
डॉ.अशोक आकाश
13/3/2026

ताटंक छंद- गीत खुशी के गाना है

ताटंक छंद -: "गीत खुशी के गाना है"
अब आया उत्कर्ष नवल नित, मिलकर दीप जलाना है।
पुलकित मन दुख भार भूलकर, गीत खुशी के गाना है।।

फूलों से पथ रोज़ सजाया, धैर्य हृदय में धारा है।
जब आँधी में दीप जलाया, तब जीवन उजियारा है।
निशि वासर तपकर खप जायें, तभी स्वर्ग सुख पाना है।
मन पुलकित दुख भार भूलकर, गीत खुशी के गाना है... 

सदमारग सत्कर्मों के पथ, तोड़ चले अंधियारे वो।
साहस का शृंगार हृदय में , जीवन शौर्य उतारे जो।। 
श्रम की बूंद-बूंद से सोना, अब हमको उपजाना है। 
मन पुलकित दुख भार भूलकर, गीत खुशी के गाना है।। 

संघर्षों की धूल झड़ी तो, भाग्य द्वार दौड़े आया।
जब दिन थे विपरीत याद है, धनिकों के कोड़े खाया।। 
अब तो कर्म किरण से जीवन, स्वर्ण सदृश दमकाना है। 
मन पुलकित दुख भार भूलकर, गीत खुशी के गाना है।।

डॉ.अशोक आकाश
बालोद छत्तीसगढ़
9755889199

Wednesday, February 18, 2026

मनहरण घनाक्षरी में महाकाल स्तुति

*मनहरण घनाक्षरी में महाकाल स्तुति*

​जाके भाल चन्द्र सोहे, कंठ विष धारे देव,
डमरू बजावत ही, असुर संहारे हैं।
भूतन के नाथ प्रभु, जगत के तात आप,
हाथ जो पसारैं दुख, पल में निवारे हैं॥
भगति बढ़ावे मान, श्रद्धा से जो करे गान,
संकट मिटावे सभी, काज वो सँवारे हैं।
महादेव महिमा को, गावत 'अशोक' अब,
करे हैं आकाश' नाम, शिव ही हमारे हैं॥

महाशिवरात्रि महापर्व की अनन्त शुभकामनाएँ
डॉ.अशोक आकाश✍️

अवसरवादी नेताओं के खोखले आदर्श पर घनाक्षरी

*अवसरवादी नेताओं के खोखले आदर्श पर घनाक्षरी*
बार बार का चुनाव, देख बाबा भीमराव,
नेता आप ही का नॉंव, दॉंव में लगाते हैं।
प्रलोभन बिना पूर्ण, होता नहीं है चुनाव,
मदिरा की पेटी गॉंव, गॉंव में लुटाते हैं।। 
संविधान ले के हाथ, कसमें तो बड़ी खात, 
काम पड़े बात-बात, ताक पे सजाते हैं।
भीड़ में मसीहा बन, फोटो खिंचवाते तन,
घर जा के वही रंग, अपना दिखाते हैं।। 
सिद्धांतों की लाश लॉंघ, शर्त कुर्सियों की बॉंध,बंदरों सी डाल-डाल, कूद दल बदले। 
बेचकर स्वाभिमान, बने कुछ तो महान्  
अवसर पाके ये तो, अपनी आत्मा छले।। 
देते एक मुट्ठी चने, विडियो हजार बने, बेबस गरीब गिने, जश्न ये मनाते हैं। 
एक केला दस थाम, फोटो खिंचे राम-राम! 
रोज ये मदद नाम , रोटी सेंक जाते हैं।। 
दान का ढिंढोरा पीट, हीरो करे गीज-गीज।
निष्ठा कौड़ी बेच-बेच, दल बदलाते हैं।। 
दुखिया के साथ खड़े, हॉंस सेल्फी लेते बड़े, 
डींग मार भाषण में, ताली बजवाते हैं।। 
डॉ.अशोक आकाश
ग्राम कोहंगाटोला बालोद छत्तीसगढ़.
9755889199

Saturday, February 14, 2026

संस्कार की पूंजी को, तुम कितना सम्भालोगे

​संस्कार की पूंजी को, तुम जितना सम्भालोगे।
बेकार की झंझट से, खुद को ही निकालोगे।।
​झूठों की जीत होती, अरु सत्य हारता है।
बैर मन में पाले, घृणा जो वारता है।।
नफरत की ऑंधियों को, तुम कितना उछालोगे...
बेकार के झंझट में, तुम खुद को ही पाओगे।
​रावण सी पंडिताई, जो मद में खोएगा।
सोने की अपनी लंका, वो खुद ही डुबोएगा।
घमंड की लपटों को, तुम जितना हवा दोगे...
बेकार के झंझट में, तुम खुद को ही पाओगे... 
चतुरंगिणी ​कौरव की, क्यों रण में हार बैठे।
जब सत्य सारथी हो, पॉंडव पुकार बैठै।।
धर्म की ध्वजा को, तुम जितना उठाओगे...
बेकार की झंझट से, खुद को ही निकालोगे... 
​बिक कर भी सत्यता ने, कभी हार न मानी थी।
हरिश्चंद्र की भगति को , दुनिया ने भी जानी थी।।
मर्यादा की रेखा को, तुम जितना सजाओगे...
बेकार की झंझट से, खुद को ही निकालोगे... 
डॉ.अशोक आकाश🌷🌷

Sunday, February 8, 2026

मैं चाहूँ सैनिक वीरों की बलिदानी पर गीत लिखूँ

*लावणी छंद -- 16-14 पदांत लघु गुरू*

मैं चाहूँ सैनिक वीरों की, बलिदानी पर गीत लिखूँ। 
हार गया जो जीवन बाजी, उसे फर्ज की जीत लिखूँ।।

घर परिवार से कोसों दूर, जो सीमा के प्रहरी हैं। 
फर्ज के प्रति बुलंद हौसला, रात सुबह दोपहरी है।।
ले तराजू न्याय की देवी, अंधी गूंगी बहरी है ।
जयचंदों की भीड़ देखकर, मन में पीड़ा गहरी है।।
जिंदा पकड़े दुश्मन छोड़ा, उसे न्याय की जीत लिखूँ ...
मैं चाहूँ सैनिक वीरों की, बलिदानी पर गीत लिखूँ ...

पथरीली पगडंडी चलकर, जीत ही जिसकी मँजिल हो। 
क्या पता किसी ओट में छिपा, प्राण-घातक कातिल हो।।
गोली बंदूक रसद लादे, साथ न कोई सँगदिल हो। 
मातृभूमि छू ना ले दुश्मन, तीव्र नजर में तिल तिल हो ।।
दस-दस दुश्मन मार गिराया, फर्ज पे मन की प्रीत लिखूँ...
मैं चाहूँ सैनिक वीरों की, बलिदानी पर गीत लिखूँ...

कॉंटों कंकड़ पर नित चलकर, बीज शौर्य का बोता है। 
आसमान है जिसकी चादर, चट्टानों पर सोता है।। 
ठंड गर्मी बारिश का मौसम,जिस पर असर ना होता है।।
परिजन हित-रक्षा देश सुरक्षा, भार फर्ज का ढोता है।। 
विषमताओं से पल-पल जूझे, कुर्बानी को रीत लिखूँ ... 
हार गया जो जीवन बाजी, उसे फर्ज की जीत लिखूँ ... 

मैं चाहूँ सैनिक वीरों की, बलिदानी पर गीत लिखूँ । 
हार गया जो जीवन बाजी, उसे फर्ज की जीत लिखूँ ।। 

डॉ.अशोक आकाश

Wednesday, February 4, 2026

भाव सुमन दल तीरे मन को

*भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता*

​भाग १: प्रस्तावना (सृजन की भूमिका)
​१. अंतर्मन का आह्वान
सरस्वती माँ वीणा वादिनि, शब्द शक्ति दे देना।
भावों के इस सुंदर वन में, सुरभित रस भर देना।।
लिखूँ विधाता की रचना को, ऐसा मन हो पावन।
देख सकूँ मैं जर्रे-जर्रे, कुदरत का ये सावन।।
नेत्र खोल कर देखूँ जब मैं, विस्मित रह-रह जाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​२. विधाता की चित्रशाला

सजे धजे नभ पाताल धरा, देवलोक चित्रशाला।
पर्वत नदियाँ और घटाएँ, अद्भुत दर्शन माला।।
बिना तूलिका के भी प्रभु ने, रंगे रंग मनभाता।
पल-पल यहाँ बदलता मंजर, नव उमंग ऋतु त्राता।।
अगम अगोचर शक्ति रूप ही, हर छवि में मुस्काता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​३. प्रकृति-पुरुष मिलन

मौन खड़ा यह शांत हिमालय, जला हृदय मैं बाती।
बहती नदियाँ सिखा रहीं हैं, लक्ष्य मुदित मन थाती ।।
प्रकृति प्रेम ही भक्ति सार है, वेदों की शुचि वाणी।
मिट जाए सब मोह वासना, शुद्ध होय मन प्राणी।।
कण-कण में उस पारब्रह्म का, दिव्य रूप दरसाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

ब्रह्मांडीय दर्शन: विराट रूप
​४. आकाशगंगा का वैभव (तारामंडल)
​अगणित तारे झिलमिल करते, अंबर की थाली में।
नभ की गंगा बहती देखो, काल-महा-काली में।।
ग्रह-नक्षत्रों का नर्तन नभ, ताल-छंद से बँधके।
घूम रही है सृष्टि सारी, धूरी एक में फँदके।।
शून्य डगर पर दीप जलाकर, कौन पथिक मुस्काता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​५. शून्य का विस्तार (अनंत अंतरिक्ष)
​अथाह नील समंदर ऊपर, ओर-छोर नहिं जिसका।
सोच सकूँ मैं छोटा मानव, क्या अस्तित्व है मेरा।।
ब्लैक होल की गहराई हो, या प्रकाश का घेरा।
तेरी मर्जी बिना न हिलता, ब्रह्मांडीय ये तारा।।
रूप विराट देखूँ जब तेरा, गर्व चूर हो जाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​६. महा-ऊर्जा का स्रोत (ब्रह्म तेज)
​परमाणु के भीतर भी तू, गैलेक्सी में तू ही।
अंधकार के उस पार भी, ज्योतिर्मय है तू ही।।
महा विस्फोट (Big Bang) में स्वर है तेरा, तू ही परम सवेरा।
तुझसे जनम और तुझमें लय है, यह सब खेल है तेरा।।
अणु से लेकर ब्रह्म तक तू ही, एक नजर बस आता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​भाग ७: श्री गणेश (स्वरूप और संदेश)
​७. श्रवण और दृष्टि (बोध)
लंबकर्ण हैं विशाल जिनके, सब की पीर सुनाते।
क्षुद्र जीव की भी व्याकुलता, झट से सुन वे पाते।।
नेत्र सूक्ष्म हैं दिव्य दृष्टि दे, पैनी नज़र सिखाते।
ओट छिपे जो दोष-गुणों को, पल में देख बताते।।
बुद्धि-विवेक जगाकर मन में, संशय द्वार हटाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​८. गजानन स्वरूप (विशालता)
मस्तक उन्नत बड़ा गजानन, गौरव मान बढ़ाता।
लंबोदर का उदर विशालक, सब कुछ ही सह जाता।।
सुमुखि रूप है मंगलकारी, विघ्न समूह हटाते।
रिद्धि-सिद्धि के स्वामी गनपति, शुभ सुख वर्षा लाते।।
मूषक जैसा छोटा वाहन, समता पाठ पढ़ाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​९. अंकुश और पाश (नियंत्रण)
हाथों में है पाश अंकुश, संयम हमें सिखाते।
मन के चंचल गज को वश कर, सही मार्ग दिखलाते।।
मोदक का फल मीठा मिलता, जब पुरुषार्थ जगाते।
एकदंत की अटूट निष्ठा, कठिन लक्ष्य तक लाते।।
ज्ञान और विज्ञान रूप बन, प्रथम पूज्य कहलाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​भाग १० : शिव-पार्वती (प्रकृति के अधिष्ठाता)
​१०. शिव: विराट प्रकृति (पुरुष)
अंग विभूति भस्म सुशोभित, वैराग्य का है चोला।
जटा जूट में गंगा सोहे, शांत चित्त है भोला।।
कंठ गरल पर हृदय सुधा है, विष को अमृत करते।
चंद्र भाल पर शीतल अमृत, जग के ताप को हरते।।
नटराज का तांडव जैसे, लय प्रलय को लाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​११. माँ पार्वती: शक्ति स्वरूप (प्रकृति)
शक्ति रूपिणी जगदंबा माँ, धरा रूप में सोहे।
हरे-भरे इन वनों के भीतर, ममता सबकी मोहे।।
नदियाँ हैं जो नसों सरीखी, जीवन रस को देतीं।
अन्नपूर्णा बन के मैया, सबकी चिंता हरतीं।।
शैलसुता के चरणों में ही, जीवन स्वर्ग बन जाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​१२. अर्धनारीश्वर (संतुलन)
शिव और शक्ति एक ही सिक्के, के दो पहलू जैसे।
बिना प्रकृति के पुरुष अधूरा, बिन शिव शक्ति कैसे?।।
जड़ और चेतन का यहै संगम, अर्धनारीश्वर स्वामी।
सृष्टि चक्र के यही नियंता, प्रभु अंतर्यामी।।
एक ही ज्योति दो रूपों में, जग को राह दिखाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​१३. गिरि शिखर (पर्वत दृश्य)

​गिरि शिखरों पर चीड़ झुण्ड में, इठलाता बलखाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
उच्च शिखर पर पाहन अद्भुत, बैठा पॉंव पसारे।
तृण दल झट नित साहस रोपे, ऋतु शृंगार निखारे।।
चील बनाता नीड़ चीड़ के शाखों में इतराके ।
सूखी टहनी जकड़ चोंच में, उड़े गगन लहराके।।
नजर चील की आसमान से धरती पर नित रहती।
ऊँचा उड़ पर रहो धरा में, हर मानव से कहती।।
तुंग शिखर पर बैठ सपोला, मस्ती में इतराता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

१४.वन्य प्रांत दश्य

चरती चौकस चंचल हिरणी, हरित तृणों की थाती। 
नैन नीर बह नेह पिघलता, हर आहट घबराती।। 
सूर्य किरण नित ओझल होता, बदली में लुक छिपके। 
रात चॉंदनी पीहू प्रिय से, मिलता चुपके चिपके।। 
पारिजात कचनार घोलती, रस मादक नस-नस में। 
अमलतास रमणीय कुञ्ज की, छटा दिखे मधुरस में।। 
डाल नीड़ दुबकी गौरैया, हंस ताल मंडराता। 
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।। 


१५. .सरिता का प्रवाह (नदी दृश्य)

​कल-कल करती चंचल धारा, पत्थर से टकराती।
रजत धार की चादर ओढ़े, सागर तक बलखाती।
तट पर बैठे सारस जोड़े, प्रेम गीत नित गाते।
शीतल जल की छुअन पाँव में, मन को बहुत लुभाते।।
लहरें करतीं अजब ठिठोली, तट को गले लगातीं।
मिट-मिट कर भी सृजन नया कर, जीवन सार बतातीं।।
नभ का अक्स समेट हृदय में, रवि को अर्घ्य चढ़ाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​16. उषा काल (सूर्योदय दृश्य)

​रवि की पहली किरण सुनहरी, नभ पर लाली घोले।
चहक-चहकउ पंछी शाखों में, मधुर वचनियाँ बोले।।
सिंदूरी आभा में लिपटा, पर्वत मस्तक सोहे।
कण-कण में नव चेत जगाती, सबकी सुध-बुध मोहे।।
ओस की बूंदें तृण के ऊपर, मोती सी चमकातीं।
अंधकार को विदा सुनाकर, उजला पथ दिखलातीं।।
किरण-किरण में सजी आरती, जग को धीर बँधाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​१७. घनघोर घटा (वर्षा दृश्य)

​काले मेघों की टोली ने, अंबर को है घेरा।
रिमझिम-रिमझिम बूँदें गिरतीं, मिटा तपन का डेरा।।
नाच रहा वन में मयूर अब, पंख पसार निराला।
भीगी मिट्टी की खुशबू ने, मन में जादू डाला।।
मेंढक का संगीत गूँजता, पोखर के गलियारे।
तृप्त हुई है धरा आज फिर, मेघा द्वारे-द्वारे।।
दामिनि दमक-दमक कर क्षणभर, निज अस्तित्व दिखाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

१८. हिमपात (शीत दृश्य)

​श्वेत वसन में लिपटी घाटी, जैसे शांत तपस्वी।
चमक रही है बर्फ धूप में, ज्योति-पुंज मनस्वी।।
शीतल पवन झकोरे देती, सर-सर करती जाती।
ठिठुर रहे हैं पात विटप के, रुनझुन राग सुनाती।।
धुंध की चादर तान ओढ़कर, छिप गए ऊँचे टीले।
रूप सुहाना देख चकित हैं, पर्वत ये बर्फीले।।
धैर्य और गांभीर्य सिखाता, हिम का पर्वत नाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

१९​. बसंत बहार (कुसुम दृश्य)

​ऋतुराज खड़ा द्वार हमारे, कलियाँ मुसकाती हैं।
रंग-बिरंगी तितली डोलें, मन को बहलाती हैं।।
बौरों से लद गईं आम की, डारें झुक-झुक जातीं।
कोयलिया की कूक सुरीली, अंतर्मन हरसाती।।
सरसों के पीले फूलों ने, ओढ़ी चादर पीली।
मंद सुगंधित पवन चली है, सुरभित सुखद रसीली।।
पल्लव-पल्लव नव जीवन रस, मधुमय गीत सुनाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​१९. संध्या बेला (सूर्यास्त दृश्य)

​पश्चिम दिशा वसन सिंदूरी, पहन चली इठलाती।
थके हुए सब पंछी लौटे, निज नीड़ों को भाती।।
शांत खड़ा वटवृक्ष मौन है, साया लंबा करता।
ढलते सूरज का यह मंजर, वैरागी मन भरता।।
मंदिर में बज उठे शंख ध्वनि, झन-झन घंट बजाते।
धूप-दीप की खुशबू देकर, सब देवों को ध्याते।।
तिमिर बढ़ा पर आस दीप का, धीरज सदा बँधाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​२०. पूर्णमासी (चंद्र दृश्य)

पूर्ण ​दूधिया दीप नहाई, अंबर की यह नगरी।
शीतल चाँद बिखरे ऐसे, पावन धरती सगरी।।
तारों की महफ़िल में सज-धज, चंदा बीच विराजे।
जैसे शांत समंदर ऊपर, कोई  छतरी साजे।।
खिली कुमुदिनी मध्य सरोवर, आँखें नित निहारती।
मन की व्याकुलता सब खोई, उतरी जग की आरती।।
शांति और शीतलता लेकर, पावन चरित निभाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​२१. ग्रीष्म का ताप (तपन दृश्य)

​सूर्य देव ने तान दिया है, अपना छत्र करारा।
तपते पथ पर उड़ती धूलें, जलता है जग सारा।।
छाँव खोजते पंछी व्याकुल, तरु के भीतर छिपते।
पशु भी खड़े बावड़ी तीरे, व्याकुल प्यास से तपते।।
लू के थपेड़े चलें जोर से, झुलसाते अमराई।
मृग-मरीचिका रचे खेल अब, तपती हुई तराई।।
धैर्य सिखाती कठिन घड़ी यह, तपना सुख दे जाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​२२. शिशिर की ठिठुरन (शीत दृश्य)

​शिशिर ऋतु की चुभन निराली, ओस की चादर तानी।
काँप रहे हैं हाथ-पाँव सब, ठिठुर रही है नानी।।
घना कोहरा घेरा ऐसा, नजर न सूरज आता।
धुंध भरी इन गलियों में अब, पंथी राह भुलाता।।
अलाव जलाकर बैठे सारे, आग की ऊष्मा लेते।
गरम चाय की चुस्की लेकर, मात ठंड को देते।।
जड़वत हुआ विश्व ये सारा, मौन पाठ पढ़ जाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

 23. प्रकृति का अंतस (कृतज्ञता भाव)
​जड़-चेतन में व्याप्त ईश है, कण-कण कथा सुनाता।
निस्वार्थ भाव से जीवन देना, प्रकृति धर्म निभाता।।
पेड़ न अपने फल को चखते, नदियाँ जल न पीतीं।
औरों के हित जीने में ही, ये सदियाँ हैं जीतीं।।
सीखो इनसे त्याग प्रेम को, ईर्ष्या तज नर प्यारे।
तभी सफल होगा ये जीवन, चमकेंगे दिन तारे।।
कल्याणमयी संदेश जगत को, कुदरत सदा सिखाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​२४. काल चक्र (परिवर्तन का बोध)
​परिवर्तन ही नियम सृष्टि का, ऋतुएँ आतीं-जातीं।
सुख-दुख के ये चक्र निरंतर, समता भाव सिखातीं।।
पतझड़ के बाद ही हमेशा, कोमल पल्लव आते।
धैर्य धरो जो धीर वीर हैं, मंज़िल अपनी पाते।।
समय चक्र की गति निराली, रुकना कभी न जाना।
बहती धारा संग हमें भी, है आगे बढ़ जाना।।
सृजन और संहार बीच ही, जग का नाता आता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​२५. ईश महिमा - पूर्णता एवं समर्पण
​अगणित रूप अनूप विधाता, अद्भुत तेरी माया।
तुझसे ही ये अंबर फैला, तुझसे जग की काया।।
तू ही माली इस उपवन का, हम सब इसके फूल।
तेरी शरण में आकर मिटतीं, जीवन की सब धूल।।
शब्द कम पड़ें महिमा गाते, मौन नमन अब करते।
तेरी कला देख आँखों में, पावन आँसू भरते।।
रोम-रोम पुलकित है मेरा, जब तेरा गुण गाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।


२६. अंतर्यामी का वास (चेतना का दृश्य)
​बाहर जो बिखरा है वैभव, भीतर वह उजियारा।
हृदय गुहा में बैठा स्वामी, जग का भाग्य सँवारा।।
फूल खिले तो समझो मन में, सद्भावों की लाली।
नदी बहे तो जानो बहती, भक्ति की शुचि प्याली।।
भीतर देखूँ तो वह मालिक, घट-घट में मिल जाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​२७. मौन का संगीत (शून्य का दृश्य)
​शब्द जहाँ सो जाते जाकर, वह सन्नाटा देखा।
पर्वत की खामोशी में भी, ईश खींचता रेखा।।
बिना कहे सब कह देती है, यह चुप्पी वरदानी।
मौन पढ़ो तो समझ सकोगे, कुदरत की कल्याणी।।
शोर थमे जब मन का तब ही, सुर उसका मिल पाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​२८. शरणागति (अंतिम सत्य)
​पंचतत्व का पुतला यह तन, मिट्टी में मिल जाना।
इसी प्रकृति की गोदी में ही, अंततः सुस्ताना।।
वृक्ष सिखाते झुकना सबको, फल पाकर अभिमानी।
हम भी सीखें प्रभु चरणों में, लिखनी अमिट कहानी।।
तेरा तुझको अर्पण करके, मन पावन हो जाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​भाग २९. श्री गणेश (स्वरूप और संदेश)
​१. श्रवण और दृष्टि (बोध)
लंबकर्ण हैं विशाल जिनके, सब की पीर सुनाते।
क्षुद्र जीव की भी व्याकुलता, झट से सुन वे पाते।।
नेत्र सूक्ष्म हैं दिव्य दृष्टि दे, पैनी नज़र सिखाते।
ओट छिपे जो दोष-गुणों को, पल में देख बताते।।
बुद्धि-विवेक जगाकर मन में, संशय द्वार हटाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​३०. गजानन स्वरूप (विशालता)
मस्तक उन्नत बड़ा गजानन, गौरव मान बढ़ाता।
लंबोदर का उदर विशालक, सब कुछ ही सह जाता।।
सुमुखि रूप है मंगलकारी, विघ्न समूह हटाते।
रिद्धि-सिद्धि के स्वामी गनपति, शुभ सुख वर्षा लाते।।
मूषक जैसा छोटा वाहन, समता पाठ पढ़ाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​३२. अंकुश और पाश (नियंत्रण)
हाथों में है पाश अंकुश, संयम हमें सिखाते।
मन के चंचल गज को वश कर, सही मार्ग दिखलाते।।
मोदक का फल मीठा मिलता, जब पुरुषार्थ जगाते।
एकदंत की अटूट निष्ठा, कठिन लक्ष्य तक लाते।।
ज्ञान और विज्ञान रूप बन, प्रथम पूज्य कहलाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​भाग ३३: शिव-पार्वती (प्रकृति के अधिष्ठाता)
​३३ : विराट प्रकृति (पुरुष)
अंग विभूति भस्म सुशोभित, वैराग्य का है चोला।
जटा जूट में गंगा सोहे, शांत चित्त है भोला।।
कंठ गरल पर हृदय सुधा है, विष को अमृत करते।
चंद्र भाल पर शीतल अमृत, जग के ताप को हरते।।
नटराज का तांडव जैसे, लय प्रलय को लाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

३३.माँ पार्वती: शक्ति स्वरूप (प्रकृति)
शक्ति रूपिणी जगदंबा माँ, धरा रूप में सोहे।
हरे-भरे इन वनों के भीतर, ममता सबकी मोहे।।
नदियाँ हैं जो नसों सरीखी, जीवन रस को देतीं।
अन्नपूर्णा बन के मैया, सबकी चिंता हरतीं।।
शैलसुता के चरणों में ही, जीवन स्वर्ग बन जाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​३३. अर्धनारीश्वर (संतुलन)
शिव और शक्ति एक ही सिक्के, के दो पहलू जैसे।
बिना प्रकृति के पुरुष अधूरा, बिन शिव शक्ति कैसे?।।
जड़ और चेतन का यह संगम, अर्धनारीश्वर स्वामी।
सृष्टि चक्र के यही नियंता, प्रभु अंतर्यामी।।
एक ही ज्योति दो रूपों में, जग को राह दिखाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​३५. 
ऌ कमल-आसन और उद्भव
​नाभि-कमल से प्रकटे ब्रह्मा, सृजन हेतु मुस्काते।
चार मुखों से चारों वेदों, का पावन स्वर गाते।।
शून्य डगर पर प्राण फूँककर, जीवन बीज बोया।
चेतना जागी जड़ जगती में, जो था युगों से सोया।।
सृष्टि-शिल्पी की चतुराई, अमित रूप दिखलाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​३६. हंस वाहिनी और विवेक
​शुभ्र वसन और हंस वाहिनी, नीर-क्षीर बतलाती।
सत्य-असत्य का भेद कराकर, जग को ज्ञान सिखाती।।
हाथों में कमंडल माला, संयम और तप धारे।
रच दी सारी सृष्टि निराली, चंदा सूरज तारे।।
बुद्धि और एकाग्र भाव से, सकल विश्व बन जाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​३७. नियंता का विधान
​लिख दी सबकी भाग्य-लिपि को, कर्मों के आधार।
क्षण-क्षण का हिसाब है रखता, यह अद्भुत संसार।।
सत्व-रज-तम के धागों से, जीवन वस्त्र बुना है।
विधाता ने हर साँस के भीतर, अपना राग सुना है।।
मूक खड़ा देखूँ रचना को, मन पुलकित हो जाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
                 ०००
अशोक आकाश 

Tuesday, January 27, 2026

हृदय-नाद:-मॉं भारती राष्ट्र परिक्रमा (मनहरण घनाक्षरी)

हृदय-नाद:- मॉं भारती राष्ट्र परिक्रमा
​(छत्तीसगढ़ के हृदय-स्थल से संपूर्ण भारत की परिक्रमा)
​मंगलाचरण एवं सनातन वैभव (मनहरण घनाक्षरी) 
​१.
आदि और अंतहीन, दिव्य शक्ति रूपिणी माँ,
तेरी कीर्ति सनातन, विश्व का विधान है।
ऋषियों की तप-स्थली, वेदों की पावन वाणी,
सर्व धर्म समभाव, तेरा ही वरदान है।
बुद्ध की अहिंसा और, नानक की गुरु-वाणी,
कण-कण माटी यहाँ, गौरव-विमान है।
सत्य-अहिंसा का मार्ग, तूने ही दिखाया जग,
तेरी उज्वलता से ही, ऊँचा ये जहान है।
​२.
हृदय-प्रदेश माँ का, छत्तीसगढ़ धाम सोहे,
यहीं से अखंड रूप, होता द्योतमान है।
राम के ननिहाल से, अंग-अंग वंदना हो,
शीश पे हिमालय माँ, गरिमा की शान है।
भुजाएँ बनी हैं दो-दो, पूर्व और पश्चिम की,
चरणों में रत्नाकर, करता प्रणाम है।
दक्षिण का अंचल ये, भक्ति-रस सराबोर,
अंग-अंग तेरा माँ! भारत ये नाम है।
​हृदय-स्थल की महत्ता
​३.
हृदय के कमल से, वंदना मैं करूँ तेरी,
छत्तीसगढ़ धाम जहाँ, कीर्ति का वितान है।
कौशल्या की गोद खेलें, राम प्रभु अवतारी,
धान का कटोरा यह, सुयश की खान है।
अरपा औ’ पैरी धार, वंदन पखारें तेरा,
महतारी रूप यहाँ, भक्ति का विधान है।
सत्य और न्याय की, धरा यह पुनीत माई,
यहीं से अखंड राष्ट्र, का होता गान है।
​पूर्वी भुजा (पूर्वोत्तर और पूर्व)
​४.
उगे भानु पूर्व में जहाँ, अरुणाचल धन्य,
नागालैंड की धरा, अनुपम महान है।
असम की चाय महके, मेघालय मेघ-घर,
मणिपुर मिज़ोरम, सुरभि समान है।
त्रिपुरा की शक्ति पीठ, वंग-कला न्यारी माँ,
उत्कल के तट गूँजे, शंख का ही तान है।
झारखंड वन-प्रांतर, बिहार ज्ञान-भूमि,
पौरुष अपार जहाँ, शौर्य का निशान है।
​भाल और मुकुट (उत्तर भारत)
​५.
हिमगिरि भाल तेरा, मुकुट अनूप सोहे,
गंगा-यमु-धार जैसे, मोती की ही हार है।
ऋषि-मुनि देव-भूमि, उत्तराखंड पावन,
उत्तर प्रदेश जहाँ, प्रेम का अपार है।
सिखाती मर्यादा राम, कृष्ण का संदेश जहाँ,
ब्रज की पुनीत रज, स्वर्ग का द्वार है।
कश्मीर शीश रत्न, डल झील शोभा भरे,
माँ भारती का रूप, सबसे निराकार है।
​६.
वीर-प्रसू हरियाणा, गीता का उपदेश जहाँ,
पार्थ का रथ हांकते, स्वयं भगवान हैं।
कुरुक्षेत्र की वह माटी, त्याग और तप वाली,
खिलाड़ी और जवानों का, अमित सम्मान है।
हिमाचल देव-कुंज, धौलाधार की ही ओट,
शिव के निवास से ही, धन्य ये जहान है।
पर्वत की कंदरा में, गूँजता है ऊँ-कार,
शांति और शक्ति का, अनूठा वरदान है।
​पश्चिमी भुजा और मध्य-काया
​७.
वीर-रस धार बहे, पंज-नद वीरों की,
राजपुती आन लिए, मरुधरा लाल है।
शौर्य की कहानी कहे, महाकाल मध्य बीच,
उज्जैनी की पुण्य प्रभा, काल का भी काल है।
महारानी झाँसी और, शिवाजी के दुर्ग यहाँ,
महाराष्ट्र तेज पुंज, गौरव विशाल है।
गुर्जर धरा पे सोहे, सोमनाथ ज्योति पुंज,
भक्ति और शक्ति का, अनूठा ये हाल है।
​८.
गोवा का सुरम्य तट, मांडवी की लहरें जहाँ,
सागर की गोद में ही, सुखद विलास है।
अंडमान-निकोबार, सावरकर की तपस्या,
दमन-दीव लक्षद्वीप, गौरव-प्रकाश है।
कच्छ से कामरूप तक, कश्मीर से कन्या,
एक ही अखंड ज्योति, एकता की प्यास है।
विविधता में एकता का, विश्व को संदेश दे जो,
भारत ये माँ हमारी, अमर विश्वास है।
​दक्षिणापथ और सागर-चरण
​९.
कर्नाटक चंदन की, गंध मंद फैल रही,
आंध्रा-तेलंगाना जहाँ, वैभव का सार है।
केरल की हरियाली, तमिल की भक्ति-शक्ति,
संस्कृति की सरिता का, बहता बयार है।
सागर उताल तरंग, पखारे चरण तव,
रत्नगर्भा अंबिका का, सुखद संसार है।
सेतुबंध राम का, अखंडता का सूत्र यहाँ,
एक प्राण एक राष्ट्र, प्रेम का आधार है।
​उपसंहार
​१०.
विविध प्रदेश वेश, भाषा और बोली माँ,
किंतु एक सूत्र पिरो, राष्ट्र-माला धार है।
कोटि-कोटि कंठ यहाँ, जय-जयकार करें,
लोक-तंत्र दीप जला, तिमिर का पार है।
हृदय से नमन तुझे, भारती ओ विश्व-गुरु,
तेरी जय पताका झुके, सारा ये संसार है।
अमर सुहाग तेरा, अटल रहे ये धरा,
अर्पित तुझे ही माँ! ये जीवन का भार है।
डॉ.अशोक आकाश
कोहंगाटोला बालोद
9755889199

Wednesday, January 7, 2026

छत्तीसगढ़ की जगन्नाथपुरी -: शिवरी नारायण

*छत्तीसगढ़ की जगन्नाथपुरी-: शिवरी नारायण*

         शिवरीनारायण छत्तीसगढ़ का मुख्य तीर्थ स्थल है इसे छत्तीसगढ़ की जगन्नाथपुरी भी कहा जाता है। जो मान्यता विश्व स्तर में पूरी के जगन्नाथ धाम को प्राप्त है वही मान्यता हमारे छत्तीसगढ़ में शिवरीनारायण को प्राप्त है। प्राचीन काल में भगवान जगन्नाथ जी तीनों विग्रह के साथ यही विराजमान रहे, किंतु कालान्तर में उन तीनों विग्रहों को जगन्नाथपुरी ले जाया गया। शिवरीनारायण का यह धार्मिक स्थल छत्तीसगढ़ के जन-जन में आस्था का केंद्र-बिंदु है। कहा जाता है कि यहाँ भगवान जगन्नाथ गुप्त रूप में निवास करते हैं। भगवान जगन्नाथ स्वामी के प्रति हम छत्तीसगढ़ियों की आस्था का प्रतिफल है यहॉं दूज डोल यानी रथ दूज छत्तीसगढ़ का मुख्य त्यौहार है ।

         शिवरीनारायण जांजगीर जिले में आता है लेकिन वास्तविकता यह है कि जांजगीर चॉंपा शिवरीनारायण जैसे धार्मिक आस्था की नगरी के कारण भी चर्चित है। शिवरीनारायण धाम हिंदुओं के धार्मिक आस्था के प्रतीक चार धाम उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम, पूर्व में जगन्नाथ पुरी और पश्चिम में द्वारिका धाम की तरह ही एक धाम है जो कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 120 किलोमीटर की दूरी पर महानदी अर्थात चित्रोत्पला, शिवनाथ नदी और जोंक नदी के संगम स्थल पर स्थित है। इसे छत्तीसगढ़ के प्रमुख तीर्थ स्थल के रूप में जाना जाता है। यहॉं भगवान श्री राम वनवास के दौरान माता सीता के हरण हो जाने के बाद भाई लक्ष्मण के साथ माता सीता को वन-वन ढूंढते हुए पहुँचे थे। माता शबरी अपने गुरु मतंग ऋषि की आज्ञानुसार रोज भगवान श्री राम के आने की बाट जोहती, रास्ता साफ कर रंगबिरंगे फूल बिछाती भगवान श्री रामचंद्र जी का स्वागत और भोजन का रोज प्रबंध करती। 

         माता शबरी की साधना और तपस्या के फलस्वरुप भगवान श्री राम जी को मतंग ऋषि की भविष्यवाणी को सार्थक करने एक दिन आना ही पड़ा। भगवान  राम को देख माता शबरी भावविह्वल होकर अपने जूठन  बेर खिलाती रही और भक्त वत्सल भगवान अपने भक्त के प्रेम के वशीभूत हो जूठे बेर खाते रहे । यह स्थान भक्त की दृढ़ आस्था और भगवान की अतिवात्सल्यता के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। 

            माघ पूर्णिमा और दूज डोल यानी रथदूज यानी रथ यात्रा यहाँ का मुख्य पर्व है। माघी पूर्णिमा में 3 दिन का पारंपरिक मेला स्नान दान पुण्य और उपासना से हिन्दुत्व का जयघोष होता है, छत्तीसगढ़ के कोने कोने से लोग यहॉं पहुँचते हैं। 
   
        शिवरीनारायण अपनी धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ फल फूल रहा है इसे राज्य शासन द्वारा धर्मनगरी घोषित कर दिया गया है, लेकिन हिंदुओं की आस्था का केन्द्रबिंदु यह नगरी शबरी की तरह आज भी उस राम का बाट जोह रही है जो उसे विकसित शहर की श्रेणी में रख सके। अनन्य आस्था लेकर पहुँचे लोगों को यह सामान्य शहर की तरह ही लगता है। यह धर्मनगरी उपेक्षित शहर की तरह अव्यवस्था का शिकार है, मंदिर स्थल पर पहुंचने में दिक्कतों का सामना करना पड़़ता है ।  प्रशासनिक चुश्ती की कमी के कारण यहॉं घाटों की साफ-सफाई एवं गलियों में कूढ़ों का ढ़ेर दर्शनार्थियों की आस्था पर चोट पहुँचाती है। 
    
         भगवान राम वन गमन पथ को विकसित करने में राज्य सरकारों ने बड़ा काम किया है लेकिन जन सहयोग की कमी और राजनीतिक इच्छा शक्ति का अभाव झेलती यह धर्मनगरी विकासपथ पर अग्रसर होने में अब भी असमर्थ है। इस हेतु स्थानीय संगठनों एवं निवासियों की सक्रियता जरूरी है ताकि शिवरीनारायण की उज्ज्वल कीर्ति अखिल विश्व में फैल सके। 

          छत्तीसगढ़िया रीति नीति के लिए चर्चित  यह तीर्थ स्थल अपने मंदिरों की निर्माण कला, भव्यता एवं चमत्कृत कर देने वाले नक्काशी के कारण विश्व प्रसिद्ध हो सकता है। यहाँ का राम नाम बैंक विश्व प्रसिद्ध है, भगवान श्री राम के भक्तों द्वारा लिखी गई राम नाम पत्रिका का विशाल संग्रह दर्शनीय है। महंत रामसुंदर दास एवं मंदिर ट्रस्ट की सक्रियता और दर्शकों के लिए पर्व विशेष पर समय-समय पर की जाने वाली व्यवस्था हमारी छत्तीसगढ़िया संस्कृति को पुष्पित पल्लवित एवं सुरभित कर रही है। 

              शिवरीनारायण जैसा रमणीय एवं दर्शनीय स्थल सिर्फ छत्तीसगढ़ तक की सीमित कर दिया गया है, यह पीड़ा का विषय है। हमारे छत्तीसगढ़ में निवासरत लोग देश के विभिन्न धर्म स्थलों में भ्रमण कर स्नान दान कर पुण्य प्राप्त करता है लेकिन हमारे छत्तीसगढ़ की धर्म नगरी राजिम, शिवरीनारायण आदि जगहों में देश के अन्य भागों से बहुत कम लोग दर्शन हेतु पहुंचते हैं, यह सोचनीय मुद्दा है। 

           राज्य सरकार को चाहिए कि हमारे छत्तीसगढ़ में आस्था के केंद्र-बिंदु रहे इन धर्म स्थलों का राष्ट्रीय स्तर पर प्रचार प्रसार हो ताकि ये धर्मस्थल लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र-बिंदु बने। विशिष्ट योजनाओं के साथ हमारी सांस्कृतिक विरासतों एवं हमारे सांस्कृतिक धरोहरों की ख्याति विश्व तक पहुँचे ऐसा प्रयास करने की आवश्यकता है। 

           शिवरीनारायण नगरी हर युग में अपने अलग-अलग नामों के साथ वैश्विक पहचान बनाती रही है , सतयुग में इसे बैकुंठपुर,त्रेता युग में रामपुर, द्वापर युग में विष्णुपुर एवं नारायणपुर के नाम से इन्हें ख्याति मिली थी। मतंग ऋषि के गुरुकुल आश्रम और माता शबरी की तप:स्थली, भगवान जगन्नाथ का निवास स्थान होने के कारण इसे तीर्थ का दर्जा प्राप्त है इस पावन पुण्य स्थली को विश्व विख्यात करने की जरूरत है। 

डॉ. अशोक आकाश
९७५५८८९१९९

धरती के शृंगार का पर्व -हरेली

धरती के श्रृंगार एवं छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति का संवाहक पर्व - हरेली

    छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति में पर्वों की बड़ी महत्ता है, यहॉं बारहों महीने तरह-तरह के तीज त्यौहारों का प्रचलन है। सभी त्यौहारों में हरेली धरती के सिंगार का महत्वपूर्ण पर्व है छत्तीसगढ़ के सभी पर्व खेती किसानी से संबंधित उत्सव है। हरेली तिहार को हम हरियाली के नाम से भी जानते हैं ।  छत्तीसगढी संस्कृति के संवाहक पर्व के रूप में हरेली तिहार को जाना जाता है। छत्तीसगढ़ अपनी दो विशेषताओं के लिये विख्यात है, पहला कृषि दूसरा पर्व इस तरह - यहाँ पर जितने भी त्यौहार मनाए जाते हैं उनमें लोक मान्यता एवं परंपराएँ बहुतायत पाई जाती है। हरेली त्यौहार छत्तीसगढ़ी लोक-जीवन को अभिसिंचित करने - वाला त्यौहार है। ज्येष्ठ माह में ग्रीष्म की भीषण तपन सहकर अक्षय तृतीया के साथ छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक पर्व का शुभारंभ होता है। छत्तीसगढ़ी संस्कृति में खेती किसानी से संबंधित यह प्रथम त्यौहार है जब किसान विधि विधान से खेतों में बीजारोपण करता है और वर्षा के बाद अंकुर पश्चात धरती हरियाली से भर जाती है खेत में धान की फसल लहलहा उठती है। धान के पौधे परिपुष्ट होने लगते हैं तब किसान खेतों की हरियाली देख झूम उठता है ऐसे समय में सावन महीने की अमावस्या का आगमन होता है। इसी दिन को हम हरेली अमावस्या के नाम से जानते हैं। 
       इस साल यह त्योहार 28 जुलाई को मनाया जाएगा, इस दिन किसान सूयोदय से पूर्व गोधन के लिए विशेष प्रकार का असगंद कांदा एवं धामन कांदा के साथ गेहूं आटे की लोई पशुधन को खिलाया जाता है इसके पीछे पशुधन को वर्षाजनित व्याधि से छुटकारा का लक्ष्य होता है। खुशियों भरे वातावरण में घर कोठा की सफाई कर आंगन में मुरुम या रेत पर नांगर, गैंती, रांपा कुदाली, हंसिया, टंगिया, बसुला, बिंधना, आरी, पटासी, साबर, चटवार आदि कृषि औजारों तो व्यवस्थित रखकर गौरी गणेश स्थापित कर सुपारी, हल्दी, बंदन, दीपक जलाकर चावल आटा से सभी कृषि यंत्र एवं औजारों पर घर की सुहागन महिला हाथा देकर उसमें कुमकुम हल्दी लगाती है। पूजन में घर के सभी लोग पूरी आस्था से शामिल होते हैं। गुड मिश्रित चावल के आटे की चीला का भोग लगाकर नारियल तोड़ हवन देकर कच्चा नारियल और चीला का प्रसाद बाँटा जाता है। 
    
         बच्चे एवं युवा बाँस की गेंड़ी बना उस पर गलियों में चलने का आनंद लेते है। भोजन के पश्चात गाँव के चौक चौराहों में उत्सव का आयोजन किया जाता है जिसमें गेड़ी दौड़, बैल दौड़ रस्सी खींच, मटका फोड़, नारियल फेंक, कबड्डी खेल एवं डंडा नृत्य सुवा गीत के आयोजन से हरियाली त्यौहार के उत्सव का रंग देखते ही बनता है। संध्या गांव में अक्सर रामचरितमानस पाठ गायन से ग्रामीण जन की आस्था में वृद्धि करने वाला यह प्राचीन पर्व आस्थावान समाज निर्माण की दिशा में आदर्श स्थापित करता है। धरती की हरीतिम आभा से उत्साहित किसानों के इस पर्व का उत्साह देखते ही बनता है। छत्तीसगढ़ राज्य शासन द्वारा इस त्यौहार पर शासकीय आयोजन के माध्यम से गोधन की महत्ता प्रतिपादित होती है। कृषि आधारित इस पर्व से प्रकृति के प्रति छत्तीसगढ़ के पारम्परिक प्रेम से कृषि का आधार मजबूत होता है। छत्तीसगढ़ जन संस्कृति में दो तरह की विचाधारा के लोग निवास करते हैं पहला सत्ताहा दूसरा कबीरहा, जो देवता को मानते हैं उन्हे सत्ताहा कहा जाता है और जो कबीर को मानते हैं उन्हें कबीरहा कहा जाता है। कबीर पंथ को मानने वाले सत्य अहिंसा के पथगामी होते हैं इस पंथ में अधिकतम मानिकपुरी और साहू समाज के लोगों की बहुलता है। 

         जब से छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण हुआ है हर वर्ष हरेली तिहार को सरकारी उत्सव का रंग चढ़ता है । हर साल छत्तीसगढ़ शासन द्वारा बड़े बड़े आयोजन की तैयारी की जाती है। इस दिन बच्चे बड़े ही उल्लास स्कूलों में इस दिन गेड़ी नृत्य प्रतियोगिता का आयोजन किया जाएगा।देवता को मानने वाले परिवारों में अपने देवों को खुश करने इस दिन बलि प्रथा का प्रचलन है ऐसे परिवार जो अपने इष्ट देव की भी पूजा करते हैं और उन्हें खुश करने विशेष पूजा की जाती है। हमारे छत्तीसगढ़ में कबीर का बहुत बड़ा प्रभाव है, संत धमर्दास छत्तीसगढ़ के बहुत बड़े कबीर पंथ के संत हुए उनका प्रभाव भी हमारे छत्तीसगढ़ में पड़ा है, इनके अनुयायी अपने देवों को सेत यानी नारियल सेग मना लेते हैं। तंत्र मंत्र पर बहुतायत बहुतायत लोग विश्वास नहीं करते, इसे अंधविश्वास कहकर उपहास  उड़ाया जाता है लेकिन हरेली तिहार तांत्रिक साधना पर्व के रूप में भी विख्यात है। इस दिन तन्त्र साधकों की टोली तन्त्र साधना करते हैं। कुल मिलाकर हमारे छत्तीसगढ़ का यह पर्व जन जन में लोक संस्कृति के संवाहक पर्व के रूप में विख्यात है।

डॉ.अशोक आकाश
वरिष्ठ साहित्यकार
बालोद

दीया बुतावथे छत्तीसगढ़ में छावथे अँधियारी

*दीया बुतावथे छत्तीसगढ़ में छावथे अंधियारी - डॉ.अशोक आकाश*

        छत्तीसगढ़ राज बनायबर हमर पुरखा मन गजब संघर्ष करिन। बड़ आशा विश्वास ले स्वाभिमानी छत्तीसगढ़ के सपना देखैया हमर बलिदानी पूर्वज मन धीरज संयम ले मजबूती के साथ छत्तीसगढ़ राज बनायके बात रखिन। हमर देश में राज्य बनायबर कतको खूनी संघर्ष होयहे लेकिन पचपन साल तक सरलग आवाज उठायके बाद हमर देश के इतिहास में छत्तीसगढ़ ऐसन राज्य बनिस जे हा बगैर खूनी संघर्ष के राज्य के रूप में अस्तित्व में आईस। आजादी के बाद पचपन साल के देखे सपना बिना खूनखराबा के पूरा होगे, ये हमर छत्तीसगढ़ के सीधापन के प्रत्यक्ष प्रमाण हरे। 
       जब हमन छत्तीसगढ़ राज पायेन त गजब अकन सपना देखत रेहेन, छत्तीसगढ़ के सबे संसाधन के उपयोग अब सही दिशा में होही, हमर छत्तीसगढ़िया मन ला नौकरी मिलही, व्यापार -व्यवसाय, खेती-किसानी में तरक्की होही! छत्तीसगढ़ी ला राजभाषा के दर्जा मिलही! ऐसन कतको अकन सपना हमर ऑंखी-ऑंखी में झूलत रीहिस। छत्तीसगढ़ के सबे संसाधन के उत्खनन अउ संवर्धन में उन्नति होवत रीहिस फेर छ्त्तीसगढ़ी ला राजभाषा के दर्जा मिलना बाँचे रीहिस, एकर पीरा हमर छत्तीसगढ़िया साहित्यकार के मन के दाहरा में हिलोरा मारत रीहिस। आखिर में रमन सिंह के सरकार हा छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग बनाइस त छत्तीसगढ़ के सबे साहित्यकार मन में खुशी के ठिकाना नइ रीहिस, लागत रीहिस कि हमर छत्तीसगढ़ी हा अब राजभाषा बन जही, सबे प्रशासनिक कारज हा अब छत्तीसगढ़ी में होही लेकिन प्रशासनिक अक्षमता के सेती सबे सपना धरे के धरे रहिगे। 
          छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग ला चलाय बर अध्यक्ष सचिव अउ कार्यालयीन कर्मचारी मनला वैतनिक रखेगिस लेकिन विडम्बना ये रिहीस कि जिला स्तर में काम करैया समन्वयक मनला अवैतनिक रखेगीस। बीच में पॉंच हजार रुपिया हर महीना देयके बात उठे रीहिस फेर उहू हा कचरा में फेंकागे। जिला स्तर में ये समन्वयक मन आज भी छत्तीसगढ़ी भाषा के असली सेवा करथे। छत्तीसगढ़ सरकार में राजभाषा आयोग के जिलास्तर में नेतृत्व करैया ये जिला समन्वयक मन के कोनो देखैया पुछैया नइ हे। ये मन अपन पैसा खरचा करके छत्तीसगढ़ महतारी के सेवा करथे। ये समन्वयक मन लगातार आयोग के शोषण के शिकार होय हे। 
          छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के चाहे कार्यालय स्थापना दिवस होय, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग दिवस होय या प्रान्तीय अधिवेशन होय ये समन्वयक मन ला ट्रेन या बस के टिकट दिखाबे तभे ओतकेच रुपिया मिलथे जतका रुपिया ये मन बस या ट्रेन में आय जायबर खर्चा करे रथे। आटो रिक्शा चाय पानी के खर्चा तो ये मनला कभू मिलबे नइ करे। कतकोन स्वाभिमानी समन्वयक मन बस ट्रेन के पैसा लेबे नइ करे ये मन अपन पैसा में आथे जाथे । आयोग में कोनो आयोजन होही त जिलास्तरीय बरदिहा के बुता जिला समन्वयक के रहिथे। ये मनला जिला स्तर में निर्धारित संख्या में साहित्यकार मंगवाये जाथे। साहित्यकार मन ला कार्यक्रम स्थल में लेगे के बाद ईंकर काम खतम। ये समन्वयक मन अपन जिला के बड़का साहित्यकार रहिथे लेकिन ये मन ला वक्ता के रूप में स्थान मिले न कवि सम्मेलन ला छोड़के कोनो दूसरा सत्र में सम्मानजनक स्थान नइ मिले। कोनो कार्यक्रम में सबे जिला समन्वयक मन अतकी कहिके मन ला मड़ालेथे कि चलो रे भाई छत्तीसगढ़ महतारी के सेवा करथन। ये मन छत्तीसगढ़ी भाषा के सच्चा सेवक आय, एकर सेती  ये मन मान सम्मान के ध्यान नई देके, छत्तीसगढ़ महतारी के सेवा करथे। आयोग द्वारा भुलावा में रखके ईंकर उपयोग ऐसे किये जाथे जैसे दूध के मॉंछी। छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग जिला समन्वयक कहिबे त ऐसे लागथे जैसे आयोग के बहुत बड़े अधिकारी होही लेकिन ढोल तरी पोल मशाल तरी अंधियार। ये पद के नाम जिला स्वयंसेवक रखे जाय ते जादा अच्छा रही। 

         छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग हा समन्वयक ही नहीं छत्तीसगढ़ी साहित्यकार मन के तक शोषण करथे, साहित्यकार मन ला बलाके सिरिफ बस ट्रेन के किराया या कार के दस रुपिया प्रति किलोमीटर के पैसा भर दे देथे, बिचारा मन भात साग खाके हाथ हलावत चल देथे। 

          आयोग में एक झन ऐसे साहित्यकार हे जेन हा सत्ताधारी पार्टी के सदस्य हे, तेन हा पूरा आयोग ला पोगरा के बैठे हे। ओकर आदेश पत्थर के लकीर होगे हे। वो बाहॉं चढ़ाये आयोग के सबे कर्मचारी मन ला निर्देशित करत रहिथे, बड़े बड़े साहित्यकार मनके आयोग में कोनो पुछैया नइ हे। एकर लंगोटी धोवैया कईझन हे जेकर पिछला दुवारी ले आगमन होगेहे। जेमन अब सबे समन्वयक, बड़का साहित्यकार अउ आयोग के कर्मचारी मन ला आदेशित करत हवे। लंगोटी धोवैया मनके राज में स्वाभिमानी साहित्यकार मन कोंटा में तिरियागेहे। 

         छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग जब ले बने हे स्व.श्यामलाल चतुर्वेदी, स्व.दानेश्वर शर्मा अउ डॉ.विनय कुमार पाठक अध्यक्ष बनिस। हमर ये साहित्यिक पुरोधा मन नींव के पथरा बनके आयोग ला मजबूती  देके काम करीसे। सबे अध्यक्ष के कार्यकाल में आठवॉं अनुसूची में छत्तीसगढ़ी विषय में ढोल पीटत दिन बीतगे फेर सही दिशा में निशाना नीं लग पइस, काबर कि आयोग ला ओतका मजबूते नइ करेगेहे। हॉंथ गोड़ ला बॉंध के दाहरा में छोड़े तैराक बनके रहिगेहे आयोग हा। अब तक एला पूरा आजादी नइ मिले हे। बड़े बड़े दिग्गज अउ उत्साही साहित्यकार मन हा अध्यक्ष बनिन फेर अब तक बने हकन के काम नइ कर सकिन। 

            छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के सबे अध्यक्ष में डॉ.विनय कुमार पाठक के कार्यकाल में छत्तीसगढ़ी भाषा ऊपर जमके काम होईस। कतको अकन काम के क्रम में एम. ए. छत्तीसगढ़ी के पाठ्यक्रम के शुरुआत डॉ.विनय कुमार पाठक के कार्यकाल में होईस तब ऐसे लागे कि छत्तीसगढ़ी में एमए करलेव सरकारी नौकरी पक्का। आज छत्तीसगढ़ी में एम ए करैया लइका मनहा बेरोजगार घूमथे, सरकार ला चाही कि पाठ्यक्रम खोले हव त रोजगार भी देव,तभे तो ये लइका मन के सपना अउ पाठ्यक्रम खोले के उद्देश्य पूरा होही। 

         छत्तीसगढ़ी भाषा संस्कृति के नंगाड़ा बजैया मनखे मनके मुड़ी में गाज तब गिरगे जब भुपेश बघेल के सरकार हा आयोग ला अध्यक्ष विहीन करदिस। बिगर ताज के राजा ला राजा कोन मानही ? बिगर कलश के मंदिर में पूजा कोन करही? अउ बिगर पंख के चिरई कतका उड़ाही ?
        ताज विहीन राजभाषा आयोग के सचिव डॉ.अनिल भतपहरी हा अपन कार्यकाल में बढ़िया काम करिसे। जिला समन्वयक अउ साहित्यकार मन ला सम्मान देके
 कोशिश अउ छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य अउ संस्कृति के रखवारी में करे एकर काम सुरता करे जाही। 
          आज सरकार बदल गेहे अब छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साय के सरकार हे, संस्कृति मंत्रालय हा अब विष्णु देव साय के अधीन काम करथे। राजभाषा आयोग के रमन सिंह के दो कार्यकाल अउ भूपेश बघेल के एक कार्यकाल के लेखा जोखा करथन त जतका ऊँचाई रमन सिंह के कार्यकाल में होय रीहिसे भूपेश बघेल केे मुख्यमंत्रित्व काल में छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य अउ संस्कृति हा ओतकेच गड्ढा में बोजागेहे। एला उबारे के बुता मुख्यमंत्री विष्णु देव साय जी स्वयं अपन हाथ में लेहे तभे तो 28 नवंबर 2024 के छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस के कार्यक्रम में पहिली बेर मुख्यमंत्री के आगमन होय रीहिस ये बात चर्चा के विषय हे। 
         अब हमन ला आशा बंधे हे कि हमन ला अपन अध्यक्ष मिल जही, राज्य सम्मान प्राप्त साहित्यकार अउ कलाकार के पुछारी होही। जिला समन्वयक अउ साठ साल के ऊपर के वरिष्ठ साहित्यकार मन ला सम्मानजनक मासिक राशि मिलही, छत्तीसगढ़ी में एम.ए. करैया लइका मन ला नौकरी में प्राथमिकता मिलही, शासकीय कार्य में छत्तीसगढ़ी भाषा के उपयोग होही, न्यायपालिका, कार्यपालिका, व्यवस्थापिका में छत्तीसगढ़ी के उपयोग बढ़ही। एकर पहिली कि छत्तीसगढ़ी भाषा अउ संस्कृति के दीया बुताके अंधियारी छा जाय ओला जीवन देयबर तेल डारना जरूरी हे। प्रभावहीन छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग में नवॉं जान डाले बर छत्तीसगढ़ी भाषा बर दहाड़ के बोलैया मजबूत साहित्यकार ला अध्यक्ष बनाके छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोगरुपी मंदिर में कलश चढही तभे हमर छत्तीसगढ़िया अउ छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के उद्धार होही। 
           ०००

डॉ.अशोक आकाश 
वरिष्ठ साहित्यकार
बालोद
9755889199

जनजातीय समाज का गौरवशाली इतिहास

*जनजातीय समाज का गौरवशाली इतिहास*

      भारत का जनजातीय समाज अपनी पारम्परिक विशेषता के लिए पहचाना जाता है । इस समाज में मौखिक शिक्षा की परम्परा रही है। अपनी सभ्यता संस्कृति और सहजता की विशिष्टता लिए यह समाज विश्व स्तर में अलग पहचान बनाए हुए हैं।

          वर्तमान भारत के निर्माण में भारतीय जनजातीय समाज ने अपना अभूतपूर्व योगदान दिया है। अतीत से लेकर वर्तमान तक इन जनजातीय समाजों का गौरवशाली इतिहास है। इस समाज ने अपनी कर्मठता, सहजता, सरलता और सत्य निष्ठा के लिए विश्व में ख्याति अर्जित की है ।  प्रकृति के साथ जीवन जीते इस समाज में औषधीय पहचान की अद्भुत क्षमता है। विकास के विभिन्न दौर से गुजर कर जनजातीय समाज ने उन्नति के चरम उत्कर्ष का स्पर्श कर लिया है। ज्ञान का अतुलनीय भण्डार लिए आदिवासी समाज का देश की उन्नति में विशिष्ट योगदान है। 

        आदिकाल से आदिवासी समाज उपेक्षा और उत्पीड़न का शिकार रहा । राष्ट्र विकास में उल्लेखनीय योगदान के बावजूद इस समाज को हमेशा उपेक्षा, प्रताड़ना और ठगी का शिकार होना पड़ा। मेहनत के दम पर शौर्यता जीवन जीने के बावजूद इन्हें अपेक्षित सम्मान नहीं मिल पाया । समय ने अब करवट बदल लिया है, अब इस समाज ने विकासपथ पर अपनी दस्तक से दुनिया को झंकृत,अचम्भित कर दिया है। आज जनजातीय समाज के गौरवशाली इतिहास को दुनिया के सामने लाने की जरूरत है ताकि हमारी पीढ़ियाँ हमारे पूर्वजों के गौरवशाली इतिहास को जान सके और अपनी सभ्यता संस्कृति परम्परा पर गर्व कर सके। हमारे देश में आदिवासी समाज का गौरवशाली अतीत है। इस समाज ने ऐतिहासिक सामाजिक एवं आर्थिक योगदान से देश को परिपुष्ट किया है यह समाज वीरों एवं वीरांगनाओं की बलिदानी गाथा से उर्वर है। हमें जनजातीय समाज की पुरातन परम्पराओं एवं ज्ञान को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है जिससे भावी पीढ़ी जनजातीय समाज की सामाजिक पृष्ठभूमि से अवगत हो सके । 

        हमारे जनजातीय समाज की संस्कृति विश्व के विकसित देशों के लिये कौतूहल का विषय है। यहॉं की सभ्यता, संस्कार, कला एवं आजीविका पर हो रहे शोध से जनजातीय व्यवस्था की उत्कृष्टता का पता चलता है। ये जनजातीय समाज हमारा राष्ट्रीय गौरव है हमें अपनी जनजातीय संस्कृति की रक्षा करनी है जिससे इस समाज की वैश्विक विशिष्टता कायम रह सके। जिस समाज की संस्कृति नष्ट हो जाती है वह समाज भी मिट जाता है। हमें अपनी सभ्यता और संस्कृति को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है । हमें अपने गौरवशाली इतिहास और संस्कृति को युवा पीढ़ी को सौपना होगा और युवाओं से निवेदन है आप जितने भी बड़े पद में सुशोभित हो जाएँ लेकिन हमारी सभ्यता संस्कृति की बागडोर हमेशा थामे रहना । ताकि हमारी सॉंस्कृतिक धरोहर अक्षुण्ण रह सके। 

       हमारे जनजातीय समाज के वीरता की गाथा जग प्रसिद्ध है। यहॉं वीरांगनाएँ  प्रताड़ित होकर भी देश के लिए संघर्ष करती रही हैं। हमें इस समाज की जीवन शैली, सामाजिक संस्कारों की विशिष्टता, पुरुष,महिला एवं बच्चों के जीवन की संघर्ष गाथा लिखित रूप में आगे लानी होगी, जिससे हमारी भावी पीढ़ी को इनके गौरवशाली इतिहास की जानकारी हो सके।

        हमारे आदिवासी समाज ने ही अस्त्र-शस्त्र और मंत्र विद्या का आविष्कार किया, जिससे इन्होंने आत्मरक्षा, देश सुरक्षा और जन-जन की रक्षा का दायित्व निर्वहन कर अन्य समाज की भी बड़ी सेवा की है । आज हमारे आदिवासी जनजातीय समाज के इतिहास पर विदेश में शोध कार्य हो रहे हैं लेकिन आश्चर्य है हमारी दृष्टि हमारे समाज की गौरवशाली अतीत पर नहीं है। हमारे आदिवासी समाज के इतिहास का लेखन दूसरे लोग कर रहे हैं। जरूरत है कि हम अपने समाज और अपने पूर्वज की कहानी लिखकर दूसरे समाज तक लाएँ, जिससे हमारे पूर्वज की जिंदगी पर लिखकर हम न्याय कर सकें। विदेशी लेखक हमारे आदिवासी समाज की गौरवगाथा तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत कर रहे हैं। कुछ किवदन्तियाँ जोड़कर हमारे गौरवशाली सामाजिक इतिहास को विकृत बनाने से रोकने के लिये हमें अपने सामाजिक गौरव को कलमबद्ध करने की जरूरत है । आदिवासी समाज के महापुरुषों की जीवन गाथा, उन पर प्रश्नोत्तरी, फोटो प्रदर्शनी, पेंटिंग, नाटक, साँस्कृतिक कार्यक्रम जैसे विविध आयोजन स्कूल, कॉलेज, ग्राम के सामाजिक कार्यक्रम में निरंतर करते रहने की जरूरत है । जिससे आदिवासी समाज के महापुरुषों की जीवनी जन-जन तक पहुँच सके । 

      हमारे आदिवासी समाज का देश की स्वतंत्रता, पुनर्निर्माण एवं विकास में योगदान अतुलनीय है इसे प्रत्येक समाज को चीखकर, पुकार कर और ताल ठोक कर बताने की जरूरत है । बड़े ही दुख का विषय है कि हमारी अपनी ही पीढ़ी के बच्चों को अपने बाप दादा की वीरता की कहानी नहीं मालूम ! हमारी पीढ़ी को अपने पूर्वजों की गौरव गाथा कोई दूसरा बताने थोड़ी आएगा? हमें खुद बतानी होगी ! तो सर्वप्रथम हमें अपना कमर कस लेना होगा जिससे हम अपनी सामाजिक गौरवशाली अतीत का लेखन कर विभिन्न आयोजनों में वाचन एवं मंचन कर लोगों को अपनी सामाजिक गौरवगाथा बलिदान बता सकें। आजादी से पूर्व और आजादी के बाद के परिदृश्य में जमीन आसमान का अन्तर है। जीवन की टेढ़ी मेढ़ी पगडण्डी में दुखों के अनगिन पहाड़ एवं खाईयों के बीच के अंतर व्यथा में हमने अपनी कुर्बानिया को लगभग भुला दिया है जिसे याद करने हैं, लिखने हैं और अपनी सामाजिक महापुरुषों के कृतित्व एवं व्यक्तित्व देश दुनिया के सामने लाने हैं। 

        भारतीय इतिहास जहाँ से प्रारम्भ होता है, हमारे आदिवासी समाज का इतिहास भी वहीं से प्रारंभ होता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से भारतीय जनजाति समाज की रीति-नीति संस्कार का काव्यात्मक चित्र प्रस्तुत कर रामचरितमानस महाग्रंथ को रोचक और जन-जन में लोकप्रिय बना दिया । हम आज भी अपने पारिवारिक एवं सामाजिक अंतर्द्वंद में जूझकर अपनी शक्ति अपनी क्षमता नष्ट न करें । अपनी शक्ति का अपनी समझ का सदुपयोग कर सामाजिक जागरण का केंद्र बिंदु बनें। रामचरितमानस का शबरी प्रसंग हमारे आदिवासी समाज की आध्यात्मिक चरमोत्कर्ष का केंद्र बिंदु है । जिनके जूठे बेर भगवान राम ने प्रेम विह्वल हो ग्रहण किया था। 

      देश की आजादी में आदिवासी समाज का महत्वपूर्ण योगदान रहा। हमारे आदिवासी समाज ने देश में क्रांति का बिगुल फूँक कर अंग्रेजी शासन के खिलाफ सीना तानकर खड़ा रहा। परलकोट विद्रोह, सिद्धो कान्हो, भूमकाल, पामगढ़ भील क्रांति जैसे आदिवासी जनक्रांति हमारे जनजाति समाज का सीना चौड़ा करने काफी है । जनजातीय समाज की गौरवगाथा पुस्तकाकार में जन-जन तक लाने की जरूरत है ताकि हमारी पीढ़ी को हमारे आदिवासी समाज की सभ्यता, संस्कृति एवं राष्ट्रीय चेतना, राष्ट्रीय एकता, राष्ट्र जागरण एवं भारत माता को गुलामी की बेड़ी तोड़ने में किए गए योगदान की जानकारी हो सके। इससे हमारे आदिवासी समाज की अंग्रेजों द्वारा बनाई गई विकृति छवि को सुधारने का शुभ अवसर भी होगा। शिक्षा जगत में आदिवासी समाज के मूर्धन्य विद्वान शीर्षस्थ हैं, ऐसे विद्वतजनों से नम्र निवेदन है हमारे समाज की परम्परा, सभ्यता, संस्कृति, धरोहर,इतिहास पर विशेष शोधपूर्ण लेखन करें जिससे हमारी पीढ़ी को जनजातीय समाज के गौरवशाली इतिहास की जानकारी हो सके और हमारे स्वर्णिम इतिहास पर पड़े धूल धक्कड़, पर्दा हट सके। समय ने करवट बदल लिया है, अब अधिकांश जनजातीय समाज मौखिक शिक्षा अंधविश्वास कुरीतियों से ऊपर उठकर लिखित एवं वाचिक शिक्षा की परम्परा का निर्वाह कर अपने उद्देश्य में सफल होकर नित नयी ऊँचाइयों का स्पर्श कर रहे हैं। लेकिन अभी भी कुछ जनजातीय समाज को वक्त के धारे के साथ चलकर मौखिक शिक्षा से ऊपर उठकर लिखित एवं वाचिक शिक्षा की परम्परा बनानी होगी, इससे हमारे आदिवासी समाज का देश हित में किए गए अद्वितीय योगदान की जानकारी पूरी दुनिया को हो सके। 

डॉ.अशोक आकाश
कोहंगाटोला बालोद छत्तीसगढ़, ४९१२२६.
मो.नं.९७५५८८९१९९