"हजारी लाल के ऑंसू" छत्तीसगढ़ी कहानी
हजारी लाल जैसने अपन घर ले बाहिर गोड़ मड़ाईस, परोसी मन घूर-घूर के देखे लगीस। परोन दिन बिहनिया ओकर बेटा शोभित ला पुलिस ऊपर पथरा फेंके के जुलुम में गिरफ्तार करे गे रीहिस। नेता अफसर मन के दिन भर चक्कर काटे के बाद भी शोभित ला घर लाय के कोनो जुगाड़ नइ जमीस। ओकर ऊपर दंगा भड़काय, शासकीय काम में बाधा डाले अउ आतंक मचाय के धारा लगादीस। पारा के सबे मनखे मन ईंकर परिवार के मेहनत अउ तरक्की ला देख के अब्बड़ जलन भाव राखय। एकर सेती ये मन ला दुखी देखके, ओ मन ला पहिली बेर सुख के अनुभति होईस।
हजारी लाल अउ ओकर बाई मोना दिन रात इहॉं ले उहॉं घूम-घूमके थकगे, ओकर बदन करियागे, मुहूँ सुटकगे रीहस फेर ओकर दुलरवा बेटा ला छोड़ाय के कोनो जुगाड़ नइ जमिस, न दिन में आराम न रात में नींद।
इही तो दुनिया आय, मुसीबत में घिरे मनखे के सहारा बने ला छोड़ के ओकर मजबूरी के लाभ उठैया कतको हे। बखत के मार हा बड़े - बड़े बलशाली ला कोकराके मड़ियाय ल मजबूर कर देथे। शोभित प्रजातंत्र के चौथा स्तम्भ पत्रकारिता के क्षेत्र में ईमानदारी से काम करत रीहिस। ओहा जानत रीहिस कि जीवन कैसे जीना हे, का अच्छा हे का बुरा हे। ओकर बचपन के एक दू झन संगवारी मन मंदहा होगे रीहिसे, महतारी मोना के कतको रोक टोक के बाद भी ऊँकर दोस्ती नई छूट सकिस। गलत संगति के सजा अच्छा मनखे ला घलो भुगते ला पर जथे। बेरा के पटकनी में शोभित के उज्जर जिनगी में फोकटे फोकट दाग लगगे।
ठोकर जीवन के पाठशाला हरे, कुछ मनखे ठोकर खाके सम्हल जथे अउ सुधर जथे, कुछ मनखे मन नवॉं तरीका ले अपडेट होके फेर उही रद्दा में चल पड़थे त कुछ मनखे के जिनगी के दिशा बदल जथे। शोभित हा पत्रकारिता के माध्यम ले सच ला जनता के आगू लाके, भ्रष्टाचारी मन ला एकक करके लाईन में खड़े कर दे रीहिस। एकर सेती शोभित के पॉंव पुट दुश्मन बन गे रीहिस।
शोभित ह "प्रजातंत्र के चौथा स्तंभ" के मर्यादा निभात, शहर म बनत एक बड़े सरकारी पुल के भ्रष्टाचार के भंडाफोड़ कर दे रीहिस। ओहा अपन रिपोर्ट म सप्रमाण देखाय रीहिस कि कैसे नेता अउ बड़े अफसर मन मिलके घटिया निर्माण सामग्री के प्रयोग करत हें, जेकर सेती कतको मनखे मन के जान ला खतरा हे।
शहर म उही पुल के पास जनता ह विरोध प्रदर्शन करत रीहिस। मंदहा संगवारी मनके उभरौनी में शोभित उहॉं केवल एक पत्रकार के नाते सच ला रिकार्ड करे बर गे रीहिस। अचानक भीड़ म कुछ "भाड़ा के गुंडा" मन घुँसगे, जे मन ला उही भ्रष्टाचारी नेता मन भेजे रीहिन। जइसे ही पुलिस ह भीड़ ला तितर-बितर करे के कोशिश करिस, उही गुंडा मन पुलिस ऊपर पथरा फेंके बर शुरू कर दीस। तब जवाब में शोभित के मंदहा संगवारी मन तक पथरा चला दे रीहिन। शोभित ह अपन कैमरा म ऊँकर मन के चेहरा कैद कर ले रीहिस, जे मन असल म पथरा फेंकत रीहिन त ओकर कैमरा ला छीने बर पुलिस के भेस म कुछ मनखे ओकर ऊपर टूट पड़िन।
शोभित ह अपन कैमरा ला बचाए बर जब संघर्ष करिस, त ओला "शासकीय काम म रुकावट" अउ "पुलिस ऊपर हमला" के झूठा आरोप में फँसा दीस। ओकर ऊपर पुलिस ऊपर पथरा फेंके, भीड़ ला उकसायके, सरकारी काम में बाधा डारे के झूठ मूठ आरोप लगादीन ताकि दुनिया ला ये लगे कि एक पत्रकार ह दंगा भड़कावत हे।
हजारी लाल जब जेल म शोभित ले मिलिस, त ओकर ऑंखी म आँसू रीहिस। शोभित ह सिसकत कहिस-
"बाबू, मैं हाथ म कलम एकर बर धरेंव कि मैं सच लिख सकँव, फेर ये भ्रष्ट तंत्र ह मुहीं ला अपराधी बना दीस। मैं पुलिस ऊपर पथरा नइ फेंके हौं, मैं तो ओ मनखे मन के चेहरा ला दुनिया ला देखाना चाहत रहेंव, जे मन आम जनता के हक नँगावत हें।"
हजारी लाल ला अब समझ आइस कि शोभित ला ओकर ईमानदारी के सजा मिले हे। शोभित ह भ्रष्टाचारी मन के ऑंखी के किरकिरी बन गे रीहिस, जेकर सेती ओ मन ओला अपराधी साबित करे म लगगे रीहिन।
हजारी लाल जैसे ही अपन घर के ओसारी ले बाहिर गोड़ मड़ाईस, आगू चउपाल म बइठे परोसी गजाधर अउ बिदेसी जेन ह मंत्री के चापलूस कार्यकर्ता रीहिन तौन मन एक-दूसर कोती देखके मुस्कुराइन। गजाधर ह जोर से सुनावत कहिस—
"का होगे हजारी भाई? बड़े जोर-सोर ले बेटा ला पढ़ा-लिखा के पत्रकार बनाये रेहे, अब तो ओहा 'बड़का नाम' कमा लीस! पेपर म ओकर फोटो छपे हे, फेर हाथ म कलम नइ, पथरा हे। अब बताव पुलिस ऊपर हमला करना अउ दंगा भड़काना ही तुहर संस्कार आय का?"
बिदेसी ह घलो बहती गंगा म हाथ धोवत कहिस— "सही कहत हस गजाधर, अतका घमंड रीहिस एकर परिवार ला अपन तरक्की ऊपर। देख ले, भगवान के घर म अंधेर नइ हे। अइसने औलाद ले त निसंतान रहना अच्छा हे, जेकर सेती कुल म दाग लग जाय।"
हजारी लाल के भीतर जैसे कोनो ज्वालामुखी फूट पड़े रीहिस। ओकर बदन गुस्सा अउ दुख ले कांपे लगीस। ओहा थिरकत आवाज संग कड़ा स्वर म कहिस - "चुप रहा बिदेसी! अउ तहूँ चुप रा गजाधर! तुमन ला का लगथे कि मोर शोभित अपराधी आय? जेन लइका ह रद्दा म गिरत मनखे ला देख के हॉंसे नहीं, तुरत उठाय बर दौड़ पड़थे, कोनो चहकत चिरई मन ला कभू नइ मारिस, ऊँकर चहकन भरे आजाद जिंदगी में अपन मन के खुशी देखथे। ओहा कभू पुलिस ऊपर पथरा फेंकही? दुशमनी करैया, जलन मरैया मनखे संग हॉंस के गोठियाथे मोर बेटा हा। तुमन तो ओकर मेहनत ले जरत रहेव, एकर सेती आज तुमन ला सुख मिलत हे। फेर सुरता राखहू शोभित के हाथ म पुलिस ह जबरदस्ती के आरोप लगायहे, काबर कि ओकर कलम ह तुँहर चहेता नेता मन के भ्रष्टाचार के पोल खोलत रीहिस।"
हजारी लाल के ऑंखी ले अंगारा बरसत रीहिस। ओहा आगू कहिस - " का सच्चाई ला कालिख पोत के लुकाये जा सकथे, अउ कतक दिन ले? आज मोर बेटा के उज्जर जिनगी में दाग लगादीन बेईमान मन, फेर मोर अंतरात्मा काहत हे कि मोर बेटा निर्दोष हे। तुमन ला तमाशा देखे म मजा आवत हे न? देख लेव... फेर जब सच बाहिर आही, त तुमन अपन मूंह लुकाये बर जगा नइ पाहू।"
अतका कहिके हजारी लाल हफरगे, मोना ह भीतर ले दौड़ के आइस अउ हजारी के हाथ ला धरके सम्हाल लिस। परोसी मन ह हजारी के अइसे उग्र रूप ला देख के सन्न रहिगे। हजारी लाल के ऑंखी म आँसू अउ गुस्सा के अइसे संगम रीहिस कि सकलाय दसों मनखे मनके बोले के हिम्मत नइ होइस।
हजारी लाल के गोड़ ह भारी होगे रीहिस, मानो कोनो ओकर गोड़ म मन भर के सांकर बांध दे होही। परोसी मन के खुसुर-फुसुर अउ ओकर तिरछी नजर ह ओला बाण कस चुभत रीहिस। जेन मनखे काली तक शोभित ला "गाँव के गौरव" कहत थकें नइ, आज उही मन ओला "आतंकवादी" कहे बर तइयार बइठे रीहिन।
हजारी लाल ह कछेरी के सीढ़ी चढ़त-चढ़त थक गे रीहिस। ओकर ऑंखी के आँसू ह घलो अब सूख के पथरा होगे रीहिस। वकील मन के फीस अउ दलाल मन के दलाली म ओकर घर के गहना-गूँठा सब बेंचागे। फेर शोभित जेल के करिया कोठी ले नइ निकल पईस। हजारी लाल जब जेल के भारी लोहा के दरवाजा तीर पहुँचिस, त ओकर भेंट जेल के संतरी बचपन के संगवारी भोला ले होईस। भोला के ऑंखी म कोनो दया भाव नई रीहिस, बस एक लालच के चमक रीहिस। हजारी लाल ह हाथ जोड़ के बिनती करिस, "भोला भाई, मोर लइका शोभित ले एक बेर मिला दे।"
भोला ह तिरछी नजर ले देखिस अउ खैनी थूँकत कहिस, "अतका अराम ले नई मिले हजारी। ये जेल आय, इहॉं हवा घलो बिना कीमत के नई मिले। अउ तोर बेटा ऊपर तो 'आतंक' के धारा लगे हे।"
उही मेर एक दूसर संतरी बंधू घलो आ गे। ओहा धीरे से हजारी लाल ला बाजू म ले जाके फुसफुसाइस, "देख हजारी, हमर साहब मन ला खुश करना पड़थे। जेल के भीतर अपराधी मन ला बीड़ी, सिगरेट, दारू अउ मोबाइल रिचार्ज तक के बेवस्था हो जाथे, फेर एकर बदला मोटा रकम लगथे अगर तोर बेटा ला बिना मार-पीट के अराम से रखना हे, त 'खर्चा-पानी' के इंतजाम कर।"
हजारी लाल सन्न रह गे। ओहा सोचिस—बाहिर नेता मन भ्रष्टाचार करत हें अउ ये रक्षक मन भक्षक बने हें। बंधू ह आगू कहिस, "जेन मनखे मन ह शोभित ला फँसाए हे, ओ मन हम ला पैसा दे हे, ओला तंग करे बर। अब अगर तूमन शोभित ला बचाना चाहत हव, त ओकर ले दोगुना रकम देना पड़ही।"
हजारी लाल के ऑंखी ले टपटप आँसू गिरे लगीस। ओकर मन म हूक उठीस— 'मोला काय मालूम रीहिस भगवान कि न्याय के मंदिर कहे जाने वाले ये जगह म ईमानदारी के नीलामी होथे।'
शोभित ले मिले बर भोला अउ बंधू ह हजारी लाल ले ओकर हटहा अंगूठी अउ गॉंठ म बंधाय आखिरी के पाँच सौ रूपया घलो झपट लीन। जब हजारी लाल ह शोभित ला देखिस, त ओकर कलेजा फटे कस होगे। शोभित एक कोना म डर्राय दुबके बइठे रीहिस, धीरे से कहिस, "बाबू, इहॉं सबे जिनिस बिकाऊ हे। संतरी मन मोला मोबाइल में बात करे बर कहत रीहिन ताकि मैं तुँहर मन करा फोन लगाके अउ पैसा मंगा सकौं, फेर मैं मना कर देंव। बाबू, ये मन मोला तोड़ना चाहत हें।"
हजारी लाल ह अपन बेटा के काँपत हाथ ला थामिस अउ संतरी मन कोती देखिस, जेन मन दूरिहा में खड़े होके अइसे हॉंसत रीहिन मानो कोनो शिकार ला फँसा ले हें। हजारी लाल ला समझ आगे कि ये लड़ाई सिर्फ कानून ले नई, बल्कि ये सड़े हुए तंत्र ले घलो हे।
कोनो मनखे राहय मुसीबत के बेरा सबके मति छिंही-बिंही हो जथे, का करँव काकर करा जाके गोहराँव, कुछू समझ नइ आय। हजारी लाल कोनो बड़ा रहीश नइ रीहिस जे अपन खजाना खोलके लइका ला नियॉंव देवा सकय। ऐसन में ओला अपन बचपना के संगवारी अजीत के सुरता आईस, नवॉंपारा महामाईं मंदिर के पाछू किराया के घर में रहिके न्याय के मंदिर के सेवा करथे, ओकर सहयोगी ममता अउ भारती दूनो के दूनो कई ठन गंभीर मामला ला आसानी से निपटाय हवे। हजारी लाल के मन में जइसे एक आस के दीया जर उठिस। जब दुनिया के रद्दा बंद हो जाथे, तब पुराना संगवारी के सुरता अइसने आथे, जइसे अंधियारी रात में ध्रुव तारा।
हजारी लाल ह तेवर मंझनिया अपन थके जॉंगर ला घसीटत नवापारा महामाईं मंदिर के पाछू पहुँचिस। उहॉं टीन छानी के साधारण घर के बाहिर बोर्ड टंगे रीहिस— "न्याय अउ सेवा केंद्र"। खिड़की में लगे गुलाबी परदा भीतर ले गोठियाय के आवाज आवत रीहिस।
हजारी लाल ह थरथरात आवाज लगाईस, "अजीत... ओ अजीत भाई?"
अंदर ले एक मनखे ह बाहर निकलिस, ओकर चेहरा म सादगी अउ ऑंखी म न्याय के चमक रीहिस। ओकर संग म ममता अउ भारती घलो आईन, वो मन फाइल अउ कानूनी सलाह वाले कागजात धरे रीहिन।
अजीत ह हजारी लाल ला देखिस त ओकर चेहरा म अचंभा आ गे। "हजारी? तैं ? ये का हाल बना डारे हस?"
हजारी लाल ह ओकर गोड़ म गिर गे अउ फफक-फफक के रोए लगीस। "अजीत, मैं उजरगे हौं। मोर शोभित... मोर दुलरवा बेटा ला 'दंगाबाज' बना के जेल म डाल दे हें। पुलिस-प्रशासन, संतरी-मंत्री सब ओकर पीछे पड़गे हे। मोला कोनो रद्दा नइ मिलत हे।"
अजीत तुरते उठाइस ममता ह पानी पियाइस। भारती ह ओकर बात ला ध्यान से सुनत रहीस अउ झटपट पेन उठा के लिखत रहीस।
अजीत ह हजारी लाल के खांध में हाथ मड़ाके कहिस, "हजारी, बिपत के बेरा में कोनो मनखे के ताकत नहीं, ओकर हिम्मत हा साथ देथे, में रोवत बर हस? हिम्मत रख हमर जवानी के दोस्ती कभू हार मानय? हम न्याय के मंदिर के सेवा करथन, अउ जब तक हमर कलम चलत हे, तब तक कोनो बेकसूर ला जेल म सड़न नइ देन।"
ममता ह ओकर तरफ देख के कहिस, "हजारी कका, घबरा झन। हमन सुनत अउ पढ़त हन कि शोभित ह भ्रष्टाचार के कोनो बहुत बड़े राज ला उजागर करे बर चाहत रीहिस। ओही राज के डर ले ओला फंसाए गे हे।"
अजीत का सबे मामला ला पूछतगीस हजारी बतावतगीस त भारती ह ओकर फाइल म शोभित के केस के सारा विवरण लिख लीस। सबे मामला ला समझके ममता के मंता भोगागे वो भड़क के कीहिस "कका, ये जेल के संतरी भोला अउ बंधू के भ्रष्टाचार के जतेक सबूत हे, ओकर जमा-जोखा हमन करबो। ईंकर मन के 'मोटा रकम' मांगे के खेल ला हमन मुख्यमंत्री के जनदर्शन अउ बड़े अधिकारी तक पहुंचाबो।"
हजारी लाल ला लागिस जइसे ओला कोनो संजीवनी मिल गे हे। अजीत ह ओला भरोसा दिलाइस, "तें चिंता झन कर। आज के रात हमन योजना बनाबो। कल जब तें फेर जेल जाबे, तब शोभित ला कहिबे कि ओकर डरे के कोनो जरूरत नइ हे। शेर के बच्चा हे ओहा, शेर कस बाहर आही।"
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हजारी लाल ओकर संगवारी अजीत, ममता अउ भारती जेल के गेट के आगू खड़ें रिहिन। आज ओ मन के हाथ म न्यायालय के वो आदेश रीहिस, जेकर बर हजारी लाल ह अपन जीवन के सब ले बड़े संघर्ष करे रीहिस। शोभित के बेकसूर होय के प्रमाण मिल गे रीहिस, अउ ओकर रिहाई के हुकुम हो गे रीहिस।
हजारी लाल के धड़कन बढ़त जात रीहिस। ओकर मन म एक आस रीहिस— 'अपन बेटा ला फेर देखूं, ओकर हाथ ला थाम के घर ले जाहूं।'
जेल के भीतर के आखिरी दृश्य
जेल के भीतर संतरी भोला अउ बंधू के चेहरा आज उतरी गे रीहिस, काबर कि गिरिराज अउ मंटू के स्टिंग ऑपरेशन ह ओ मन के कमर तोड़ दे रीहिस। जब हजारी लाल शोभित के कोठरी म पहुँचे, त शोभित ह दीवाल ला टेक के बइठे रीहिस। ओकर देह म जगह-जगह जखम के निसान रीहिस।
हजारी लाल ह दौड़ के ओला गोदी म उठा लीस, "बेटा शोभित! देख, ददा आ गे हे। तूं अब आजाद हस, कोनो तोर बाल घलो बांका नइ कर सकय।"
शोभित ह अपन ददा के कांधा म सिर रखिस। ओकर सांस ह उखड़त रीहिस, फेर ओकर चेहरा म एक संतोष के भाव रीहिस। ओहा थथरावत आवाज म कहिस— "ददा, मोला रिहाई के दरकार अब नइ हे। ये जेल के कोठरी म ये मन मोर देह ला त तोड़ डारिन, फेर मोर कलम ला नइ तोड़ पाइन। भोला अउ बंधू ह मोला बीड़ी-सिगरेट के लालच देके घूस ले बर मजबूर करत रिहिन, अउ नेता मन के इसारा म मोर ऊपर टार्चर करिन... ददा, मैं सच ला देख के मरत हौं, इही मोर सबसे बड़े जीत आय।"
इतका कहत-कहत शोभित के प्राण ह ओकर ददा के गोदी म ही पखेरू कस उड़ गे। हजारी लाल के चित्कार ले जेल के दीवार मन घलो कांप उठिन।
एक महान फैसला
हजारी लाल के ऑंखी ह अब पथरा गे रीहिस। ओकर बेटा ह त मर गे रीहिस, फेर ओकर ऑंखी म अभी घलो वो चमक रीहिस, जेमा दुनिया ला सही रद्दा देखे के ताकत रीहिस। मोना (ददा के साथी) ह कांपत हाथ ले ओकर ऑंखी ला देखिस।
हजारी लाल ह भारी मन ले कहिस, "शोभित ह हमेशा सच के पहरेदार बन के जिये हे। आज ओकर देह नइ हे, फेर ओकर ऑंखी मन तो ये दुनिया म रहिहीं। ये ऑंखी मन वो भ्रष्टाचारी मन ला देखिहीं, जे मन आज भी खुल्लम-खुल्ला घूमत हें।"
अजीत ह आगे बढ़ के कहिस, "हजारी काका, तुमन आज एक महान काम करत हव। शोभित के ऑंखी ला दान कर देबो, त ओहा फेर से कोनो अइसे लइका के रूप म देखिही, जेन ह न्याय बर लड़ही।"
जेल के गेट ले बाहर निकरत हजारी लाल के हाथ म शोभित के देह नइ, ओकर अमर विचार रीहिस। शहर भर म शोभित के बलिदान के चर्चा रीहिस। कतको दिन बाद, अस्पताल ले खबर आइस कि शोभित के ऑंखी ला एक गरीब लइका ला लगाय गे हे।
आज जब हजारी लाल वो लइका ला देखथे, त ओला लागथे कि शोभित फेर लौट के आ गे हे। वो लइका के ऑंखी म हजारी लाल ला शोभित के ओ ईमानदारी अउ ओकर "ऑंखी" के तेज दिखथे। हजारी लाल के अब कोनो दुख नइ रीहिस, ओला लागिस कि ओकर बेटा कभू नइ मरिस—ओहा त अब एक नइ, बल्कि हज़ारों ऑंखी बन के सच ला देखत हे।
सीख:
"सच ला दबाए बर कतको कोशिश कर लेव, फेर सच ह कोनो न कोनो रूप म सामने आके ही रहिथे। मनखे मर जाथे, फेर ओकर देखे के नजरिया अउ ओकर विचार अमर रहिथे।"
हजारी लाल के गोड़ ह भारी होगे रीहिस, मानों कोनो ओकर पॉंव म मन भर के सांकर बांध दीस होही। परोसी मन के खुसुर-फुसुर अउ ओकर तिरछी नजर ह ओला बाण कस चुभत रीहिस। जेन मनखे कल तक शोभित ला "गांव के गौरव" कहत थकें नइ, आज उही मन ओला "आतंकवादी" कहे बर तइयार बइठे रीहिन।
हजारी लाल ह कचहरी के सीढ़ी चढ़त-चढ़त थक गे रीहिस। ओकर ऑंखी के आंसू ह घलो अब सूख के पथरा होगे रीहिस। वकील मन के फीस अउ दलाल मन के दलाली म ओकर घर के गहना-गुंठा सब बिक गे। फेरह शोभित? ओहा त जेल के करिया कोठरी म बंद रीहिस।
ओ काल राति
एक दिन खबर आइस कि शोभित ला अस्पताल ले जाए गे हे। हजारी लाल अउ मोना पागुल कस अस्पताल कोति दौड़िन। पुलिस के कड़ा पहरा रीहिस। जब हजारी लाल ह भीतर जाके देखिस, त ओकर परान ह उही मेर थम गे। शोभित के देह म नील के निसान रीहिस, मानों ओला कोनो बेरहम मनखे ह नइ, बल्कि कोनो जंगली जानवर ह नोच डारे होवय। ओकर पत्रकारिता के धरम ह आज ओकर सजा बन गे रीहिस।
शोभित ह धीरे से अपन ऑंखी खोलिस। ओकर ऑंखी म आंसू नइ, बल्कि एक अजब किसम के चमक रीहिस। ओहा थथरावत आवाज म कहिस— "ददा, मै पथरा नइ फेंके हौं... मै त बस भ्रष्टाचार के करिया मूंह ला उज्जर करत रेहेंव।"
मर्मस्पर्शी मोड़
हजारी लाल ह शोभित के हाथ ला थामिस, फेर शोभित के सांस ह उही बखत ओकर साथ छोड़ दीस। हजारी लाल के दुनिया उजर गे। पारा-परोसी मन जेन मन तमाशा देखत रीहिन, शोभित के मौत के खबर सुनके सन्न रह गे।
फेर कहानी म असली मोड़ तब आइस जब शोभित के अंतिम संस्कार के तैयारी के पहिली शोभित के पत्रकार संगवारी मंटू हा हजारी लाल ला बताईस कि जब वोहा शोभित ला देखे हर जेल गे रीहिस त ओ हा केहे रीहिस " ध्यान लगा के सुन मंटू भाई, ददा ला बता देबे अगर मोला कुछू कहीं हो जाही, त रोवय झन। मोर ऑंखी ला दान करवा देबे, ताकि मोर मरे के बाद भी ये दुनिया म सच ला देखे बर कोनो के ऑंखी में जीयत राहँव।"
हजारी लाल ह अपन बेटा के आखिरी इच्छा पूरा करिस। शोभित के ऑंखी ला दान कर दीस। कुछ दिन बाद, हजारी लाल ला पता चलिस कि शोभित के ऑंखी एक अइसे गरीब लइका ला लगे हे, जेकर ददा ला उही भ्रष्ट नेता मन ह जमीन ले बेदखल कर दे रीहिन।
आज जब हजारी लाल ह उही लइका ला देखथे, त ओला लागथे कि शोभित मरे नइ हे। आज भी ओकर "ऑंखी" जिंयती हे अउ उही ईमानदारी के नजर ले दुनिया ला देखत हे। हजारी लाल के ऑंखी ले आंसू गिरिस, फेर आज ओ आंसू म गम नइ, बल्कि एक गर्व रीहिस।
"सत्य ला दबाए जा सकथे, फेर ओकर जोत ला बुझाय नइ जा सके। मनखे मर जथे, फेर ओकर विचार अउ ओकर देखे के नजरिया हमेशा अमर रहिथे।
हजारी लाल के गोड़ ह भारी होगे रीहिस, मानों कोनो ओकर गोड़ म मन भर के सांकर बांध दे होही। परोसी मन के खुसुर-फुसुर अउ ओकर तिरछी नजर ह ओला बाण कस चुभत रीहिस। जेन मनखे काली तक शोभित ला "गाँव के गौरव" कहत थकें नइ, आज उही मन ओला "आतंकवादी" कहे बर तइयार बइठे रीहिन।
हजारी लाल ह कचहरी के सीढ़ी चढ़त-चढ़त थक गे रीहिस। ओकर ऑंखी के आंसू ह घलो अब सूख के पथरा होगे रीहिस। वकील मन के फीस अउ दलाल मन के दलाली म ओकर घर के गहना-गुंठा सब बिक गे। फेर शोभित? ओहा त जेल के करिया कोठरी म बंद रीहिस।
एक दिन खबर आइस कि शोभित के तबीयत खराब होगे हे, ओला अस्पताल ले जाए गे हे। हजारी लाल अउ मोना बइहाय कस अस्पताल कोति दौड़िन। पुलिस के कड़ा पहरा रीहिस। जब हजारी लाल ह भीतर जाके देखिस, त ओकर परान ह उही मेर थम गे। शोभित के देह म नील के निसान रीहिस, मानों ओला कोनो बेरहम मनखे ह नइ, बल्कि कोनो जंगली जानवर ह नोच डारे होवय। ओकर पत्रकारिता के धरम ह आज ओकर सजा बन गे रीहिस।
शोभित ह धीरे से अपन ऑंखी खोलिस। ओकर ऑंखी म आंसू नइ, बल्कि एक अजब किसम के चमक रीहिस। ओहा थथरावत आवाज म कहिस— "ददा, मैं पथरा नइ फेंके हौं... मैं तो बस भ्रष्टाचार के पहिचान करात रेहेंव, सफेदपोश लोगन के करिया मुहूँ ला उज्जर करत रेहेंव।"
हजारी लाल ह शोभित के हाथ ला थामिस, फेर शोभित के सांस ह उही बखत ओकर साथ छोड़ दीस, हजारी लाल के दुनिया उजर गे। पारा-परोसी मन जेन मन तमाशा देखत रीहिन, शोभित के मौत के खबर सुनके सन्न रह गे।
फेर कहानी म असली मोड़ तब आइस जब शोभित के अंतिम संस्कार के बाद, हजारी लाल ला शोभित के एक पुरान डायरी मिलीस। ओ डायरी म शोभित ह लिखे रीहिस— "ददा, अगर मोला कुछू हो जाही, त रोबे झन। मोर ऑंखी मन ला दान कर देबे, ताकि मोर मरे के बाद भी ये दुनिया म सच ला देखे बर कोनो के ऑंखी जिंयती राहय।"
कहानी के अंत
हजारी लाल ह अपन बेटा के आखिरी इच्छा पूरा करिस। शोभित के ऑंखी ला दान कर दीस। कुछ दिन बाद, हजारी लाल ला पता चलिस कि शोभित के ऑंखी एक अइसे गरीब लइका ला लगे हे, जेकर ददा ला उही भ्रष्ट नेता मन ह जमीन ले बेदखल कर दे रीहिन।
आज जब हजारी लाल ह उही लइका ला देखथे, त ओला लागथे कि शोभित मरे नइ हे। आज भी ओकर "ऑंखी" जिंयती हे अउ उही ईमानदारी के नजर ले दुनिया ला देखत हे। हजारी लाल के ऑंखी ले आंसू गिरिस, फेर आज ओ आंसू म गम नइ, बल्कि एक गर्व रीहिस।
कहानी के सीख:
"सत्य ला दबाए जा सकथे, फेर ओकर जोत ला बुझाय नइ जा सके। मनखे मर जथे, फेर ओकर विचार अउ ओकर देखे के नजरिया हमेशा अमर रहिथे।"
लेखक
डॉ.अशोक आकाश
दिन भर चक्कर काटे के बाद भी शोभित ला घर लाय के कोनो जुगाड़ नइ जमीस। ओकर ऊपर दंगा भड़काय, शासकीय काम में बाधा डाले अउ आतंक मचाय के धारा लगादीस। पारा के सबे मनखे मन ईंकर परिवार के मेहनत अउ तरक्की ले अब्बड़ जलन भाव राखथे एकर सेती ओ मन ला दुखी देखके, एमन ला पहिली बेर सुख के अनुभति होईस।
हजारी लाल अउ ओकर बाई मोना दिन रात इहॉं ले उहॉं घूम-घूमके थकगे, ओकर बदन करियागे, मुहूँ सुटकगे रीहस फेर ओकर दुलरवा बेटा नउ छूटिस। न दिन में आराम न रात में नींद।
इही तो दुनिया आय, मुसीबत में घिरे मनखे के सहारा बने ला छोड़ के ओकर मजबूरी के लाभ लेना चाहथे। बखत के मार कतको बड़े बलशाली ला कोकरा देथे। शोभित प्रजातंत्र के चौथा स्तम्भ पत्रकारिता के क्षेत्र में ईमानदारी से काम करत रीहिस। ओहा जानत रीहिस कि जीवन कैसे जीना हे, का अच्छा हे का बुरा हे लेकिन ओकर दोस्ती एक दू झन मंदहा पत्रकार मन संग रीहिसे, महतारी मोना के कतको रोक टोक के बाद भी ऊँकर दोस्ती नई छूट सकिस। गलत संगति के सजा अच्छा मनखे ला घलो भुगते ला पर जथे। बेरा के पटकनी में शोभित के उज्जर जिनगी में फोकटे फोकट दाग लगगे।
ठोकर जीवन के पाठशाला हरे, कुछ मनखे ठोकर खाके सम्हल जथे अउ सुधर जथे त कुछ मनखे मन नवॉं तरीका ले अपडेट होके फेर उही रद्दा में चल पड़थे। शोभित हा पत्रकारिता के माध्यम ले सच ला जनता के सामने लाके भ्रष्टाचारी मन ला एकक करके लाईन में खड़े कर दे रीहिस। एकर सेती शोभित के पॉंव पुट दुश्मन बन गे रीहिस।
शोभित ह "प्रजातंत्र के चौथा स्तंभ" के मर्यादा ला निभात, सहर म बनत एक बड़े सरकारी पुल के भ्रष्टाचार के भंडाफोड़ कर दे रीहिस। ओहा अपन रिपोर्ट म सप्रमाण देखाय रीहिस कि कैसे नेता अउ बड़े अफसर मन मिलके घटिया निर्माण सामग्री के प्रयोग करत हें, जेकर सेती कतको मनखे के जान ला खतरा हे।
शहर म उही पुल के पास जनता ह विरोध प्रदर्शन करत रीहिस। मंदहा पत्रकार संगवारी मनके उभरौनी में शोभित उहॉं केवल एक पत्रकार के नाते सच ला रिकार्ड करे बर गे रीहिस। अचानक, भीड़ म कुछ "भाड़ा के गुंडा" मन घुस गे, जे मन ला उही भ्रष्टाचारी नेता मन भेजे रीहिन। जइसे ही पुलिस ह भीड़ ला तितर-बितर करे के कोसिस करिस, उही गुंडा मन पुलिस ऊपर पथरा फेंके बर शुरू कर दीस। तब शोभित ह अपन कैमरा म ऊँकर मन के चेहरा कैद कर ले रीहिस, जे मन असल म पथरा फेंकत रीहिन। ओला डराय बर अउ ओकर कैमरा ला छीने बर पुलिस के भेस म कुछ मनखे ओकर ऊपर टूट पड़िन।
शोभित ह अपन कैमरा ला बचाए बर जब संघर्ष करिस, त ओला "शासकीय काम म रुकावट" अउ "पुलिस ऊपर हमला" के झूठा आरोप म फंसा दीस। ओकर ऊपर पुलिस ऊपर पथरा फेंके, भीड़ ला उकसायके, शासकीय काम में बाधा डारे के झूठ मूठ आरोप लगादीन ताकि दुनिया ला ये लगे कि एक पत्रकार ह दंगा भड़कावत हे।
हजारी लाल जब जेल म शोभित ले मिलिस, त ओकर ऑंखी म आँसू रीहिस। शोभित ह सिसकत कहिस-
"ददा, मैं हाथ म कलम एकर बर धरेंव कि मैं सच लिख सकँव, फेर ये भ्रष्ट तंत्र ह मुहीं ला अपराधी बना दीस। मैं पुलिस ऊपर पथरा नइ फेंके हौं ददा, मैं तो ओ मनखे मन के चेहरा ला दुनिया ला देखाय बर चाहत रहेंव, जे मन आम जनता के हक नँगावत हें।"
हजारी लाल ला अब समझ आइस कि शोभित ला ओकर ईमानदारी के सजा मिले हे। शोभित ह भ्रष्टाचारी मन के ऑंखी के किरकिरी बन गे रीहिस, जेकर सेती ओ मन ओला अपराधी साबित करे म लगगे रीहिन।
हजारी लाल जैसे ही अपन घर के ओसारी ले बाहिर गोड़ मड़ाईस, आगू चउपाल म बइठे परोसी गजाधर अउ बिदेसी जेन ह मंत्री के चापलूस कार्यकर्ता रीहिन तौन मन एक-दूसर कोती देखके मुस्कुराइन। गजाधर ह जोर से सुनावत कहिस—
"का होगे हजारी भाई? बड़े जोर-सोर ले बेटा ला पढ़ा-लिखा के पत्रकार बनाये रेहे, अब तो ओहा 'बड़का नाम' कमा लीस! पेपर म ओकर फोटो छपे हे, फेर हाथ म कलम नइ, पथरा हे। अब बतावा, पुलिस ऊपर हमला करना अउ दंगा भड़काना ही तुहर संस्कार आय का?"
बिदेसी ह घलो बहती गंगा म हाथ धोवत कहिस— "सही कहत हस गजाधर, अतका घमंड रीहिस एकर परिवार ला अपन तरक्की ऊपर। देख ले, भगवान के घर म अंधेर नइ हे। अइसने औलाद ले त निसंतान रहना अच्छा हे, जेकर सेती कुल म दाग लग जाय।"
हजारी लाल के भीतर जैसे कोनो ज्वालामुखी फूट पड़े रीहिस। ओकर बदन गुस्सा अउ दुख ले कांपे लगीस। ओहा थिरकत आवाज म फेर कड़ा स्वर म कहिस—
"चुप रहा बिदेसी! अउ तहूँ चुप रा गजाधर! तुमन ला का लगथे कि मोर शोभित अपराधी आय? जेन लइका ह रद्दा म गिरत मनखे ला देख के हॉंसे नहीं, तुरत उठाय बर दौड़ पड़थे, कोनो चहकत चिरई मन ला कभू नइ मारिस, ऊँकर चहकन भरे आजाद जिंदगी में अपन मन के खुशी देखथे। ओहा कभू पुलिस ऊपर पथरा फेंकही? दुशमनी करैया, जलन मरैया मनखे संग हॉंस के गोठियाथे मोर बेटा हा। तुमन तो ओकर मेहनत ले जरत रहेव, एकर सेती आज तुमन ला सुख मिलत हे। फेर सुरता राखहू शोभित के हाथ म पुलिस ह जबरदस्ती के आरोप लगायहे, काबर कि ओकर कलम ह तुहर चहेता नेता मन के भ्रष्टाचार के पोल खोलत रीहिस।"
हजारी लाल के ऑंखी ले अंगारा बरसत रीहिस। ओहा आगू कहिस—
"सच्चाई ला कालिख पोत के लुकाये नइ जा सके। आज ओकर उज्जर जिनगी म दाग लगाय के कोसिस करे जावत हे, फेर मोर अंतरात्मा कहत हे कि मोर बेटा निर्दोष हे। तुमन ला तमाशा देखे म मजा आवत हे न? देख लेव... फेर जब सच बाहिर आही, त तुमन अपन मूंह लुकाये बर जगा नइ पाहू।"
अतका कहिके हजारी लाल हफरगे। मोना ह भीतर ले दौड़ के आइस अउ हजारी के हाथ ला धर लीस। परोसी मन ह हजारी के अइसे उग्र रूप ला देख के सन्न रहिगे। हजारी लाल के ऑंखी म आँसू अउ गुस्सा के अइसे संगम रीहिस कि कोनो म अउ बोले के हिम्मत नइ होइस।
हजारी लाल के गोड़ ह भारी होगे रीहिस, मानों कोनो ओकर गोड़ म मन भर के सांकर बांध दे होही। परोसी मन के खुसुर-फुसुर अउ ओकर तिरछी नजर ह ओला बाण कस चुभत रीहिस। जेन मनखे काली तक शोभित ला "गाँव के गौरव" कहत थकें नइ, आज उही मन ओला "आतंकवादी" कहे बर तइयार बइठे रीहिन।
हजारी लाल ह कछेरी के सीढ़ी चढ़त-चढ़त थक गे रीहिस। ओकर ऑंखी के आँसू ह घलो अब सूख के पथरा होगे रीहिस। वकील मन के फीस अउ दलाल मन के दलाली म ओकर घर के गहना-गूँठा सब बेंचागे। फेर शोभित जेल के करिया कोठी ले नइ निकल पईस। हजारी लाल जब जेल के भारी लोहा के दरवाजा तीर पहुँचिस, त ओकर भेंट जेल के संतरी बचपन के संगवारी भोला ले होईस। भोला के ऑंखी म कोनो दया भाव नई रीहिस, बस एक लालच के चमक रीहिस। हजारी लाल ह हाथ जोड़ के बिनती करिस, "साहब, मोर लइका शोभित ले एक बेर मिला देव।"
भोला ह तिरछी नजर ले देखिस अउ खैनी थूँकत कहिस, "अतका अराम ले नई मिले हजारी। ये जेल आय, इहॉं हवा घलो बिना कीमत के नई मिले। अउ तोर बेटा ऊपर तो 'आतंक' के धारा लगे हे।"
उही मेर एक दूसर संतरी बंधू घलो आ गे। ओहा धीरे से हजारी लाल ला बाजू म ले जाके फुसफुसाइस, "देख हजारी, हमर साहब मन ला खुश करना पड़थे। जेल के भीतर अपराधी मन ला बीड़ी, सिगरेट, दारू अउ मोबाइल रिचार्ज तक के बेवस्था हो जाथे, फेर एकर बदला मोटा रकम लगथे अगर तोर बेटा ला बिना मार-पीट के अराम से रखना हे, त 'खर्चा-पानी' के इंतजाम कर।"
हजारी लाल सन्न रह गे। ओहा सोचिस—बाहिर नेता मन भ्रष्टाचार करत हें अउ भीतर ये रक्षक मन भक्षक बने हें। बंधू ह आगू कहिस, "जेन मनखे मन ह शोभित ला फंसाए हें, ओ मन हम ला पैसा दे हें ओला तंग करे बर। अब अगर तूमन ओला बचाना चाहत हव, त ओकर ले दोगुना रकम देना पड़ही।"
हजारी लाल के ऑंखी ले टपटप आँसू गिरे लगीस। ओकर मन म हूक उठीस— 'मोला काय मालूम रीहिस भगवान कि न्याय के मंदिर कहे जाय वाला ये जगह म ईमानदारी के नीलामी होथे।'
शोभित ले मिले बर भोला अउ बंधू ह हजारी लाल ले ओकर अंगूठी अउ गॉंठ म बंधाय आखिरी के पाँच सौ रूपया घलो झपट लीन। जब हजारी लाल ह शोभित ला देखिस, त ओकर कलेजा फटे कस होगे। शोभित एक कोना म दुबके बइठे रीहिस।
शोभित ह धीरे से कहिस, "ददा, इहॉं सबू चीज बिकाऊ हे। संतरी मन मोला मोबाइल दे बर कहत रीहिन ताकि मैं कोनो ला फोन लगाके अउ पैसा मंगा सकौं, फेर मैं मना कर देंव। ददा, ये मन मोला तोड़ना चाहत हें।"
हजारी लाल ह अपन बेटा के कांपत हाथ ला थामिस अउ संतरी मन कोति देखिस, जेन मन दूरिहा खड़े होके अइसे हॉंसत रीहिन मानो कोनो शिकार ला फँसा लेहे। हजारी लाल ला समझ आगे कि ये लड़ाई सिर्फ कानून ले नई, बल्कि ये सड़े हुए तंत्र ले घलो हे।
कोनो मनखे राहय मुसीबत के बेरा सबके मति छिंहीबिंही हो जथे, का करँव काकर करा जाके गोहराँव, कुछू समझ नइ आय। हजारी लाल कोनो बड़ा रहीश नइ रीहिस जे अपन खजाना खोलके लइका ला नियॉंव देवा सकय। ऐसन में ओला अपन बचपना के संगवारी अजीत के सुरता आईस, नवॉंपारा महामाईं मंदिर के पाछू किराया के घर में रहिके न्याय के मंदिर के सेवा करथे, ओकर सहयोगी ममता अउ भारती दूनो के दूनो कई ठन गंभीर मामला ला आसानी से निपटाय हवे।
हजारी लाल के मन म जइसे आशा के दीया बरगे। जब दुनिया के रद्दा बंद हो जथे, तब पुराना संगवारी के सुरता अइसने आथे, जइसे अंधियारी रात म ध्रुव तारा।
हजारी लाल ह अपन लचर-पचर गोड़ ला घसीटत-घसीटत नवापारा के उही महामाईं मंदिर के पाछू पहुँचिस। उहॉं एक साधारण से घर के बाहर बोर्ड टंगाय रीहिस— "न्याय अउ सेवा केंद्र"। भीतर काकरो हँसे अउ चर्चा करे के आवाज आवत रीहिस।
हजारी लाल ह थरथरात आवाज म कीहिस, "अजीत... ओ अजीत भाई?"
अंदर ले अजीत बाहिर निकलिस, ओकर चेहरा म सादगी अउ ऑंखी म न्याय के एक अजब चमक रीहिस। जब दुनो कोई बैठक मैं पहुँचिन त आगू के सोफा में ममता अउ भारती घलो बइठे रीहिन, जेन मन फाइल अउ कानूनी सलाह के कागजात मन के बीच म मगन रीहिन।
बाजू में बैठत अजीत ह हजारी लाल लाल ला कीहिस "हजारी? तें ये का हाल बना डारे हस?"
हजारी लाल ह ओकर जांग में गिरगे अउ फफक-फफक के रोए लगीस। "अजीत, मैं उजर गे हौं, बरबाद होगे हँस, मोर ऊपर विपत्ति के पहाड़ गिरगे हवे। मोर शोभित... मोर दुलरवा बेटा ला 'दंगाबाज' बना के जेल म डाल दे हें। पुलिस-प्रशासन, संतरी-मंत्री सब ओकर पीछे पड़ गे हें। मोला कोनो रद्दा नइ मिलत हे।"
ममता ह पास आके ओला उठाइस अउ पानी पियाइस। भारती ह ओकर बात ला ध्यान से सुनत रहीस अउ झटपट पेन उठा के लिखत रहीस।
अजीत ह हजारी लाल के खॉंध में हाथ रख के कीहिस, "हजारी, तें अनपढ़ अनाड़ी कस काबर रोवत हस? हमर जवानी के दोस्ती कभू हार नई मानय? हम न्याय के मंदिर के सेवा करथन, अउ जब तक हमर कलम चलत हे, तब तक कोनो बेकसूर ला जेल म सड़न नइ देन।"
ममता ह ओकर तरफ देख के कहिस, "हजारी काका, घबरा झन। हमन सुनत हन कि शोभित ह भ्रष्टाचार के कोनो बहुत बड़े राज ला उजागर करे बर चाहत रीहिस। ओही राज के डर ले ओला फँसाए गेहे।"
भारती ह ओकर फाइल म शोभित के केस के सारा विवरण लिख लीस। "काका, ये जेल के संतरी भोला अउ बंधू के भ्रष्टाचार के जतेक सबूत हें, ओकर जमा-जोखा हमन करबो। ये लइका मन के 'मोटा रकम' मांगे के खेल ला हमन मुख्यमंत्री के जनदर्शन अउ बड़े अधिकारी तक पहुंचाबो।"
हजारी लाल ला लागिस जइसे ओला कोनो संजीवनी मिल गेहे। अजीत ह ओला भरोसा दिलाइस, "तैं चिंता झन कर। आज के रात हमन योजना बनाबो। कल जब तें फेर जेल जाबे, तब शोभित ला कहिबे कि ओकर डरे के कोनो जरूरत नइ हे। शेर के बच्चा आय ओ हा, शेर कस बाहर आही।"
हजारी लाल के आँसू अब ओकर कमजोरी नइ रीहिस, बल्कि एक ठन संकल्प बन गे रीहिस। अजीत, ममता अऊ भारती के संग मिलके, वो मन जऊन योजना बनाइन, ओमा शोभित के दू भरोसेमंद साथी—गिरिराज अऊ मंटू—के भूमिका सबले ज्यादा महत्वपूर्ण रीहिस। ये दूनो झन शोभित के पत्रकारिता के सफर के संगवारी रहिन, जऊन मन आज घलो अपन दोस्त के ईमानदारी म गर्व महसूस करथें।
आगू दिन हजारी लाल जेल के बाहिर फेर ओही संतरी भोला अऊ बंधू के आगू खड़े रहिस। फेर आज ओकर संग गिरिराज अऊ मंटू घलो रहिन। गिरिराज अपन कुर्ता के बटन म छिपे हिडन कैमरा लगाय रहिस, अऊ मंटू दूरिहा ले पूरा मंजर रिकॉर्ड करे बर एक हाई-टेक रिकॉर्डर तैयार रखे रहिस।
हजारी लाल रोय असन नाटक करत कीहिस,
“भोला भइया, घर ले कुछ गहना गिरवी रखके पैसा लाय हवँव। शोभित ला थोड़ा अच्छा खाना दे देहू अऊ एक बेर फोन में बात करा देव।”
लालच म अंधा होगे भोला अऊ बंधू तुरंत पैकेट ले लीन। भोला हॉंसत कहिस,
“हजारी, तैं चिंता झन कर। इहाँ मोबाइल के रिचार्ज अऊ दारू सब मिलथे, बस तैं पैसा देत रह। ये ले मोबाइल, 10 मिनट बात कर ले, फेर ध्यान राखबे अंदर के बात बाहिर नई जाना चाही।”
ओही बखत मंटू इशारा करके गिरिराज ला संकेत दीस। गिरिराज बड़े चालाकी ले बात ला घुमा दिस,
“अरे भोला भइया, ये शोभित तो बड़े जिद्दी हवे। कहिथे बाहिर मोर बदनामी हो गे हे। फेर ये बतावव, तुंहर मन जऊन ‘मोटा रकम’ लेथव, वो ऊपर तक जाथे का?”
भोला, जऊन ओ बखत नशा म धुत रहिस, अपन बहादुरी अऊ ‘नेटवर्क’ के घमंड म सब राज खोल दीस। वो कहिस,
“ऊपर तक? बेटा, जेल के हर कोना हमर हवे। हम जेन ला चाहबो अपराधी बना देबो, अऊ जेन ला चाहबो रिहा करवा देबो। ये तो नेताजी के आदेश रहिस कि शोभित ला तोड़ना हे, एकरे सेती हमन ओला तड़पाथन।”
सब कुछ रिकॉर्ड होगे रहिस—घूस लेय के वीडियो, जेल के भीतर दारू अऊ मोबाइल के व्यवस्था, अऊ सबले बड़े बात—नेताजी के इशारा म एक निर्दोष ला फंसाय के इकबालिया बयान।
उही साँझ, जब हजारी लाल अजीत, ममता अऊ भारती के संग वापस आइस, तब गिरिराज अऊ मंटू वो रिकॉर्डिंग ला बड़े-बड़े स्थानीय अखबार अऊ सोशल मीडिया म वायरल कर दीन।
अगला दिन सुबेरे होते-होते पूरा शहर म हड़कंप मच गे। जऊन पत्रकार ला ‘दंगाबाज’ कहिके बदनाम करे गे रहिस, ओकर समर्थन म जनता सड़क म उतर आइन। मुख्यमंत्री के दफ्तर ले जांच के आदेश जारी हो गे।
जेल प्रशासन म जऊन संतरी मन ‘राजा’ बनके बैठे रहिन, ओ मन ला तुरंत सस्पेंड कर दीस।
हजारी लाल अउ ओकर संगवारी अजीत, ममता अउ भारती जेल के गेट के सामने खड़ें रिहिन। आज ओ मन के हाथ म न्यायालय के वो आदेश रीहिस, जेकर बर हजारी लाल ह अपन जीवन के सब ले बड़े संघर्ष करे रीहिस। शोभित के बेकसूर होय के प्रमाण मिल गे रीहिस, अउ ओकर रिहाई के हुकुम हो गे रीहिस।
हजारी लाल के धड़कन बढ़त जात रीहिस। ओकर मन म एक आस रीहिस— 'अपन बेटा ला फेर देखूं, ओकर हाथ ला थाम के घर ले जाहूँ।'
जेल के भीतर संतरी भोला अउ बंधू के चेहरा आज उतरगे रीहिस, काबर कि गिरिराज अउ मंटू के स्टिंग ऑपरेशन ह ओ मन के कमर तोड़ दे रीहिस। जब हजारी लाल शोभित के कोठरी म पहुँचिस, त शोभित ह दीवाल ला टेक के बइठे रीहिस। ओकर देह म जगह-जगह जखम के निसान रीहिस।
हजारी लाल ह दौड़ के ओला गोदी म उठा लीस, "बेटा शोभित! देख, ददा आ गे हे। तें अब आजाद हस, कोनो तोर बाल घलो बांका नइ कर सकय।"
शोभित ह अपन ददा के गोदी में मुड़ी रखिस। ओकर साँस ह उखड़त रीहिस, फेर ओकर चेहरा म एक संतोष के भाव रीहिस। ओहा थथरावत आवाज म कहिस— "ददा, मोला रिहाई के दरकार अब नइ हे। ये जेल के कोठरी म ये मन मोर देह ला त तोड़ डारिन, फेर मोर कलम ला नइ तोड़ पाइन। भोला अउ बंधू ह मोला दुनिया भर के लालच देके घूस ले बर मजबूर करत रिहिन, अउ नेता मन के इशारा म मोर ऊपर टार्चर करिन... ददा, मैं सच ला देख के मरत हौं, इही मोर सबसे बड़े जीत आय।"
इतका कहत-कहत शोभित के प्राण ह ओकर ददा के गोदी म ही चिरई कस उड़ागे। हजारी लाल के चित्कार ले जेल के दीवार मन घलो काँपगे।
हजारी लाल के ऑंखी ह अब पथरा गे रीहिस। ओकर बेटा ह मर गे रीहिस, फेर ओकर ऑंखी म अभी घलो वो चमक रीहिस, जेमा दुनिया ला सही रद्दा देखे के ताकत रीहिस। महतारी मोना ह कांपत हाथ ले ओकर ऑंखी ला देखिस।
हजारी लाल ह भारी मन ले कहिस, "शोभित ह हमेशा सच के पहरेदार बन के जीये हे। आज ओकर देह नइ हे, फेर ओकर ऑंखी मन तो ये दुनिया म रहिहीं। ये ऑंखी मन वो भ्रष्टाचारी मन ला देखिहीं, जे मन आज भी खुल्लम-खुल्ला घूमत हें।"
अजीत ह आगे बढ़ के कहिस, "हजारी काका, तुमन आज एक महान काम करत हव। शोभित के ऑंखी ला दान कर देबो, त ओहा फेर से कोनो अइसे लइका के रूप म देखिही, जेन ह न्याय बर लड़ही।"
जेल के गेट ले बाहर निकरत हजारी लाल के हाथ म शोभित के देह नइ, ओकर अमर विचार रीहिस। शहर भर म शोभित के बलिदान के चर्चा रीहिस। कतको दिन बाद, अस्पताल ले खबर आइस कि शोभित के ऑंखी ला एक गरीब लइका ला लगाय गे हे।
आज जब हजारी लाल वो लइका ला देखथे, त ओला लागथे कि शोभित फेर लौट के आ गे हे। वो लइका के ऑंखी म हजारी लाल ला शोभित के ओ ईमानदारी अउ ओकर "ऑंखी" के तेज दिखथे। हजारी लाल के अब कोनो दुख नइ रीहिस, ओला लागिस कि ओकर बेटा कभू नइ मरिस—ओहा त अब एक नइ, बल्कि हज़ारों ऑंखी बन के सच ला देखत हे।
"सच ला दबाए बर कतको कोशिश कर लेव, फेर सच ह कोनो न कोनो रूप म सामने आके ही रहिथे। मनखे मर जाथे, फेर ओकर देखे के नजरिया अउ ओकर विचार अमर रहिथे।"
हजारी लाल के गोड़ ह भारी होगे रीहिस, मानों कोनो ओकर पइर म मन भर के सांकर बांध दीस होवय। परोसी मन के खुसुर-फुसुर अउ ओकर तिरछी नजर ह ओला बाण कस चुभत रीहिस। जेन मनखे कल तक शोभित ला "गांव के गौरव" कहत थकें नइ, आज उही मन ओला "आतंकवादी" कहे बर तइयार बइठे रीहिन।
हजारी लाल ह कचहरी के सीढ़ी चढ़त-चढ़त थक गे रीहिस। ओकर ऑंखी के आंसू ह घलो अब सूख के पथरा होगे रीहिस। वकील मन के फीस अउ दलाल मन के दलाली म ओकर घर के गहना-गुंठा सब बिक गे। फेरह शोभित तो जेल के करिया कोठरी म बंद रीहिस।
एक दिन खबर आइस कि शोभित के जेल में तबीयत बिगड़ हे ओला अस्पताल ले जाए गे हे। हजारी लाल अउ मोना पगलाय कस अस्पताल कोति दौड़िन। पुलिस के कड़ा पहरा रीहिस। जब हजारी लाल ह भीतर जाके देखिस, त ओकर परान ह उही मेर थम गे। शोभित के देह म नील के निसान रीहिस, मानों ओला कोनो बेरहम मनखे ह नइ, बल्कि कोनो जंगली जानवर ह नोच डारे होवय। ओकर पत्रकारिता के धरम ह आज ओकर सजा बन गे रीहिस।
शोभित ह धीरे से अपन ऑंखी खोलिस। ओकर ऑंखी म आंसू नइ, बल्कि एक अजब किसम के चमक रीहिस। ओहा थथरावत आवाज म कहिस— "ददा, मै पथरा नइ फेंके हौं... मै त बस भ्रष्टाचार के करिया मूंह ला उज्जर करत रेहेंव।"
हजारी लाल ह शोभित के हाथ ला थामिस, फेर शोभित के साँस उही बखत ओकर साथ छोड़ दीस। हजारी लाल के दुनिया उजर गे। पारा-परोसी मन जेन मन तमाशा देखत रीहिन, शोभित के मौत के खबर सुनके सब सन्न रह गे। शोभित के पत्रकार संगवारी मंटू हा हजारी लाल ला बताईस कि जब वोहा शोभित ला देखे बर जेल गे रीहिस त ओ हा केहे रीहिस " ध्यान लगा के सुन मंटू भाई, ददा ला बता देबे अगर मोला कुछू कहीं हो जाही, त रोवय झन। मोर ऑंखी मन ला दान करवा देबे, ताकि मोर मरे के बाद भी ये दुनिया म सच ला देखे बर कोनो के ऑंखी में जीयत राहँव।"
हजारी लाल ह अपन बेटा के आखिरी इच्छा पूरा करिस। शोभित के ऑंखी ला दान कर दीस। कुछ दिन बाद, हजारी लाल ला पता चलिस कि शोभित के ऑंखी एक अइसे गरीब लइका ला लगे हे, जेकर ददा ला उही भ्रष्ट नेता मन ह जमीन ले बेदखल कर दे रीहिन।
आज जब हजारी लाल ह उही लइका ला देखथे, त ओला लागथे कि शोभित मरे नइ हे। आज भी ओकर "ऑंखी" जिंयत हे अउ उही ईमानदारी के नजर ले दुनिया ला देखत हे। हजारी लाल के ऑंखी ले आंसू गिरिस, फेर आज ओ आंसू म गम नइ, बल्कि एक गर्व रीहिस।
"सत्य ला दबाए जा सकथे, फेर ओकर जोत ला बुझाय नइ जा सके। मनखे मर जथे, फेर ओकर विचार अउ ओकर देखे के नजरिया हमेशा अमर रहिथे।
हजारी लाल के गोड़ ह भारी होगे रीहिस, मानों कोनो ओकर गोड़ म मन भर के सांकर बांध दे होही। परोसी मन के खुसुर-फुसुर अउ ओकर तिरछी नजर ह ओला बाण कस चुभत रीहिस। जेन मनखे काली तक शोभित ला "गाँव के गौरव" कहत थकें नइ, आज उही मन ओला "आतंकवादी" कहे बर तइयार बइठे रीहिन।
हजारी लाल ह कचहरी के सीढ़ी चढ़त-चढ़त थक गे रीहिस। ओकर ऑंखी के आंसू ह घलो अब सूख के पथरा होगे रीहिस। वकील मन के फीस अउ दलाल मन के दलाली म ओकर घर के गहना-गुंठा सब बिक गे। फेर शोभित? ओहा त जेल के करिया कोठरी म बंद रीहिस।
ओ काल राति
एक दिन खबर आइस कि शोभित ला अस्पताल ले जाए गे हे। हजारी लाल अउ मोना पागुल कस अस्पताल कोति दौड़िन। पुलिस के कड़ा पहरा रीहिस। जब हजारी लाल ह भीतर जाके देखिस, त ओकर परान ह उही मेर थम गे। शोभित के देह म नील के निसान रीहिस, मानों ओला कोनो बेरहम मनखे ह नइ, बल्कि कोनो जंगली जानवर ह नोच डारे होवय। ओकर पत्रकारिता के धरम ह आज ओकर सजा बन गे रीहिस।
शोभित ह धीरे से अपन ऑंखी खोलिस। ओकर ऑंखी म आंसू नइ, बल्कि एक अजब किसम के चमक रीहिस। ओहा थथरावत आवाज म कहिस— "ददा, मै पथरा नइ फेंके हौं... मै त बस भ्रष्टाचार के करिया मूंह ला उज्जर करत रेहेंव।"
मर्मस्पर्शी मोड़
हजारी लाल ह शोभित के हाथ ला थामिस, फेर शोभित के सांस ह उही बखत ओकर साथ छोड़ दीस। हजारी लाल के दुनिया उजर गे। पारा-परोसी मन जेन मन तमाशा देखत रीहिन, शोभित के मौत के खबर सुनके सन्न रह गे।
फेर कहानी म असली मोड़ तब आइस जब शोभित के अंतिम संस्कार के बाद, हजारी लाल ला शोभित के एक पुरान डायरी मिलीस। ओ डायरी म शोभित ह लिखे रीहिस— "ददा, अगर मोला कुछू हो जाही, त रोबे झन। मोर ऑंखी मन ला दान कर देबे, ताकि मोर मरे के बाद भी ये दुनिया म सच ला देखे बर कोनो के ऑंखी जिंयती राहय।"
कहानी के अंत
हजारी लाल ह अपन बेटा के आखिरी इच्छा पूरा करिस। शोभित के ऑंखी ला दान कर दीस। कुछ दिन बाद, हजारी लाल ला पता चलिस कि शोभित के ऑंखी एक अइसे गरीब लइका ला लगे हे, जेकर ददा ला उही भ्रष्ट नेता मन ह जमीन ले बेदखल कर दे रीहिन।
आज जब हजारी लाल ह उही लइका ला देखथे, त ओला लागथे कि शोभित मरे नइ हे। आज भी ओकर "ऑंखी" जिंयती हे अउ उही ईमानदारी के नजर ले दुनिया ला देखत हे। हजारी लाल के ऑंखी ले आंसू गिरिस, फेर आज ओ आंसू म गम नइ, बल्कि एक गर्व रीहिस।
"सत्य ला दबाए जा सकथे, फेर ओकर जोत ला बुझाय नइ जा सके। मनखे मर जथे, फेर ओकर विचार अउ ओकर देखे के नजरिया हमेशा अमर रहिथे।"
लेखक
डॉ.अशोक आकाश