Wednesday, February 18, 2026

मनहरण घनाक्षरी में महाकाल स्तुति

*मनहरण घनाक्षरी में महाकाल स्तुति*

​जाके भाल चन्द्र सोहे, कंठ विष धारे देव,
डमरू बजावत ही, असुर संहारे हैं।
भूतन के नाथ प्रभु, जगत के तात आप,
हाथ जो पसारैं दुख, पल में निवारे हैं॥
भगति बढ़ावे मान, श्रद्धा से जो करे गान,
संकट मिटावे सभी, काज वो सँवारे हैं।
महादेव महिमा को, गावत 'अशोक' अब,
करे हैं आकाश' नाम, शिव ही हमारे हैं॥

महाशिवरात्रि महापर्व की अनन्त शुभकामनाएँ
डॉ.अशोक आकाश✍️

अवसरवादी नेताओं के खोखले आदर्श पर घनाक्षरी

*अवसरवादी नेताओं के खोखले आदर्श पर घनाक्षरी*
बार बार का चुनाव, देख बाबा भीमराव,
नेता आप ही का नॉंव, दॉंव में लगाते हैं।
प्रलोभन बिना पूर्ण, होता नहीं है चुनाव,
मदिरा की पेटी गॉंव, गॉंव में लुटाते हैं।। 
संविधान ले के हाथ, कसमें तो बड़ी खात, 
काम पड़े बात-बात, ताक पे सजाते हैं।
भीड़ में मसीहा बन, फोटो खिंचवाते तन,
घर जा के वही रंग, अपना दिखाते हैं।। 
सिद्धांतों की लाश लॉंघ, शर्त कुर्सियों की बॉंध,बंदरों सी डाल-डाल, कूद दल बदले। 
बेचकर स्वाभिमान, बने कुछ तो महान्  
अवसर पाके ये तो, अपनी आत्मा छले।। 
देते एक मुट्ठी चने, विडियो हजार बने, बेबस गरीब गिने, जश्न ये मनाते हैं। 
एक केला दस थाम, फोटो खिंचे राम-राम! 
रोज ये मदद नाम , रोटी सेंक जाते हैं।। 
दान का ढिंढोरा पीट, हीरो करे गीज-गीज।
निष्ठा कौड़ी बेच-बेच, दल बदलाते हैं।। 
दुखिया के साथ खड़े, हॉंस सेल्फी लेते बड़े, 
डींग मार भाषण में, ताली बजवाते हैं।। 
डॉ.अशोक आकाश
ग्राम कोहंगाटोला बालोद छत्तीसगढ़.
9755889199

Saturday, February 14, 2026

संस्कार की पूंजी को, तुम कितना सम्भालोगे

​संस्कार की पूंजी को, तुम जितना सम्भालोगे।
बेकार की झंझट से, खुद को ही निकालोगे।।
​झूठों की जीत होती, अरु सत्य हारता है।
बैर मन में पाले, घृणा जो वारता है।।
नफरत की ऑंधियों को, तुम कितना उछालोगे...
बेकार के झंझट में, तुम खुद को ही पाओगे।
​रावण सी पंडिताई, जो मद में खोएगा।
सोने की अपनी लंका, वो खुद ही डुबोएगा।
घमंड की लपटों को, तुम जितना हवा दोगे...
बेकार के झंझट में, तुम खुद को ही पाओगे... 
चतुरंगिणी ​कौरव की, क्यों रण में हार बैठे।
जब सत्य सारथी हो, पॉंडव पुकार बैठै।।
धर्म की ध्वजा को, तुम जितना उठाओगे...
बेकार की झंझट से, खुद को ही निकालोगे... 
​बिक कर भी सत्यता ने, कभी हार न मानी थी।
हरिश्चंद्र की भगति को , दुनिया ने भी जानी थी।।
मर्यादा की रेखा को, तुम जितना सजाओगे...
बेकार की झंझट से, खुद को ही निकालोगे... 
डॉ.अशोक आकाश🌷🌷

Sunday, February 8, 2026

मैं चाहूँ सैनिक वीरों की बलिदानी पर गीत लिखूँ

*लावणी छंद -- 16-14 पदांत लघु गुरू*

मैं चाहूँ सैनिक वीरों की, बलिदानी पर गीत लिखूँ। 
हार गया जो जीवन बाजी, उसे फर्ज की जीत लिखूँ।।

घर परिवार से कोसों दूर, जो सीमा के प्रहरी हैं। 
फर्ज के प्रति बुलंद हौसला, रात सुबह दोपहरी है।।
ले तराजू न्याय की देवी, अंधी गूंगी बहरी है ।
जयचंदों की भीड़ देखकर, मन में पीड़ा गहरी है।।
जिंदा पकड़े दुश्मन छोड़ा, उसे न्याय की जीत लिखूँ ...
मैं चाहूँ सैनिक वीरों की, बलिदानी पर गीत लिखूँ ...

पथरीली पगडंडी चलकर, जीत ही जिसकी मँजिल हो। 
क्या पता किसी ओट में छिपा, प्राण-घातक कातिल हो।।
गोली बंदूक रसद लादे, साथ न कोई सँगदिल हो। 
मातृभूमि छू ना ले दुश्मन, तीव्र नजर में तिल तिल हो ।।
दस-दस दुश्मन मार गिराया, फर्ज पे मन की प्रीत लिखूँ...
मैं चाहूँ सैनिक वीरों की, बलिदानी पर गीत लिखूँ...

कॉंटों कंकड़ पर नित चलकर, बीज शौर्य का बोता है। 
आसमान है जिसकी चादर, चट्टानों पर सोता है।। 
ठंड गर्मी बारिश का मौसम,जिस पर असर ना होता है।।
परिजन हित-रक्षा देश सुरक्षा, भार फर्ज का ढोता है।। 
विषमताओं से पल-पल जूझे, कुर्बानी को रीत लिखूँ ... 
हार गया जो जीवन बाजी, उसे फर्ज की जीत लिखूँ ... 

मैं चाहूँ सैनिक वीरों की, बलिदानी पर गीत लिखूँ । 
हार गया जो जीवन बाजी, उसे फर्ज की जीत लिखूँ ।। 

डॉ.अशोक आकाश

Wednesday, February 4, 2026

भाव सुमन दल तीरे मन को

*भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता*

​भाग १: प्रस्तावना (सृजन की भूमिका)
​१. अंतर्मन का आह्वान
सरस्वती माँ वीणा वादिनि, शब्द शक्ति दे देना।
भावों के इस सुंदर वन में, सुरभित रस भर देना।।
लिखूँ विधाता की रचना को, ऐसा मन हो पावन।
देख सकूँ मैं जर्रे-जर्रे, कुदरत का ये सावन।।
नेत्र खोल कर देखूँ जब मैं, विस्मित रह-रह जाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​२. विधाता की चित्रशाला

सजे धजे नभ पाताल धरा, देवलोक चित्रशाला।
पर्वत नदियाँ और घटाएँ, अद्भुत दर्शन माला।।
बिना तूलिका के भी प्रभु ने, रंगे रंग मनभाता।
पल-पल यहाँ बदलता मंजर, नव उमंग ऋतु त्राता।।
अगम अगोचर शक्ति रूप ही, हर छवि में मुस्काता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​३. प्रकृति-पुरुष मिलन

मौन खड़ा यह शांत हिमालय, जला हृदय मैं बाती।
बहती नदियाँ सिखा रहीं हैं, लक्ष्य मुदित मन थाती ।।
प्रकृति प्रेम ही भक्ति सार है, वेदों की शुचि वाणी।
मिट जाए सब मोह वासना, शुद्ध होय मन प्राणी।।
कण-कण में उस पारब्रह्म का, दिव्य रूप दरसाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

ब्रह्मांडीय दर्शन: विराट रूप
​४. आकाशगंगा का वैभव (तारामंडल)
​अगणित तारे झिलमिल करते, अंबर की थाली में।
नभ की गंगा बहती देखो, काल-महा-काली में।।
ग्रह-नक्षत्रों का नर्तन नभ, ताल-छंद से बँधके।
घूम रही है सृष्टि सारी, धूरी एक में फँदके।।
शून्य डगर पर दीप जलाकर, कौन पथिक मुस्काता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​५. शून्य का विस्तार (अनंत अंतरिक्ष)
​अथाह नील समंदर ऊपर, ओर-छोर नहिं जिसका।
सोच सकूँ मैं छोटा मानव, क्या अस्तित्व है मेरा।।
ब्लैक होल की गहराई हो, या प्रकाश का घेरा।
तेरी मर्जी बिना न हिलता, ब्रह्मांडीय ये तारा।।
रूप विराट देखूँ जब तेरा, गर्व चूर हो जाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​६. महा-ऊर्जा का स्रोत (ब्रह्म तेज)
​परमाणु के भीतर भी तू, गैलेक्सी में तू ही।
अंधकार के उस पार भी, ज्योतिर्मय है तू ही।।
महा विस्फोट (Big Bang) में स्वर है तेरा, तू ही परम सवेरा।
तुझसे जनम और तुझमें लय है, यह सब खेल है तेरा।।
अणु से लेकर ब्रह्म तक तू ही, एक नजर बस आता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​भाग ७: श्री गणेश (स्वरूप और संदेश)
​७. श्रवण और दृष्टि (बोध)
लंबकर्ण हैं विशाल जिनके, सब की पीर सुनाते।
क्षुद्र जीव की भी व्याकुलता, झट से सुन वे पाते।।
नेत्र सूक्ष्म हैं दिव्य दृष्टि दे, पैनी नज़र सिखाते।
ओट छिपे जो दोष-गुणों को, पल में देख बताते।।
बुद्धि-विवेक जगाकर मन में, संशय द्वार हटाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​८. गजानन स्वरूप (विशालता)
मस्तक उन्नत बड़ा गजानन, गौरव मान बढ़ाता।
लंबोदर का उदर विशालक, सब कुछ ही सह जाता।।
सुमुखि रूप है मंगलकारी, विघ्न समूह हटाते।
रिद्धि-सिद्धि के स्वामी गनपति, शुभ सुख वर्षा लाते।।
मूषक जैसा छोटा वाहन, समता पाठ पढ़ाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​९. अंकुश और पाश (नियंत्रण)
हाथों में है पाश अंकुश, संयम हमें सिखाते।
मन के चंचल गज को वश कर, सही मार्ग दिखलाते।।
मोदक का फल मीठा मिलता, जब पुरुषार्थ जगाते।
एकदंत की अटूट निष्ठा, कठिन लक्ष्य तक लाते।।
ज्ञान और विज्ञान रूप बन, प्रथम पूज्य कहलाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​भाग १० : शिव-पार्वती (प्रकृति के अधिष्ठाता)
​१०. शिव: विराट प्रकृति (पुरुष)
अंग विभूति भस्म सुशोभित, वैराग्य का है चोला।
जटा जूट में गंगा सोहे, शांत चित्त है भोला।।
कंठ गरल पर हृदय सुधा है, विष को अमृत करते।
चंद्र भाल पर शीतल अमृत, जग के ताप को हरते।।
नटराज का तांडव जैसे, लय प्रलय को लाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​११. माँ पार्वती: शक्ति स्वरूप (प्रकृति)
शक्ति रूपिणी जगदंबा माँ, धरा रूप में सोहे।
हरे-भरे इन वनों के भीतर, ममता सबकी मोहे।।
नदियाँ हैं जो नसों सरीखी, जीवन रस को देतीं।
अन्नपूर्णा बन के मैया, सबकी चिंता हरतीं।।
शैलसुता के चरणों में ही, जीवन स्वर्ग बन जाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​१२. अर्धनारीश्वर (संतुलन)
शिव और शक्ति एक ही सिक्के, के दो पहलू जैसे।
बिना प्रकृति के पुरुष अधूरा, बिन शिव शक्ति कैसे?।।
जड़ और चेतन का यहै संगम, अर्धनारीश्वर स्वामी।
सृष्टि चक्र के यही नियंता, प्रभु अंतर्यामी।।
एक ही ज्योति दो रूपों में, जग को राह दिखाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​१३. गिरि शिखर (पर्वत दृश्य)

​गिरि शिखरों पर चीड़ झुण्ड में, इठलाता बलखाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
उच्च शिखर पर पाहन अद्भुत, बैठा पॉंव पसारे।
तृण दल झट नित साहस रोपे, ऋतु शृंगार निखारे।।
चील बनाता नीड़ चीड़ के शाखों में इतराके ।
सूखी टहनी जकड़ चोंच में, उड़े गगन लहराके।।
नजर चील की आसमान से धरती पर नित रहती।
ऊँचा उड़ पर रहो धरा में, हर मानव से कहती।।
तुंग शिखर पर बैठ सपोला, मस्ती में इतराता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

१४.वन्य प्रांत दश्य

चरती चौकस चंचल हिरणी, हरित तृणों की थाती। 
नैन नीर बह नेह पिघलता, हर आहट घबराती।। 
सूर्य किरण नित ओझल होता, बदली में लुक छिपके। 
रात चॉंदनी पीहू प्रिय से, मिलता चुपके चिपके।। 
पारिजात कचनार घोलती, रस मादक नस-नस में। 
अमलतास रमणीय कुञ्ज की, छटा दिखे मधुरस में।। 
डाल नीड़ दुबकी गौरैया, हंस ताल मंडराता। 
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।। 


१५. .सरिता का प्रवाह (नदी दृश्य)

​कल-कल करती चंचल धारा, पत्थर से टकराती।
रजत धार की चादर ओढ़े, सागर तक बलखाती।
तट पर बैठे सारस जोड़े, प्रेम गीत नित गाते।
शीतल जल की छुअन पाँव में, मन को बहुत लुभाते।।
लहरें करतीं अजब ठिठोली, तट को गले लगातीं।
मिट-मिट कर भी सृजन नया कर, जीवन सार बतातीं।।
नभ का अक्स समेट हृदय में, रवि को अर्घ्य चढ़ाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​16. उषा काल (सूर्योदय दृश्य)

​रवि की पहली किरण सुनहरी, नभ पर लाली घोले।
चहक-चहकउ पंछी शाखों में, मधुर वचनियाँ बोले।।
सिंदूरी आभा में लिपटा, पर्वत मस्तक सोहे।
कण-कण में नव चेत जगाती, सबकी सुध-बुध मोहे।।
ओस की बूंदें तृण के ऊपर, मोती सी चमकातीं।
अंधकार को विदा सुनाकर, उजला पथ दिखलातीं।।
किरण-किरण में सजी आरती, जग को धीर बँधाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​१७. घनघोर घटा (वर्षा दृश्य)

​काले मेघों की टोली ने, अंबर को है घेरा।
रिमझिम-रिमझिम बूँदें गिरतीं, मिटा तपन का डेरा।।
नाच रहा वन में मयूर अब, पंख पसार निराला।
भीगी मिट्टी की खुशबू ने, मन में जादू डाला।।
मेंढक का संगीत गूँजता, पोखर के गलियारे।
तृप्त हुई है धरा आज फिर, मेघा द्वारे-द्वारे।।
दामिनि दमक-दमक कर क्षणभर, निज अस्तित्व दिखाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

१८. हिमपात (शीत दृश्य)

​श्वेत वसन में लिपटी घाटी, जैसे शांत तपस्वी।
चमक रही है बर्फ धूप में, ज्योति-पुंज मनस्वी।।
शीतल पवन झकोरे देती, सर-सर करती जाती।
ठिठुर रहे हैं पात विटप के, रुनझुन राग सुनाती।।
धुंध की चादर तान ओढ़कर, छिप गए ऊँचे टीले।
रूप सुहाना देख चकित हैं, पर्वत ये बर्फीले।।
धैर्य और गांभीर्य सिखाता, हिम का पर्वत नाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

१९​. बसंत बहार (कुसुम दृश्य)

​ऋतुराज खड़ा द्वार हमारे, कलियाँ मुसकाती हैं।
रंग-बिरंगी तितली डोलें, मन को बहलाती हैं।।
बौरों से लद गईं आम की, डारें झुक-झुक जातीं।
कोयलिया की कूक सुरीली, अंतर्मन हरसाती।।
सरसों के पीले फूलों ने, ओढ़ी चादर पीली।
मंद सुगंधित पवन चली है, सुरभित सुखद रसीली।।
पल्लव-पल्लव नव जीवन रस, मधुमय गीत सुनाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​१९. संध्या बेला (सूर्यास्त दृश्य)

​पश्चिम दिशा वसन सिंदूरी, पहन चली इठलाती।
थके हुए सब पंछी लौटे, निज नीड़ों को भाती।।
शांत खड़ा वटवृक्ष मौन है, साया लंबा करता।
ढलते सूरज का यह मंजर, वैरागी मन भरता।।
मंदिर में बज उठे शंख ध्वनि, झन-झन घंट बजाते।
धूप-दीप की खुशबू देकर, सब देवों को ध्याते।।
तिमिर बढ़ा पर आस दीप का, धीरज सदा बँधाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​२०. पूर्णमासी (चंद्र दृश्य)

पूर्ण ​दूधिया दीप नहाई, अंबर की यह नगरी।
शीतल चाँद बिखरे ऐसे, पावन धरती सगरी।।
तारों की महफ़िल में सज-धज, चंदा बीच विराजे।
जैसे शांत समंदर ऊपर, कोई  छतरी साजे।।
खिली कुमुदिनी मध्य सरोवर, आँखें नित निहारती।
मन की व्याकुलता सब खोई, उतरी जग की आरती।।
शांति और शीतलता लेकर, पावन चरित निभाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​२१. ग्रीष्म का ताप (तपन दृश्य)

​सूर्य देव ने तान दिया है, अपना छत्र करारा।
तपते पथ पर उड़ती धूलें, जलता है जग सारा।।
छाँव खोजते पंछी व्याकुल, तरु के भीतर छिपते।
पशु भी खड़े बावड़ी तीरे, व्याकुल प्यास से तपते।।
लू के थपेड़े चलें जोर से, झुलसाते अमराई।
मृग-मरीचिका रचे खेल अब, तपती हुई तराई।।
धैर्य सिखाती कठिन घड़ी यह, तपना सुख दे जाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​२२. शिशिर की ठिठुरन (शीत दृश्य)

​शिशिर ऋतु की चुभन निराली, ओस की चादर तानी।
काँप रहे हैं हाथ-पाँव सब, ठिठुर रही है नानी।।
घना कोहरा घेरा ऐसा, नजर न सूरज आता।
धुंध भरी इन गलियों में अब, पंथी राह भुलाता।।
अलाव जलाकर बैठे सारे, आग की ऊष्मा लेते।
गरम चाय की चुस्की लेकर, मात ठंड को देते।।
जड़वत हुआ विश्व ये सारा, मौन पाठ पढ़ जाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

 23. प्रकृति का अंतस (कृतज्ञता भाव)
​जड़-चेतन में व्याप्त ईश है, कण-कण कथा सुनाता।
निस्वार्थ भाव से जीवन देना, प्रकृति धर्म निभाता।।
पेड़ न अपने फल को चखते, नदियाँ जल न पीतीं।
औरों के हित जीने में ही, ये सदियाँ हैं जीतीं।।
सीखो इनसे त्याग प्रेम को, ईर्ष्या तज नर प्यारे।
तभी सफल होगा ये जीवन, चमकेंगे दिन तारे।।
कल्याणमयी संदेश जगत को, कुदरत सदा सिखाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​२४. काल चक्र (परिवर्तन का बोध)
​परिवर्तन ही नियम सृष्टि का, ऋतुएँ आतीं-जातीं।
सुख-दुख के ये चक्र निरंतर, समता भाव सिखातीं।।
पतझड़ के बाद ही हमेशा, कोमल पल्लव आते।
धैर्य धरो जो धीर वीर हैं, मंज़िल अपनी पाते।।
समय चक्र की गति निराली, रुकना कभी न जाना।
बहती धारा संग हमें भी, है आगे बढ़ जाना।।
सृजन और संहार बीच ही, जग का नाता आता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​२५. ईश महिमा - पूर्णता एवं समर्पण
​अगणित रूप अनूप विधाता, अद्भुत तेरी माया।
तुझसे ही ये अंबर फैला, तुझसे जग की काया।।
तू ही माली इस उपवन का, हम सब इसके फूल।
तेरी शरण में आकर मिटतीं, जीवन की सब धूल।।
शब्द कम पड़ें महिमा गाते, मौन नमन अब करते।
तेरी कला देख आँखों में, पावन आँसू भरते।।
रोम-रोम पुलकित है मेरा, जब तेरा गुण गाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।


२६. अंतर्यामी का वास (चेतना का दृश्य)
​बाहर जो बिखरा है वैभव, भीतर वह उजियारा।
हृदय गुहा में बैठा स्वामी, जग का भाग्य सँवारा।।
फूल खिले तो समझो मन में, सद्भावों की लाली।
नदी बहे तो जानो बहती, भक्ति की शुचि प्याली।।
भीतर देखूँ तो वह मालिक, घट-घट में मिल जाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​२७. मौन का संगीत (शून्य का दृश्य)
​शब्द जहाँ सो जाते जाकर, वह सन्नाटा देखा।
पर्वत की खामोशी में भी, ईश खींचता रेखा।।
बिना कहे सब कह देती है, यह चुप्पी वरदानी।
मौन पढ़ो तो समझ सकोगे, कुदरत की कल्याणी।।
शोर थमे जब मन का तब ही, सुर उसका मिल पाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​२८. शरणागति (अंतिम सत्य)
​पंचतत्व का पुतला यह तन, मिट्टी में मिल जाना।
इसी प्रकृति की गोदी में ही, अंततः सुस्ताना।।
वृक्ष सिखाते झुकना सबको, फल पाकर अभिमानी।
हम भी सीखें प्रभु चरणों में, लिखनी अमिट कहानी।।
तेरा तुझको अर्पण करके, मन पावन हो जाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​भाग २९. श्री गणेश (स्वरूप और संदेश)
​१. श्रवण और दृष्टि (बोध)
लंबकर्ण हैं विशाल जिनके, सब की पीर सुनाते।
क्षुद्र जीव की भी व्याकुलता, झट से सुन वे पाते।।
नेत्र सूक्ष्म हैं दिव्य दृष्टि दे, पैनी नज़र सिखाते।
ओट छिपे जो दोष-गुणों को, पल में देख बताते।।
बुद्धि-विवेक जगाकर मन में, संशय द्वार हटाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​३०. गजानन स्वरूप (विशालता)
मस्तक उन्नत बड़ा गजानन, गौरव मान बढ़ाता।
लंबोदर का उदर विशालक, सब कुछ ही सह जाता।।
सुमुखि रूप है मंगलकारी, विघ्न समूह हटाते।
रिद्धि-सिद्धि के स्वामी गनपति, शुभ सुख वर्षा लाते।।
मूषक जैसा छोटा वाहन, समता पाठ पढ़ाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​३२. अंकुश और पाश (नियंत्रण)
हाथों में है पाश अंकुश, संयम हमें सिखाते।
मन के चंचल गज को वश कर, सही मार्ग दिखलाते।।
मोदक का फल मीठा मिलता, जब पुरुषार्थ जगाते।
एकदंत की अटूट निष्ठा, कठिन लक्ष्य तक लाते।।
ज्ञान और विज्ञान रूप बन, प्रथम पूज्य कहलाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​भाग ३३: शिव-पार्वती (प्रकृति के अधिष्ठाता)
​३३ : विराट प्रकृति (पुरुष)
अंग विभूति भस्म सुशोभित, वैराग्य का है चोला।
जटा जूट में गंगा सोहे, शांत चित्त है भोला।।
कंठ गरल पर हृदय सुधा है, विष को अमृत करते।
चंद्र भाल पर शीतल अमृत, जग के ताप को हरते।।
नटराज का तांडव जैसे, लय प्रलय को लाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

३३.माँ पार्वती: शक्ति स्वरूप (प्रकृति)
शक्ति रूपिणी जगदंबा माँ, धरा रूप में सोहे।
हरे-भरे इन वनों के भीतर, ममता सबकी मोहे।।
नदियाँ हैं जो नसों सरीखी, जीवन रस को देतीं।
अन्नपूर्णा बन के मैया, सबकी चिंता हरतीं।।
शैलसुता के चरणों में ही, जीवन स्वर्ग बन जाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​३३. अर्धनारीश्वर (संतुलन)
शिव और शक्ति एक ही सिक्के, के दो पहलू जैसे।
बिना प्रकृति के पुरुष अधूरा, बिन शिव शक्ति कैसे?।।
जड़ और चेतन का यह संगम, अर्धनारीश्वर स्वामी।
सृष्टि चक्र के यही नियंता, प्रभु अंतर्यामी।।
एक ही ज्योति दो रूपों में, जग को राह दिखाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।

​३५. 
ऌ कमल-आसन और उद्भव
​नाभि-कमल से प्रकटे ब्रह्मा, सृजन हेतु मुस्काते।
चार मुखों से चारों वेदों, का पावन स्वर गाते।।
शून्य डगर पर प्राण फूँककर, जीवन बीज बोया।
चेतना जागी जड़ जगती में, जो था युगों से सोया।।
सृष्टि-शिल्पी की चतुराई, अमित रूप दिखलाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​३६. हंस वाहिनी और विवेक
​शुभ्र वसन और हंस वाहिनी, नीर-क्षीर बतलाती।
सत्य-असत्य का भेद कराकर, जग को ज्ञान सिखाती।।
हाथों में कमंडल माला, संयम और तप धारे।
रच दी सारी सृष्टि निराली, चंदा सूरज तारे।।
बुद्धि और एकाग्र भाव से, सकल विश्व बन जाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
​३७. नियंता का विधान
​लिख दी सबकी भाग्य-लिपि को, कर्मों के आधार।
क्षण-क्षण का हिसाब है रखता, यह अद्भुत संसार।।
सत्व-रज-तम के धागों से, जीवन वस्त्र बुना है।
विधाता ने हर साँस के भीतर, अपना राग सुना है।।
मूक खड़ा देखूँ रचना को, मन पुलकित हो जाता।
भाव सुमन दल तीरे मन को, कैसा दृश्य विधाता।।
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अशोक आकाश