Sunday, April 12, 2026

वैराग्य-बोध (मनहरण घनाक्षरी)

​वैराग्य बोध (मनहरण घनाक्षरी)
​कागज के टुकड़े जो, मिटाते हों दुखड़े तो,
मौत टाल सके रखो, जारी मारा-मारी है।
ये सोना जो कमाया तू , क्या साथ ले जा पाया तू ,
कफन में जेब कहाँ, कब्र आलमारी है।।
साँसें जो उधार की, न रीति समझी यार की,
माया की ये कोठरी तो, जलने की बारी है।
संचय कर हारे जो, न सत्य को विचारे जो,
 'अशोक आकाश' मिट्टी, देह देखो भारी है।। 1 ।। 
​महलों की शान में तू , भूल गया भान में तू , 
खड़ा यमराज देखो, द्वारे पे सवारी है।
सिंहासन छूट जाए, नाता-गोता टूट जाए,ऐसी इस जगत की, रीति ही अनारी है।।
धन ज्ञान दंभ भरे, शक्ति का घमंड करे,
पाप की ये पोटली तो, तूने ही सँवारी है।
अहंकार छोड़ दे तू , नाता प्रभु से जोड़ दे,
'अशोक आकाश' मौत, आनी बारी- बारी है।। 2 ।। 
​नेकी जो कमाई गई, वही तो सहाई होई,
बाकी सब ढोंग यहाँ, दुनिया में जारी है।
स्वार्थ में जो अंधा हुआ, पाप में ही बंधा हुआ,
ईश्वर के पास अब, तेरी जिम्मेदारी है।
मुट्ठी बांधे आया था, न कुछ साथ लाया था,
हाथ पसारके जाना, सबकी लाचारी है। 
मौत पर रिश्ते सभी, काम कोई आये कभी, 
लिखे 'अशोक आकाश' भारी लाचारी है।। 3 ।। 
​रैन का बसेरा यहॉं, नहीं  कुछ तेरा यहॉं,
झूठी सुख-शांति वाली, ये तो होशियारी है।
राम नाम गाता चल, प्रेम रस पाता चल,
सत्य की ये राह देखो, जग से ही न्यारी है।।
काया जो ढलेगी अब, चिता ही जलेगी अब,
पंचतत्व की ये कैसी, अद्भुत चित्रकारी है।
चेत ले रे प्राणी तू, न बन अब ज्ञानी तू,
'अशोक आकाश' अंत, होना ही विदाई है।। 4 ।। 

डॉं.अशोक आकाश
कोहंगाटोला बालोद छत्तीसगढ़... 
9755889199

Thursday, April 2, 2026

मातु भवानी कृपा कीजिये

मातु भवानी कृपा कीजिये
गीत - प्रदीप छंद-16,13 पदांत 212 

मातु भवानी कृपा कीजिये, दो ऐसा वरदान मॉं।
हो अखंड सौभाग्य हमारा, पुलकित रहे जहान मॉं।।

व्रती निर्जला सदा सुहागन, भादो तीज तिहार में।
शिव गौरी पूजन करती हैं, सज सोलह शृंगार में॥
हम सबका सिन्दूर अमर हो, वर दो कृपानिधान मॉं...
हो अखण्ड सौभाग्य हमारा, पुलकित रहे जहान मॉं...

लाली चूड़ी बिंदी चूनर, सिन्दूर लाली से सजूँ।
लाली साड़ी लाल महावर, होठों में लाली रचूँ ॥
जवाकुसुम सी नित लाली हो, दो जीवन सम्मान मॉं ।
हो अखण्ड सौभाग्य हमारा, पुलकित रहे जहान मॉं...

मधुर ध्वनि शुचि वन्दन गाऊँ, मंगल गीत उचारते।
घंटा शंख मृदंग बजाऊँ, माता तुम्हें पुकारते।
फूल कनेर  मदार चढ़ाऊँ, कर लूँ शिव आह्वान मॉं।
हो अखंड सौभाग्य हमारा, पुलकित रहे जहान मॉं॥

*डॉ.अशोक आकाश✍️दिनॉंक-27-8-2025

Thursday, March 26, 2026

विधाता छंद- सदा व्यवहार ही हमको दिखाता आईना ऐसा

विधाता छंद

सदा व्यवहार ही हमको, दिखाता आइना ऐसा। 
इसी से ही हमें मिलती, सफलता प्रशंसा पैसा।।

दुखी करते सुखी जन को,  बिखरता आग मन ढँपकर। 
शिखर का सूर्य भी डूबे, दहककर दर्प से खपकर।। 
करें व्यवहार हम जैसा, मिलेगा हमको भी वैसा। 

सदा व्यवहार ही हमको, दिखाता आइना ऐसा... 
इसी से ही हमें मिलती, सफलता प्रशंसा पैसा... 

जरा सा पा गया जो भी, तनिक आकाश छूलोगे ? 
तुम्हारी हैसियत क्या है, शिखर पे बैठ भूलोगे !! 
कभी गिरकर उठोगे क्या ? न सोचा हो गया वैसा... 

सदा व्यवहार ही हमको, दिखाता आइना ऐसा... 
इसी से ही हमें मिलती, सफलता प्रशंसा पैसा.. 

खुशी तुमको मिलेगी ही, चहक कर बात कर लोगे। 
किसी से प्रेम से बोलो, जगत में राज कर लोगे।। 
नहीं शैतान सा झूमो, रहो इंसान केे जैसा... 

सदा व्यवहार ही हमको, दिखाता आइना ऐसा... 
इसी से ही हमें मिलती, सफलता प्रशंसा पैसा... 
डॉ.अशोक आकाश
बालोद छत्तीसगढ़
9755889199
दिनॉंक 8/11/2025 दिन शनिवार

सुम्मत के अंजोर (छत्तीसगढ़ी कहानी) ​राम्हेपुर गाँव विकास के नव गाथा गढ़त सुन्दर अउ शिक्षित परिवार वाले समृद्ध गॉंव रीहिस। जिहाँ तक नजर परे हरियर-हरियर खेत । ये गॉंव में अमीरी के शान रीहिस त गरीबी के ओतके इज्जत करैया मनखे मनके सहृदयता । ये गॉंव में अब्बड़ सुग्घर एक ठन जुन्ना घर रहिस जेकर नॉंव रीहिस शिवा सुमन निवास। ये घर शर्मा परिवार के रहिस, जिहाँ तीन पीढ़ी के मन एक संग रहत रहिन – शिवा शर्मा ओकर बाई सुमन शर्मा, ओखर बेटा रविन्द्र, बहू प्रियंका अउ आठ साल के नाती अर्पण। ये घर म हँसी-खुशी के माहौल रहिस, फेर कुछ दिन ले एमा दरार आवन लगिस । रविन्द्र अउ प्रियंका के बीच छोटे-छोटे बात म झगरा होवन लगिस, अउ ओखर मन के कड़वाहट धीरे-धीरे पूरा घर ला अपन चपेट म लेवत रहिस। दादाजी जऊन शांत स्वभाव के रहिन, ए सब ला देख के बहुत दुखी रहिन, फेर ओखर मन ला समझ नइ आवत रहिस कि का करँव। ​एक साँझ, रविन्द्र अउ प्रियंका कोनो बात बर फेर लड़ाई होवत रीहिस। अर्पण अपन दाई-ददा ला लड़त देखत रहिस, ओला बहुत खराब लागत रहिस। ओ अपन दादाजी करा गिस, जऊन बाहिर के बरामदा म बइठ के सुरुज ला बूड़त देखत रीहिस । अर्पण ओखर ले पूछिस- "दादाजी, दाई-ददा हमेशा काबर लड़थे? का हमर घर टूट जाही ?" ​दादाजी अर्पण के मुड़ म हाथ फेरिस अउ गहिर साँस लिस- "नइ रे मोर बेटा, हमर घर नइ टूटे, कभू-कभू मनखे एक-दूसर ले कोनो बात के असहमति में लड़ भले जाथे, फेर मया हमेशा ओला वापिस ले आथे।" ​अगला दिन, दादाजी एक अनोखा तरीका अपनाइस, ओ रविन्द्र अउ प्रियंका दुनों ले कहिस कि ओला घर म कुछ बदलाव करना हे। ओ कहिस, "मैं चाहत हँव कि तुमन दुनों एक-एक ठन जुन्ना चीज चुनौ, जौन बेकार हे, जऊन ला तुमन घर ले निकालना चाहत हव, अउ फेर एक-एक ठन नवा चीज चुनौ जऊन ला तुमन घर म लाना चाहत हव।" रविन्द्र अउ प्रियंका पहिली तो हैरान होइन, फेर दादाजी के कहे मँ ओ मन मानगे। ​रविन्द्र अपन जुन्ना स्टडी रूम मँ परे, एक ठन टूटे कुर्सी ला निकाले के फैसला करिस, जऊन ओला हमेशा ओखर लंगड़ा होय के सुरता देवावत रहिस, जब रविन्द्र के पौर साल एक्सीडेंट में गोड़ टूटगे रीहिस, बहुत ईलाज के बाद ठीक होय रीहिस, फेर ये पीरा आज भी वो टुटहा कुर्सी ल देख के सुरता आ जावत रीहिस। दादाजी ओ ला बढ़ई करा लेगके बनवा के ले आनिस। प्रियंका रसोई ले एक ठन फूलकॉंस के जुन्ना अउ सुन्दर लोटा निकालिस, जेकर पेंदा में छेदा होगे रीहिस अउ ओला ओखर खराब मूड के सुरता देवावत रिहिस, दादा जी ओला कसेर करा लेगके टपरवा के ले आनिस, अउ बेटा बहू दूनो ला समझावत कीहिस--"घर हा सुम्मत के रद्दा में रेंगके ही स्वर्ग बन सकथे बेटा, जब कोनो जिनीस टूट फूट जथे त ओला टपरवा देबो या बदल देबो, लेकिन जब कोनो रिश्ता में दरार आथे त ओला टपरे के एके तरीका हे, एक दूसरा के प्रति विश्वास, धीरज अउ संयम के साथ एक दूसरा ला समझना अउ एक दूसरा के सहयोग करना। जीवन के सफर बहुत लम्बा हे बेटा, लड़त रहिबो त ये डोंगा बूड़ जही । जब जिनगी के नैया पार करना हे त सहयोग अउ मया के पतवार चाही, एला कभू नई छोड़ना हे, अउ न कभू टूटन देना हे। ​अब नवा चीज लाने के बारी रहिस । दादाजी सुझाव दिस कि ओ दुनों मिल के कुछ अइसे चुनव जऊन पूरा परिवार बर होय। बहुत सोचे के बाद, रविन्द्र सुझाव दिस कि एक ठन नवा बड़े डाइनिंग टेबल खरीदन, ताकि सबे झन संग बइठ के खाना खा सकन, प्रियंका सहमति जतइस, अउ कहिस कि हमन टेबल के ऊपर एक ठन सुग्घर झूमर घलो लगा सकत हन, ताकि घर म अंजोर अउ खुशी आए। ​जब नवा डाइनिंग टेबल अउ झूमर आगे, त पूरा घर के माहौल बदलगे । ओ मन सबो अब संग बइठ के खाना खावय त उही फुलकँसहा लोटा मँ पानी पीययँ अउ कुर्सी में बैठत रहिन। उदसहा घर में अब सुम्मत के अंजोर बगरगे रीहिस। रविन्द्र अउ प्रियंका अउ घर के सबे सदस्य हँसी खुशी घरू काम में एक दूसर के मदद करे लगिन। झूमर के अंजोर मँ ओखर घर पहिली ले ज्यादा सुग्घर शांत अउ अंजोर दिखत रिहिस। ​एक दिन, खाना खावत खानी दादाजी रविन्द्र ले कहिस, "देख बेटा, ये घर ईंटा अउ सीमेंट ले नइ बनय, ये मया अउ समझदारी ले बनथे। जब कोनो चीज टूटथे, त ओला फेंके के बजाय, सुधारे के कोसिस करना चाही। ऐसने कई बेर एक दूसर के विचार नई मिले से टकराव के स्थिति आ जथे, ऐसन बेरा में एक दूसरा के सम्मान करत सबे झन ला स्थिति के अनुरूप शांति से काम लेना चाही। तभे तो सुम्मत के अंजोर ले नानचुन घर हा घलो घर स्वर्ग बन जथे। " डॉ.अशोक आकाश ग्रा लोद 9755889199

  

नवम सिद्धिदात्री मैया

नवम दिवस माईं, सिद्धिदात्री सुखदायी, 
साधक बाधा मिटाने, आई झकझोर के। 
चक्र गदा धनु शंख, धारी पूजे राजा रंक, 
फूल धूप दीप संग, नारियल फोड़ के ।। 
उलट पुलट करे, दुष्ट जो गलत करे, 
विनाश संकट करे, पल में निहोर के। 
अशोक आकाश लिखे, चरणों में जो भी झुके, 
मैया जी को देख मिटे, पीरा पोर पोर के।। 
सृजन दिनॉंक
18/12/2025

मनहरण घनाक्षरी - षष्ठम कात्यायिनी

षष्ठम दिवस मुनि, कात्यायिनी कन्या गुनि, 
दावन दलन धुनि, जग में जलाती है। 
खूंखार सिंह सवार, लाल वस्त्र भुजा चार, 
शहद पी हलवा खा, अहम पचाती है।। 
एक हाथ तलवार, दूसरे कमल धार, तीसरा अभय चौथा, वर मुद्रा छाती है। 
अशोक आकाश कहे, जो देवी शरण रहे, 
संकट विवाह बाधा, पल में भगाती है।। 
सृजन दिनॉंक
13/11/2025

मनहरण घनाक्षरी - पंचम स्कंध माता

पंचम दिवस माईं, द्वार स्कंध माता आई, 
कमल सिंहासन मे, देवी जी विराज के। 
भवानी मैया जी लक्ष, असुर संहार दक्ष, 
विषधर नाग भक्ष, धारे रूप बाज के।। 
ममता मूरत भूप, करुणा वात्सल्य रूप, 
पूजे वो न गिरे कूप, सूनो पूत आज के।
सर्व दुख निवारिणी, स्नेह रूप धारिणी हे, 
अशोक आकाश मातु, धारे धर्म साज के।।
सृजन दिनॉंक
29/9/2025