Wednesday, March 25, 2026

घनाक्षरी - सप्तम कालरात्रि

सप्तम दिवस मातृ, उग्र रूप कालरात्रि, 
महाप्रलय प्रदात्रि, कालों के भी काल है। 
गर्दभ वाहन चढ़े, त्रिनेत्रों में ज्वाला भरे, 
भजो शुभंकरी माता, रूप विकराल है।। 
बिखराये जटा जूट, चीख चीख अवधूत, 
नाचे नटराज संग, अनहद ताल है। 
अशोक आकाश कहे, संकट अपार ढहे, 
नेहामिय धार बहे, सुमिरन ढाल है।। 
सृजन दिनॉंक
21/11/2025

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