संस्कार की पूंजी को, तुम जितना सम्भालोगे।
बेकार की झंझट से, खुद को ही निकालोगे।।
झूठों की जीत होती, अरु सत्य हारता है।
बैर मन में पाले, घृणा जो वारता है।।
नफरत की ऑंधियों को, तुम कितना उछालोगे...
बेकार के झंझट में, तुम खुद को ही पाओगे।
रावण सी पंडिताई, जो मद में खोएगा।
सोने की अपनी लंका, वो खुद ही डुबोएगा।
घमंड की लपटों को, तुम जितना हवा दोगे...
बेकार के झंझट में, तुम खुद को ही पाओगे...
चतुरंगिणी कौरव की, क्यों रण में हार बैठे।
जब सत्य सारथी हो, पॉंडव पुकार बैठै।।
धर्म की ध्वजा को, तुम जितना उठाओगे...
बेकार की झंझट से, खुद को ही निकालोगे...
बिक कर भी सत्यता ने, कभी हार न मानी थी।
हरिश्चंद्र की भगति को , दुनिया ने भी जानी थी।।
मर्यादा की रेखा को, तुम जितना सजाओगे...
बेकार की झंझट से, खुद को ही निकालोगे...
डॉ.अशोक आकाश🌷🌷
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