*लावणी छंद -- 16-14 पदांत लघु गुरू*
मैं चाहूँ सैनिक वीरों की, बलिदानी पर गीत लिखूँ।
हार गया जो जीवन बाजी, उसे फर्ज की जीत लिखूँ।।
घर परिवार से कोसों दूर, जो सीमा के प्रहरी हैं।
फर्ज के प्रति बुलंद हौसला, रात सुबह दोपहरी है।।
ले तराजू न्याय की देवी, अंधी गूंगी बहरी है ।
जयचंदों की भीड़ देखकर, मन में पीड़ा गहरी है।।
जिंदा पकड़े दुश्मन छोड़ा, उसे न्याय की जीत लिखूँ ...
मैं चाहूँ सैनिक वीरों की, बलिदानी पर गीत लिखूँ ...
पथरीली पगडंडी चलकर, जीत ही जिसकी मँजिल हो।
क्या पता किसी ओट में छिपा, प्राण-घातक कातिल हो।।
गोली बंदूक रसद लादे, साथ न कोई सँगदिल हो।
मातृभूमि छू ना ले दुश्मन, तीव्र नजर में तिल तिल हो ।।
दस-दस दुश्मन मार गिराया, फर्ज पे मन की प्रीत लिखूँ...
मैं चाहूँ सैनिक वीरों की, बलिदानी पर गीत लिखूँ...
कॉंटों कंकड़ पर नित चलकर, बीज शौर्य का बोता है।
आसमान है जिसकी चादर, चट्टानों पर सोता है।।
ठंड गर्मी बारिश का मौसम,जिस पर असर ना होता है।।
परिजन हित-रक्षा देश सुरक्षा, भार फर्ज का ढोता है।।
विषमताओं से पल-पल जूझे, कुर्बानी को रीत लिखूँ ...
हार गया जो जीवन बाजी, उसे फर्ज की जीत लिखूँ ...
मैं चाहूँ सैनिक वीरों की, बलिदानी पर गीत लिखूँ ।
हार गया जो जीवन बाजी, उसे फर्ज की जीत लिखूँ ।।
डॉ.अशोक आकाश
जबरदस्त
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