Tuesday, January 27, 2026

हृदय-नाद:-मॉं भारती राष्ट्र परिक्रमा (मनहरण घनाक्षरी)

हृदय-नाद:- मॉं भारती राष्ट्र परिक्रमा
​(छत्तीसगढ़ के हृदय-स्थल से संपूर्ण भारत की परिक्रमा)
​मंगलाचरण एवं सनातन वैभव (मनहरण घनाक्षरी) 
​१.
आदि और अंतहीन, दिव्य शक्ति रूपिणी माँ,
तेरी कीर्ति सनातन, विश्व का विधान है।
ऋषियों की तप-स्थली, वेदों की पावन वाणी,
सर्व धर्म समभाव, तेरा ही वरदान है।
बुद्ध की अहिंसा और, नानक की गुरु-वाणी,
कण-कण माटी यहाँ, गौरव-विमान है।
सत्य-अहिंसा का मार्ग, तूने ही दिखाया जग,
तेरी उज्वलता से ही, ऊँचा ये जहान है।
​२.
हृदय-प्रदेश माँ का, छत्तीसगढ़ धाम सोहे,
यहीं से अखंड रूप, होता द्योतमान है।
राम के ननिहाल से, अंग-अंग वंदना हो,
शीश पे हिमालय माँ, गरिमा की शान है।
भुजाएँ बनी हैं दो-दो, पूर्व और पश्चिम की,
चरणों में रत्नाकर, करता प्रणाम है।
दक्षिण का अंचल ये, भक्ति-रस सराबोर,
अंग-अंग तेरा माँ! भारत ये नाम है।
​हृदय-स्थल की महत्ता
​३.
हृदय के कमल से, वंदना मैं करूँ तेरी,
छत्तीसगढ़ धाम जहाँ, कीर्ति का वितान है।
कौशल्या की गोद खेलें, राम प्रभु अवतारी,
धान का कटोरा यह, सुयश की खान है।
अरपा औ’ पैरी धार, वंदन पखारें तेरा,
महतारी रूप यहाँ, भक्ति का विधान है।
सत्य और न्याय की, धरा यह पुनीत माई,
यहीं से अखंड राष्ट्र, का होता गान है।
​पूर्वी भुजा (पूर्वोत्तर और पूर्व)
​४.
उगे भानु पूर्व में जहाँ, अरुणाचल धन्य,
नागालैंड की धरा, अनुपम महान है।
असम की चाय महके, मेघालय मेघ-घर,
मणिपुर मिज़ोरम, सुरभि समान है।
त्रिपुरा की शक्ति पीठ, वंग-कला न्यारी माँ,
उत्कल के तट गूँजे, शंख का ही तान है।
झारखंड वन-प्रांतर, बिहार ज्ञान-भूमि,
पौरुष अपार जहाँ, शौर्य का निशान है।
​भाल और मुकुट (उत्तर भारत)
​५.
हिमगिरि भाल तेरा, मुकुट अनूप सोहे,
गंगा-यमु-धार जैसे, मोती की ही हार है।
ऋषि-मुनि देव-भूमि, उत्तराखंड पावन,
उत्तर प्रदेश जहाँ, प्रेम का अपार है।
सिखाती मर्यादा राम, कृष्ण का संदेश जहाँ,
ब्रज की पुनीत रज, स्वर्ग का द्वार है।
कश्मीर शीश रत्न, डल झील शोभा भरे,
माँ भारती का रूप, सबसे निराकार है।
​६.
वीर-प्रसू हरियाणा, गीता का उपदेश जहाँ,
पार्थ का रथ हांकते, स्वयं भगवान हैं।
कुरुक्षेत्र की वह माटी, त्याग और तप वाली,
खिलाड़ी और जवानों का, अमित सम्मान है।
हिमाचल देव-कुंज, धौलाधार की ही ओट,
शिव के निवास से ही, धन्य ये जहान है।
पर्वत की कंदरा में, गूँजता है ऊँ-कार,
शांति और शक्ति का, अनूठा वरदान है।
​पश्चिमी भुजा और मध्य-काया
​७.
वीर-रस धार बहे, पंज-नद वीरों की,
राजपुती आन लिए, मरुधरा लाल है।
शौर्य की कहानी कहे, महाकाल मध्य बीच,
उज्जैनी की पुण्य प्रभा, काल का भी काल है।
महारानी झाँसी और, शिवाजी के दुर्ग यहाँ,
महाराष्ट्र तेज पुंज, गौरव विशाल है।
गुर्जर धरा पे सोहे, सोमनाथ ज्योति पुंज,
भक्ति और शक्ति का, अनूठा ये हाल है।
​८.
गोवा का सुरम्य तट, मांडवी की लहरें जहाँ,
सागर की गोद में ही, सुखद विलास है।
अंडमान-निकोबार, सावरकर की तपस्या,
दमन-दीव लक्षद्वीप, गौरव-प्रकाश है।
कच्छ से कामरूप तक, कश्मीर से कन्या,
एक ही अखंड ज्योति, एकता की प्यास है।
विविधता में एकता का, विश्व को संदेश दे जो,
भारत ये माँ हमारी, अमर विश्वास है।
​दक्षिणापथ और सागर-चरण
​९.
कर्नाटक चंदन की, गंध मंद फैल रही,
आंध्रा-तेलंगाना जहाँ, वैभव का सार है।
केरल की हरियाली, तमिल की भक्ति-शक्ति,
संस्कृति की सरिता का, बहता बयार है।
सागर उताल तरंग, पखारे चरण तव,
रत्नगर्भा अंबिका का, सुखद संसार है।
सेतुबंध राम का, अखंडता का सूत्र यहाँ,
एक प्राण एक राष्ट्र, प्रेम का आधार है।
​उपसंहार
​१०.
विविध प्रदेश वेश, भाषा और बोली माँ,
किंतु एक सूत्र पिरो, राष्ट्र-माला धार है।
कोटि-कोटि कंठ यहाँ, जय-जयकार करें,
लोक-तंत्र दीप जला, तिमिर का पार है।
हृदय से नमन तुझे, भारती ओ विश्व-गुरु,
तेरी जय पताका झुके, सारा ये संसार है।
अमर सुहाग तेरा, अटल रहे ये धरा,
अर्पित तुझे ही माँ! ये जीवन का भार है।
डॉ.अशोक आकाश
कोहंगाटोला बालोद
9755889199

Wednesday, January 7, 2026

छत्तीसगढ़ की जगन्नाथपुरी -: शिवरी नारायण

*छत्तीसगढ़ की जगन्नाथपुरी-: शिवरी नारायण*

         शिवरीनारायण छत्तीसगढ़ का मुख्य तीर्थ स्थल है इसे छत्तीसगढ़ की जगन्नाथपुरी भी कहा जाता है। जो मान्यता विश्व स्तर में पूरी के जगन्नाथ धाम को प्राप्त है वही मान्यता हमारे छत्तीसगढ़ में शिवरीनारायण को प्राप्त है। प्राचीन काल में भगवान जगन्नाथ जी तीनों विग्रह के साथ यही विराजमान रहे, किंतु कालान्तर में उन तीनों विग्रहों को जगन्नाथपुरी ले जाया गया। शिवरीनारायण का यह धार्मिक स्थल छत्तीसगढ़ के जन-जन में आस्था का केंद्र-बिंदु है। कहा जाता है कि यहाँ भगवान जगन्नाथ गुप्त रूप में निवास करते हैं। भगवान जगन्नाथ स्वामी के प्रति हम छत्तीसगढ़ियों की आस्था का प्रतिफल है यहॉं दूज डोल यानी रथ दूज छत्तीसगढ़ का मुख्य त्यौहार है ।

         शिवरीनारायण जांजगीर जिले में आता है लेकिन वास्तविकता यह है कि जांजगीर चॉंपा शिवरीनारायण जैसे धार्मिक आस्था की नगरी के कारण भी चर्चित है। शिवरीनारायण धाम हिंदुओं के धार्मिक आस्था के प्रतीक चार धाम उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम, पूर्व में जगन्नाथ पुरी और पश्चिम में द्वारिका धाम की तरह ही एक धाम है जो कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 120 किलोमीटर की दूरी पर महानदी अर्थात चित्रोत्पला, शिवनाथ नदी और जोंक नदी के संगम स्थल पर स्थित है। इसे छत्तीसगढ़ के प्रमुख तीर्थ स्थल के रूप में जाना जाता है। यहॉं भगवान श्री राम वनवास के दौरान माता सीता के हरण हो जाने के बाद भाई लक्ष्मण के साथ माता सीता को वन-वन ढूंढते हुए पहुँचे थे। माता शबरी अपने गुरु मतंग ऋषि की आज्ञानुसार रोज भगवान श्री राम के आने की बाट जोहती, रास्ता साफ कर रंगबिरंगे फूल बिछाती भगवान श्री रामचंद्र जी का स्वागत और भोजन का रोज प्रबंध करती। 

         माता शबरी की साधना और तपस्या के फलस्वरुप भगवान श्री राम जी को मतंग ऋषि की भविष्यवाणी को सार्थक करने एक दिन आना ही पड़ा। भगवान  राम को देख माता शबरी भावविह्वल होकर अपने जूठन  बेर खिलाती रही और भक्त वत्सल भगवान अपने भक्त के प्रेम के वशीभूत हो जूठे बेर खाते रहे । यह स्थान भक्त की दृढ़ आस्था और भगवान की अतिवात्सल्यता के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। 

            माघ पूर्णिमा और दूज डोल यानी रथदूज यानी रथ यात्रा यहाँ का मुख्य पर्व है। माघी पूर्णिमा में 3 दिन का पारंपरिक मेला स्नान दान पुण्य और उपासना से हिन्दुत्व का जयघोष होता है, छत्तीसगढ़ के कोने कोने से लोग यहॉं पहुँचते हैं। 
   
        शिवरीनारायण अपनी धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ फल फूल रहा है इसे राज्य शासन द्वारा धर्मनगरी घोषित कर दिया गया है, लेकिन हिंदुओं की आस्था का केन्द्रबिंदु यह नगरी शबरी की तरह आज भी उस राम का बाट जोह रही है जो उसे विकसित शहर की श्रेणी में रख सके। अनन्य आस्था लेकर पहुँचे लोगों को यह सामान्य शहर की तरह ही लगता है। यह धर्मनगरी उपेक्षित शहर की तरह अव्यवस्था का शिकार है, मंदिर स्थल पर पहुंचने में दिक्कतों का सामना करना पड़़ता है ।  प्रशासनिक चुश्ती की कमी के कारण यहॉं घाटों की साफ-सफाई एवं गलियों में कूढ़ों का ढ़ेर दर्शनार्थियों की आस्था पर चोट पहुँचाती है। 
    
         भगवान राम वन गमन पथ को विकसित करने में राज्य सरकारों ने बड़ा काम किया है लेकिन जन सहयोग की कमी और राजनीतिक इच्छा शक्ति का अभाव झेलती यह धर्मनगरी विकासपथ पर अग्रसर होने में अब भी असमर्थ है। इस हेतु स्थानीय संगठनों एवं निवासियों की सक्रियता जरूरी है ताकि शिवरीनारायण की उज्ज्वल कीर्ति अखिल विश्व में फैल सके। 

          छत्तीसगढ़िया रीति नीति के लिए चर्चित  यह तीर्थ स्थल अपने मंदिरों की निर्माण कला, भव्यता एवं चमत्कृत कर देने वाले नक्काशी के कारण विश्व प्रसिद्ध हो सकता है। यहाँ का राम नाम बैंक विश्व प्रसिद्ध है, भगवान श्री राम के भक्तों द्वारा लिखी गई राम नाम पत्रिका का विशाल संग्रह दर्शनीय है। महंत रामसुंदर दास एवं मंदिर ट्रस्ट की सक्रियता और दर्शकों के लिए पर्व विशेष पर समय-समय पर की जाने वाली व्यवस्था हमारी छत्तीसगढ़िया संस्कृति को पुष्पित पल्लवित एवं सुरभित कर रही है। 

              शिवरीनारायण जैसा रमणीय एवं दर्शनीय स्थल सिर्फ छत्तीसगढ़ तक की सीमित कर दिया गया है, यह पीड़ा का विषय है। हमारे छत्तीसगढ़ में निवासरत लोग देश के विभिन्न धर्म स्थलों में भ्रमण कर स्नान दान कर पुण्य प्राप्त करता है लेकिन हमारे छत्तीसगढ़ की धर्म नगरी राजिम, शिवरीनारायण आदि जगहों में देश के अन्य भागों से बहुत कम लोग दर्शन हेतु पहुंचते हैं, यह सोचनीय मुद्दा है। 

           राज्य सरकार को चाहिए कि हमारे छत्तीसगढ़ में आस्था के केंद्र-बिंदु रहे इन धर्म स्थलों का राष्ट्रीय स्तर पर प्रचार प्रसार हो ताकि ये धर्मस्थल लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र-बिंदु बने। विशिष्ट योजनाओं के साथ हमारी सांस्कृतिक विरासतों एवं हमारे सांस्कृतिक धरोहरों की ख्याति विश्व तक पहुँचे ऐसा प्रयास करने की आवश्यकता है। 

           शिवरीनारायण नगरी हर युग में अपने अलग-अलग नामों के साथ वैश्विक पहचान बनाती रही है , सतयुग में इसे बैकुंठपुर,त्रेता युग में रामपुर, द्वापर युग में विष्णुपुर एवं नारायणपुर के नाम से इन्हें ख्याति मिली थी। मतंग ऋषि के गुरुकुल आश्रम और माता शबरी की तप:स्थली, भगवान जगन्नाथ का निवास स्थान होने के कारण इसे तीर्थ का दर्जा प्राप्त है इस पावन पुण्य स्थली को विश्व विख्यात करने की जरूरत है। 

डॉ. अशोक आकाश
९७५५८८९१९९

धरती के शृंगार का पर्व -हरेली

धरती के श्रृंगार एवं छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति का संवाहक पर्व - हरेली

    छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति में पर्वों की बड़ी महत्ता है, यहॉं बारहों महीने तरह-तरह के तीज त्यौहारों का प्रचलन है। सभी त्यौहारों में हरेली धरती के सिंगार का महत्वपूर्ण पर्व है छत्तीसगढ़ के सभी पर्व खेती किसानी से संबंधित उत्सव है। हरेली तिहार को हम हरियाली के नाम से भी जानते हैं ।  छत्तीसगढी संस्कृति के संवाहक पर्व के रूप में हरेली तिहार को जाना जाता है। छत्तीसगढ़ अपनी दो विशेषताओं के लिये विख्यात है, पहला कृषि दूसरा पर्व इस तरह - यहाँ पर जितने भी त्यौहार मनाए जाते हैं उनमें लोक मान्यता एवं परंपराएँ बहुतायत पाई जाती है। हरेली त्यौहार छत्तीसगढ़ी लोक-जीवन को अभिसिंचित करने - वाला त्यौहार है। ज्येष्ठ माह में ग्रीष्म की भीषण तपन सहकर अक्षय तृतीया के साथ छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक पर्व का शुभारंभ होता है। छत्तीसगढ़ी संस्कृति में खेती किसानी से संबंधित यह प्रथम त्यौहार है जब किसान विधि विधान से खेतों में बीजारोपण करता है और वर्षा के बाद अंकुर पश्चात धरती हरियाली से भर जाती है खेत में धान की फसल लहलहा उठती है। धान के पौधे परिपुष्ट होने लगते हैं तब किसान खेतों की हरियाली देख झूम उठता है ऐसे समय में सावन महीने की अमावस्या का आगमन होता है। इसी दिन को हम हरेली अमावस्या के नाम से जानते हैं। 
       इस साल यह त्योहार 28 जुलाई को मनाया जाएगा, इस दिन किसान सूयोदय से पूर्व गोधन के लिए विशेष प्रकार का असगंद कांदा एवं धामन कांदा के साथ गेहूं आटे की लोई पशुधन को खिलाया जाता है इसके पीछे पशुधन को वर्षाजनित व्याधि से छुटकारा का लक्ष्य होता है। खुशियों भरे वातावरण में घर कोठा की सफाई कर आंगन में मुरुम या रेत पर नांगर, गैंती, रांपा कुदाली, हंसिया, टंगिया, बसुला, बिंधना, आरी, पटासी, साबर, चटवार आदि कृषि औजारों तो व्यवस्थित रखकर गौरी गणेश स्थापित कर सुपारी, हल्दी, बंदन, दीपक जलाकर चावल आटा से सभी कृषि यंत्र एवं औजारों पर घर की सुहागन महिला हाथा देकर उसमें कुमकुम हल्दी लगाती है। पूजन में घर के सभी लोग पूरी आस्था से शामिल होते हैं। गुड मिश्रित चावल के आटे की चीला का भोग लगाकर नारियल तोड़ हवन देकर कच्चा नारियल और चीला का प्रसाद बाँटा जाता है। 
    
         बच्चे एवं युवा बाँस की गेंड़ी बना उस पर गलियों में चलने का आनंद लेते है। भोजन के पश्चात गाँव के चौक चौराहों में उत्सव का आयोजन किया जाता है जिसमें गेड़ी दौड़, बैल दौड़ रस्सी खींच, मटका फोड़, नारियल फेंक, कबड्डी खेल एवं डंडा नृत्य सुवा गीत के आयोजन से हरियाली त्यौहार के उत्सव का रंग देखते ही बनता है। संध्या गांव में अक्सर रामचरितमानस पाठ गायन से ग्रामीण जन की आस्था में वृद्धि करने वाला यह प्राचीन पर्व आस्थावान समाज निर्माण की दिशा में आदर्श स्थापित करता है। धरती की हरीतिम आभा से उत्साहित किसानों के इस पर्व का उत्साह देखते ही बनता है। छत्तीसगढ़ राज्य शासन द्वारा इस त्यौहार पर शासकीय आयोजन के माध्यम से गोधन की महत्ता प्रतिपादित होती है। कृषि आधारित इस पर्व से प्रकृति के प्रति छत्तीसगढ़ के पारम्परिक प्रेम से कृषि का आधार मजबूत होता है। छत्तीसगढ़ जन संस्कृति में दो तरह की विचाधारा के लोग निवास करते हैं पहला सत्ताहा दूसरा कबीरहा, जो देवता को मानते हैं उन्हे सत्ताहा कहा जाता है और जो कबीर को मानते हैं उन्हें कबीरहा कहा जाता है। कबीर पंथ को मानने वाले सत्य अहिंसा के पथगामी होते हैं इस पंथ में अधिकतम मानिकपुरी और साहू समाज के लोगों की बहुलता है। 

         जब से छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण हुआ है हर वर्ष हरेली तिहार को सरकारी उत्सव का रंग चढ़ता है । हर साल छत्तीसगढ़ शासन द्वारा बड़े बड़े आयोजन की तैयारी की जाती है। इस दिन बच्चे बड़े ही उल्लास स्कूलों में इस दिन गेड़ी नृत्य प्रतियोगिता का आयोजन किया जाएगा।देवता को मानने वाले परिवारों में अपने देवों को खुश करने इस दिन बलि प्रथा का प्रचलन है ऐसे परिवार जो अपने इष्ट देव की भी पूजा करते हैं और उन्हें खुश करने विशेष पूजा की जाती है। हमारे छत्तीसगढ़ में कबीर का बहुत बड़ा प्रभाव है, संत धमर्दास छत्तीसगढ़ के बहुत बड़े कबीर पंथ के संत हुए उनका प्रभाव भी हमारे छत्तीसगढ़ में पड़ा है, इनके अनुयायी अपने देवों को सेत यानी नारियल सेग मना लेते हैं। तंत्र मंत्र पर बहुतायत बहुतायत लोग विश्वास नहीं करते, इसे अंधविश्वास कहकर उपहास  उड़ाया जाता है लेकिन हरेली तिहार तांत्रिक साधना पर्व के रूप में भी विख्यात है। इस दिन तन्त्र साधकों की टोली तन्त्र साधना करते हैं। कुल मिलाकर हमारे छत्तीसगढ़ का यह पर्व जन जन में लोक संस्कृति के संवाहक पर्व के रूप में विख्यात है।

डॉ.अशोक आकाश
वरिष्ठ साहित्यकार
बालोद

दीया बुतावथे छत्तीसगढ़ में छावथे अँधियारी

*दीया बुतावथे छत्तीसगढ़ में छावथे अंधियारी - डॉ.अशोक आकाश*

        छत्तीसगढ़ राज बनायबर हमर पुरखा मन गजब संघर्ष करिन। बड़ आशा विश्वास ले स्वाभिमानी छत्तीसगढ़ के सपना देखैया हमर बलिदानी पूर्वज मन धीरज संयम ले मजबूती के साथ छत्तीसगढ़ राज बनायके बात रखिन। हमर देश में राज्य बनायबर कतको खूनी संघर्ष होयहे लेकिन पचपन साल तक सरलग आवाज उठायके बाद हमर देश के इतिहास में छत्तीसगढ़ ऐसन राज्य बनिस जे हा बगैर खूनी संघर्ष के राज्य के रूप में अस्तित्व में आईस। आजादी के बाद पचपन साल के देखे सपना बिना खूनखराबा के पूरा होगे, ये हमर छत्तीसगढ़ के सीधापन के प्रत्यक्ष प्रमाण हरे। 
       जब हमन छत्तीसगढ़ राज पायेन त गजब अकन सपना देखत रेहेन, छत्तीसगढ़ के सबे संसाधन के उपयोग अब सही दिशा में होही, हमर छत्तीसगढ़िया मन ला नौकरी मिलही, व्यापार -व्यवसाय, खेती-किसानी में तरक्की होही! छत्तीसगढ़ी ला राजभाषा के दर्जा मिलही! ऐसन कतको अकन सपना हमर ऑंखी-ऑंखी में झूलत रीहिस। छत्तीसगढ़ के सबे संसाधन के उत्खनन अउ संवर्धन में उन्नति होवत रीहिस फेर छ्त्तीसगढ़ी ला राजभाषा के दर्जा मिलना बाँचे रीहिस, एकर पीरा हमर छत्तीसगढ़िया साहित्यकार के मन के दाहरा में हिलोरा मारत रीहिस। आखिर में रमन सिंह के सरकार हा छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग बनाइस त छत्तीसगढ़ के सबे साहित्यकार मन में खुशी के ठिकाना नइ रीहिस, लागत रीहिस कि हमर छत्तीसगढ़ी हा अब राजभाषा बन जही, सबे प्रशासनिक कारज हा अब छत्तीसगढ़ी में होही लेकिन प्रशासनिक अक्षमता के सेती सबे सपना धरे के धरे रहिगे। 
          छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग ला चलाय बर अध्यक्ष सचिव अउ कार्यालयीन कर्मचारी मनला वैतनिक रखेगिस लेकिन विडम्बना ये रिहीस कि जिला स्तर में काम करैया समन्वयक मनला अवैतनिक रखेगीस। बीच में पॉंच हजार रुपिया हर महीना देयके बात उठे रीहिस फेर उहू हा कचरा में फेंकागे। जिला स्तर में ये समन्वयक मन आज भी छत्तीसगढ़ी भाषा के असली सेवा करथे। छत्तीसगढ़ सरकार में राजभाषा आयोग के जिलास्तर में नेतृत्व करैया ये जिला समन्वयक मन के कोनो देखैया पुछैया नइ हे। ये मन अपन पैसा खरचा करके छत्तीसगढ़ महतारी के सेवा करथे। ये समन्वयक मन लगातार आयोग के शोषण के शिकार होय हे। 
          छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के चाहे कार्यालय स्थापना दिवस होय, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग दिवस होय या प्रान्तीय अधिवेशन होय ये समन्वयक मन ला ट्रेन या बस के टिकट दिखाबे तभे ओतकेच रुपिया मिलथे जतका रुपिया ये मन बस या ट्रेन में आय जायबर खर्चा करे रथे। आटो रिक्शा चाय पानी के खर्चा तो ये मनला कभू मिलबे नइ करे। कतकोन स्वाभिमानी समन्वयक मन बस ट्रेन के पैसा लेबे नइ करे ये मन अपन पैसा में आथे जाथे । आयोग में कोनो आयोजन होही त जिलास्तरीय बरदिहा के बुता जिला समन्वयक के रहिथे। ये मनला जिला स्तर में निर्धारित संख्या में साहित्यकार मंगवाये जाथे। साहित्यकार मन ला कार्यक्रम स्थल में लेगे के बाद ईंकर काम खतम। ये समन्वयक मन अपन जिला के बड़का साहित्यकार रहिथे लेकिन ये मन ला वक्ता के रूप में स्थान मिले न कवि सम्मेलन ला छोड़के कोनो दूसरा सत्र में सम्मानजनक स्थान नइ मिले। कोनो कार्यक्रम में सबे जिला समन्वयक मन अतकी कहिके मन ला मड़ालेथे कि चलो रे भाई छत्तीसगढ़ महतारी के सेवा करथन। ये मन छत्तीसगढ़ी भाषा के सच्चा सेवक आय, एकर सेती  ये मन मान सम्मान के ध्यान नई देके, छत्तीसगढ़ महतारी के सेवा करथे। आयोग द्वारा भुलावा में रखके ईंकर उपयोग ऐसे किये जाथे जैसे दूध के मॉंछी। छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग जिला समन्वयक कहिबे त ऐसे लागथे जैसे आयोग के बहुत बड़े अधिकारी होही लेकिन ढोल तरी पोल मशाल तरी अंधियार। ये पद के नाम जिला स्वयंसेवक रखे जाय ते जादा अच्छा रही। 

         छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग हा समन्वयक ही नहीं छत्तीसगढ़ी साहित्यकार मन के तक शोषण करथे, साहित्यकार मन ला बलाके सिरिफ बस ट्रेन के किराया या कार के दस रुपिया प्रति किलोमीटर के पैसा भर दे देथे, बिचारा मन भात साग खाके हाथ हलावत चल देथे। 

          आयोग में एक झन ऐसे साहित्यकार हे जेन हा सत्ताधारी पार्टी के सदस्य हे, तेन हा पूरा आयोग ला पोगरा के बैठे हे। ओकर आदेश पत्थर के लकीर होगे हे। वो बाहॉं चढ़ाये आयोग के सबे कर्मचारी मन ला निर्देशित करत रहिथे, बड़े बड़े साहित्यकार मनके आयोग में कोनो पुछैया नइ हे। एकर लंगोटी धोवैया कईझन हे जेकर पिछला दुवारी ले आगमन होगेहे। जेमन अब सबे समन्वयक, बड़का साहित्यकार अउ आयोग के कर्मचारी मन ला आदेशित करत हवे। लंगोटी धोवैया मनके राज में स्वाभिमानी साहित्यकार मन कोंटा में तिरियागेहे। 

         छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग जब ले बने हे स्व.श्यामलाल चतुर्वेदी, स्व.दानेश्वर शर्मा अउ डॉ.विनय कुमार पाठक अध्यक्ष बनिस। हमर ये साहित्यिक पुरोधा मन नींव के पथरा बनके आयोग ला मजबूती  देके काम करीसे। सबे अध्यक्ष के कार्यकाल में आठवॉं अनुसूची में छत्तीसगढ़ी विषय में ढोल पीटत दिन बीतगे फेर सही दिशा में निशाना नीं लग पइस, काबर कि आयोग ला ओतका मजबूते नइ करेगेहे। हॉंथ गोड़ ला बॉंध के दाहरा में छोड़े तैराक बनके रहिगेहे आयोग हा। अब तक एला पूरा आजादी नइ मिले हे। बड़े बड़े दिग्गज अउ उत्साही साहित्यकार मन हा अध्यक्ष बनिन फेर अब तक बने हकन के काम नइ कर सकिन। 

            छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के सबे अध्यक्ष में डॉ.विनय कुमार पाठक के कार्यकाल में छत्तीसगढ़ी भाषा ऊपर जमके काम होईस। कतको अकन काम के क्रम में एम. ए. छत्तीसगढ़ी के पाठ्यक्रम के शुरुआत डॉ.विनय कुमार पाठक के कार्यकाल में होईस तब ऐसे लागे कि छत्तीसगढ़ी में एमए करलेव सरकारी नौकरी पक्का। आज छत्तीसगढ़ी में एम ए करैया लइका मनहा बेरोजगार घूमथे, सरकार ला चाही कि पाठ्यक्रम खोले हव त रोजगार भी देव,तभे तो ये लइका मन के सपना अउ पाठ्यक्रम खोले के उद्देश्य पूरा होही। 

         छत्तीसगढ़ी भाषा संस्कृति के नंगाड़ा बजैया मनखे मनके मुड़ी में गाज तब गिरगे जब भुपेश बघेल के सरकार हा आयोग ला अध्यक्ष विहीन करदिस। बिगर ताज के राजा ला राजा कोन मानही ? बिगर कलश के मंदिर में पूजा कोन करही? अउ बिगर पंख के चिरई कतका उड़ाही ?
        ताज विहीन राजभाषा आयोग के सचिव डॉ.अनिल भतपहरी हा अपन कार्यकाल में बढ़िया काम करिसे। जिला समन्वयक अउ साहित्यकार मन ला सम्मान देके
 कोशिश अउ छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य अउ संस्कृति के रखवारी में करे एकर काम सुरता करे जाही। 
          आज सरकार बदल गेहे अब छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साय के सरकार हे, संस्कृति मंत्रालय हा अब विष्णु देव साय के अधीन काम करथे। राजभाषा आयोग के रमन सिंह के दो कार्यकाल अउ भूपेश बघेल के एक कार्यकाल के लेखा जोखा करथन त जतका ऊँचाई रमन सिंह के कार्यकाल में होय रीहिसे भूपेश बघेल केे मुख्यमंत्रित्व काल में छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य अउ संस्कृति हा ओतकेच गड्ढा में बोजागेहे। एला उबारे के बुता मुख्यमंत्री विष्णु देव साय जी स्वयं अपन हाथ में लेहे तभे तो 28 नवंबर 2024 के छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस के कार्यक्रम में पहिली बेर मुख्यमंत्री के आगमन होय रीहिस ये बात चर्चा के विषय हे। 
         अब हमन ला आशा बंधे हे कि हमन ला अपन अध्यक्ष मिल जही, राज्य सम्मान प्राप्त साहित्यकार अउ कलाकार के पुछारी होही। जिला समन्वयक अउ साठ साल के ऊपर के वरिष्ठ साहित्यकार मन ला सम्मानजनक मासिक राशि मिलही, छत्तीसगढ़ी में एम.ए. करैया लइका मन ला नौकरी में प्राथमिकता मिलही, शासकीय कार्य में छत्तीसगढ़ी भाषा के उपयोग होही, न्यायपालिका, कार्यपालिका, व्यवस्थापिका में छत्तीसगढ़ी के उपयोग बढ़ही। एकर पहिली कि छत्तीसगढ़ी भाषा अउ संस्कृति के दीया बुताके अंधियारी छा जाय ओला जीवन देयबर तेल डारना जरूरी हे। प्रभावहीन छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग में नवॉं जान डाले बर छत्तीसगढ़ी भाषा बर दहाड़ के बोलैया मजबूत साहित्यकार ला अध्यक्ष बनाके छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोगरुपी मंदिर में कलश चढही तभे हमर छत्तीसगढ़िया अउ छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के उद्धार होही। 
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डॉ.अशोक आकाश 
वरिष्ठ साहित्यकार
बालोद
9755889199

जनजातीय समाज का गौरवशाली इतिहास

*जनजातीय समाज का गौरवशाली इतिहास*

      भारत का जनजातीय समाज अपनी पारम्परिक विशेषता के लिए पहचाना जाता है । इस समाज में मौखिक शिक्षा की परम्परा रही है। अपनी सभ्यता संस्कृति और सहजता की विशिष्टता लिए यह समाज विश्व स्तर में अलग पहचान बनाए हुए हैं।

          वर्तमान भारत के निर्माण में भारतीय जनजातीय समाज ने अपना अभूतपूर्व योगदान दिया है। अतीत से लेकर वर्तमान तक इन जनजातीय समाजों का गौरवशाली इतिहास है। इस समाज ने अपनी कर्मठता, सहजता, सरलता और सत्य निष्ठा के लिए विश्व में ख्याति अर्जित की है ।  प्रकृति के साथ जीवन जीते इस समाज में औषधीय पहचान की अद्भुत क्षमता है। विकास के विभिन्न दौर से गुजर कर जनजातीय समाज ने उन्नति के चरम उत्कर्ष का स्पर्श कर लिया है। ज्ञान का अतुलनीय भण्डार लिए आदिवासी समाज का देश की उन्नति में विशिष्ट योगदान है। 

        आदिकाल से आदिवासी समाज उपेक्षा और उत्पीड़न का शिकार रहा । राष्ट्र विकास में उल्लेखनीय योगदान के बावजूद इस समाज को हमेशा उपेक्षा, प्रताड़ना और ठगी का शिकार होना पड़ा। मेहनत के दम पर शौर्यता जीवन जीने के बावजूद इन्हें अपेक्षित सम्मान नहीं मिल पाया । समय ने अब करवट बदल लिया है, अब इस समाज ने विकासपथ पर अपनी दस्तक से दुनिया को झंकृत,अचम्भित कर दिया है। आज जनजातीय समाज के गौरवशाली इतिहास को दुनिया के सामने लाने की जरूरत है ताकि हमारी पीढ़ियाँ हमारे पूर्वजों के गौरवशाली इतिहास को जान सके और अपनी सभ्यता संस्कृति परम्परा पर गर्व कर सके। हमारे देश में आदिवासी समाज का गौरवशाली अतीत है। इस समाज ने ऐतिहासिक सामाजिक एवं आर्थिक योगदान से देश को परिपुष्ट किया है यह समाज वीरों एवं वीरांगनाओं की बलिदानी गाथा से उर्वर है। हमें जनजातीय समाज की पुरातन परम्पराओं एवं ज्ञान को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है जिससे भावी पीढ़ी जनजातीय समाज की सामाजिक पृष्ठभूमि से अवगत हो सके । 

        हमारे जनजातीय समाज की संस्कृति विश्व के विकसित देशों के लिये कौतूहल का विषय है। यहॉं की सभ्यता, संस्कार, कला एवं आजीविका पर हो रहे शोध से जनजातीय व्यवस्था की उत्कृष्टता का पता चलता है। ये जनजातीय समाज हमारा राष्ट्रीय गौरव है हमें अपनी जनजातीय संस्कृति की रक्षा करनी है जिससे इस समाज की वैश्विक विशिष्टता कायम रह सके। जिस समाज की संस्कृति नष्ट हो जाती है वह समाज भी मिट जाता है। हमें अपनी सभ्यता और संस्कृति को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है । हमें अपने गौरवशाली इतिहास और संस्कृति को युवा पीढ़ी को सौपना होगा और युवाओं से निवेदन है आप जितने भी बड़े पद में सुशोभित हो जाएँ लेकिन हमारी सभ्यता संस्कृति की बागडोर हमेशा थामे रहना । ताकि हमारी सॉंस्कृतिक धरोहर अक्षुण्ण रह सके। 

       हमारे जनजातीय समाज के वीरता की गाथा जग प्रसिद्ध है। यहॉं वीरांगनाएँ  प्रताड़ित होकर भी देश के लिए संघर्ष करती रही हैं। हमें इस समाज की जीवन शैली, सामाजिक संस्कारों की विशिष्टता, पुरुष,महिला एवं बच्चों के जीवन की संघर्ष गाथा लिखित रूप में आगे लानी होगी, जिससे हमारी भावी पीढ़ी को इनके गौरवशाली इतिहास की जानकारी हो सके।

        हमारे आदिवासी समाज ने ही अस्त्र-शस्त्र और मंत्र विद्या का आविष्कार किया, जिससे इन्होंने आत्मरक्षा, देश सुरक्षा और जन-जन की रक्षा का दायित्व निर्वहन कर अन्य समाज की भी बड़ी सेवा की है । आज हमारे आदिवासी जनजातीय समाज के इतिहास पर विदेश में शोध कार्य हो रहे हैं लेकिन आश्चर्य है हमारी दृष्टि हमारे समाज की गौरवशाली अतीत पर नहीं है। हमारे आदिवासी समाज के इतिहास का लेखन दूसरे लोग कर रहे हैं। जरूरत है कि हम अपने समाज और अपने पूर्वज की कहानी लिखकर दूसरे समाज तक लाएँ, जिससे हमारे पूर्वज की जिंदगी पर लिखकर हम न्याय कर सकें। विदेशी लेखक हमारे आदिवासी समाज की गौरवगाथा तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत कर रहे हैं। कुछ किवदन्तियाँ जोड़कर हमारे गौरवशाली सामाजिक इतिहास को विकृत बनाने से रोकने के लिये हमें अपने सामाजिक गौरव को कलमबद्ध करने की जरूरत है । आदिवासी समाज के महापुरुषों की जीवन गाथा, उन पर प्रश्नोत्तरी, फोटो प्रदर्शनी, पेंटिंग, नाटक, साँस्कृतिक कार्यक्रम जैसे विविध आयोजन स्कूल, कॉलेज, ग्राम के सामाजिक कार्यक्रम में निरंतर करते रहने की जरूरत है । जिससे आदिवासी समाज के महापुरुषों की जीवनी जन-जन तक पहुँच सके । 

      हमारे आदिवासी समाज का देश की स्वतंत्रता, पुनर्निर्माण एवं विकास में योगदान अतुलनीय है इसे प्रत्येक समाज को चीखकर, पुकार कर और ताल ठोक कर बताने की जरूरत है । बड़े ही दुख का विषय है कि हमारी अपनी ही पीढ़ी के बच्चों को अपने बाप दादा की वीरता की कहानी नहीं मालूम ! हमारी पीढ़ी को अपने पूर्वजों की गौरव गाथा कोई दूसरा बताने थोड़ी आएगा? हमें खुद बतानी होगी ! तो सर्वप्रथम हमें अपना कमर कस लेना होगा जिससे हम अपनी सामाजिक गौरवशाली अतीत का लेखन कर विभिन्न आयोजनों में वाचन एवं मंचन कर लोगों को अपनी सामाजिक गौरवगाथा बलिदान बता सकें। आजादी से पूर्व और आजादी के बाद के परिदृश्य में जमीन आसमान का अन्तर है। जीवन की टेढ़ी मेढ़ी पगडण्डी में दुखों के अनगिन पहाड़ एवं खाईयों के बीच के अंतर व्यथा में हमने अपनी कुर्बानिया को लगभग भुला दिया है जिसे याद करने हैं, लिखने हैं और अपनी सामाजिक महापुरुषों के कृतित्व एवं व्यक्तित्व देश दुनिया के सामने लाने हैं। 

        भारतीय इतिहास जहाँ से प्रारम्भ होता है, हमारे आदिवासी समाज का इतिहास भी वहीं से प्रारंभ होता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से भारतीय जनजाति समाज की रीति-नीति संस्कार का काव्यात्मक चित्र प्रस्तुत कर रामचरितमानस महाग्रंथ को रोचक और जन-जन में लोकप्रिय बना दिया । हम आज भी अपने पारिवारिक एवं सामाजिक अंतर्द्वंद में जूझकर अपनी शक्ति अपनी क्षमता नष्ट न करें । अपनी शक्ति का अपनी समझ का सदुपयोग कर सामाजिक जागरण का केंद्र बिंदु बनें। रामचरितमानस का शबरी प्रसंग हमारे आदिवासी समाज की आध्यात्मिक चरमोत्कर्ष का केंद्र बिंदु है । जिनके जूठे बेर भगवान राम ने प्रेम विह्वल हो ग्रहण किया था। 

      देश की आजादी में आदिवासी समाज का महत्वपूर्ण योगदान रहा। हमारे आदिवासी समाज ने देश में क्रांति का बिगुल फूँक कर अंग्रेजी शासन के खिलाफ सीना तानकर खड़ा रहा। परलकोट विद्रोह, सिद्धो कान्हो, भूमकाल, पामगढ़ भील क्रांति जैसे आदिवासी जनक्रांति हमारे जनजाति समाज का सीना चौड़ा करने काफी है । जनजातीय समाज की गौरवगाथा पुस्तकाकार में जन-जन तक लाने की जरूरत है ताकि हमारी पीढ़ी को हमारे आदिवासी समाज की सभ्यता, संस्कृति एवं राष्ट्रीय चेतना, राष्ट्रीय एकता, राष्ट्र जागरण एवं भारत माता को गुलामी की बेड़ी तोड़ने में किए गए योगदान की जानकारी हो सके। इससे हमारे आदिवासी समाज की अंग्रेजों द्वारा बनाई गई विकृति छवि को सुधारने का शुभ अवसर भी होगा। शिक्षा जगत में आदिवासी समाज के मूर्धन्य विद्वान शीर्षस्थ हैं, ऐसे विद्वतजनों से नम्र निवेदन है हमारे समाज की परम्परा, सभ्यता, संस्कृति, धरोहर,इतिहास पर विशेष शोधपूर्ण लेखन करें जिससे हमारी पीढ़ी को जनजातीय समाज के गौरवशाली इतिहास की जानकारी हो सके और हमारे स्वर्णिम इतिहास पर पड़े धूल धक्कड़, पर्दा हट सके। समय ने करवट बदल लिया है, अब अधिकांश जनजातीय समाज मौखिक शिक्षा अंधविश्वास कुरीतियों से ऊपर उठकर लिखित एवं वाचिक शिक्षा की परम्परा का निर्वाह कर अपने उद्देश्य में सफल होकर नित नयी ऊँचाइयों का स्पर्श कर रहे हैं। लेकिन अभी भी कुछ जनजातीय समाज को वक्त के धारे के साथ चलकर मौखिक शिक्षा से ऊपर उठकर लिखित एवं वाचिक शिक्षा की परम्परा बनानी होगी, इससे हमारे आदिवासी समाज का देश हित में किए गए अद्वितीय योगदान की जानकारी पूरी दुनिया को हो सके। 

डॉ.अशोक आकाश
कोहंगाटोला बालोद छत्तीसगढ़, ४९१२२६.
मो.नं.९७५५८८९१९९