वैराग्य बोध (मनहरण घनाक्षरी)
कागज के टुकड़े जो, मिटाते हों दुखड़े तो,
मौत टाल सके रखो, जारी मारा-मारी है।
ये सोना जो कमाया तू , क्या साथ ले जा पाया तू ,
कफन में जेब कहाँ, कब्र आलमारी है।।
साँसें जो उधार की, न रीति समझी यार की,
माया की ये कोठरी तो, जलने की बारी है।
संचय कर हारे जो, न सत्य को विचारे जो,
'अशोक आकाश' मिट्टी, देह देखो भारी है।। 1 ।।
महलों की शान में तू , भूल गया भान में तू ,
खड़ा यमराज देखो, द्वारे पे सवारी है।
सिंहासन छूट जाए, नाता-गोता टूट जाए,ऐसी इस जगत की, रीति ही अनारी है।।
धन ज्ञान दंभ भरे, शक्ति का घमंड करे,
पाप की ये पोटली तो, तूने ही सँवारी है।
अहंकार छोड़ दे तू , नाता प्रभु से जोड़ दे,
'अशोक आकाश' मौत, आनी बारी- बारी है।। 2 ।।
नेकी जो कमाई गई, वही तो सहाई होई,
बाकी सब ढोंग यहाँ, दुनिया में जारी है।
स्वार्थ में जो अंधा हुआ, पाप में ही बंधा हुआ,
ईश्वर के पास अब, तेरी जिम्मेदारी है।
मुट्ठी बांधे आया था, न कुछ साथ लाया था,
हाथ पसारके जाना, सबकी लाचारी है।
मौत पर रिश्ते सभी, काम कोई आये कभी,
लिखे 'अशोक आकाश' भारी लाचारी है।। 3 ।।
रैन का बसेरा यहॉं, नहीं कुछ तेरा यहॉं,
झूठी सुख-शांति वाली, ये तो होशियारी है।
राम नाम गाता चल, प्रेम रस पाता चल,
सत्य की ये राह देखो, जग से ही न्यारी है।।
काया जो ढलेगी अब, चिता ही जलेगी अब,
पंचतत्व की ये कैसी, अद्भुत चित्रकारी है।
चेत ले रे प्राणी तू, न बन अब ज्ञानी तू,
'अशोक आकाश' अंत, होना ही विदाई है।। 4 ।।
डॉं.अशोक आकाश
कोहंगाटोला बालोद छत्तीसगढ़...
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