*विधाता छंद*
1222, 1222, 1222, 1222, 1222
*नौकरीपेशा व्यक्ति की पीड़ा*
*विधाता नौकरी पाकर भला क्या खाक पाया*
विधाता नौकरी पाकर, भला क्या खाक पाया है।
चले थे हम जवानी ले, बुढ़ापा हाथ आया है॥
सबेरे ही उठो भागो, लगी है दौड़ जीवन में।
न सुख की साँस ले पाए, मची है रार तन-मन में॥
मशीनी जिंदगी अपनी, किसे यह दुःख सुनाया है।
चले थे हम जवानी ले, बुढ़ापा हाथ आया है॥ 1।।
दबे फाईल के नीचे, सुहाने ख्वाब टूटे क्या।
मिले जो घाव दफ्तर से, कभी वो दर्द छूटे क्या॥
कमाई चार पैसों की, बड़ा ही ताव लाया है।
चले थे हम जवानी ले, बुढ़ापा हाथ आया है॥ 2 ।।
तरसते हैं कि बच्चों से, जरा दो बात हम कर लें।
घड़ी दो-चार अपनों के, सुहाने रंग में भर लें॥
मगर सब काम के डर ने, सदा हमको रुलाया है।
चले थे हम जवानी ले, बुढ़ापा हाथ आया है॥ 3 ।।
कमाते जिंदगी बीती, नहीं कुछ साथ चलना है।
सिकंदर की तरह ही, हम सभी को हाथ मलना है॥
समझ यह बात अब आई, जिसे दिल ने भुलाया है।
विधाता नौकरी पाकर, भला क्या खाक पाया है॥ 4 ।।
निचोड़ा खून जीवन भर, उड़ाते शौक से बच्चे।
लगे हैं फूँकने पैसे, नहीं वो राह के सच्चे॥
सजाती रोज ही महफिल, प्रिया ने मन लुभाया है।
चले थे हम जवानी ले, बुढ़ापा हाथ आया है॥ 5 ।।
कमाई देख ज़ाया जो, कलेजा काँपता मेरा।
हुई है बंद किस्मत तो, मुझे नाकामियॉं घेरा॥
कठिन जो रात-दिन काँटे,खुशी से जी न पाया है।
चले थे हम जवानी ले, बुढ़ापा हाथ आया है॥ 6 ।।
बने सब स्वार्थ के साथी, न कोई दर्द को समझे।
तिजोरी खोखली करके, सभी खुद जाल में उलझे॥
पराया अंत में जाना, जिसे अपना बनाया है।
विधाता नौकरी पाकर, भला क्या खाक पाया है॥ 7 ।।
गले से रोग लिपटा है, सही है वेदना भारी।
मगर संतोष है मन में, समझ ली रीति यह सारी।।
प्रतीक्षा मौत की अब तो, अशोकाकाश गाया है।
चले थे हम जवानी ले, बुढ़ापा हाथ आया है।। 8 ।।
डॉ.अशोक आकाश