Monday, June 15, 2026

सत्य ही शुभ सााधना है

          सत्य ही शुभ साधना है
              (गीतिका छंद)
सत्य ही शुभ साधना है, सत्य धन बिन सार क्या?
सत्य सूरज सम अटल है, सत्य बिन संसार क्या?

सत्य ही निज धर्म कर लो, सत्यता से प्यार कर।
सत्य-पथ दण्डित हुए, यह धृष्टता हर बार कर।।

सत्य सद् मारग दिखाता, सत्य सम अंगार क्या❓
सत्य सूरज सम अटल है, सत्य बिन संसार क्या❓

झूठ दमके चार दिन फिर, हाय लगती जिंदगी!
सत्य के मारग छिटकता, झूठ ऐसी गन्दगी।।
झूठ कालिख सूर्य ढँक दे, झूठ सम मनुहार क्या❓
सत्य सूरज सम अटल है, सत्य बिन संसार क्या❓

सत्य पलकों पे बिठाओ, हो भले कॉंटों सफर।
सत्य के पथ जीत ही है, सत्य बिन इंसान सिफर।।
सत्य पथ नित सब निखरते, सत्य के पथ हार क्या❓
सत्य सूरज सम अटल है, सत्य बिन संसार क्या❓
डॉ अशोक आकाश
बालोद छत्तीसगढ़
9755889199

Sunday, June 14, 2026

विधाता नौकरी पाकर भला क्या खाक पाया है..

*विधाता छंद* 
1222,  1222,   1222,  1222,   1222

*नौकरीपेशा व्यक्ति की पीड़ा* 
 *विधाता नौकरी पाकर भला क्या खाक पाया*
विधाता नौकरी पाकर, भला क्या खाक पाया है।
चले थे हम जवानी ले, बुढ़ापा हाथ आया है॥
​सबेरे ही उठो भागो, लगी है दौड़ जीवन में।
न सुख की साँस ले पाए, मची है रार तन-मन में॥
मशीनी जिंदगी अपनी, किसे यह दुःख सुनाया है।
चले थे हम जवानी ले, बुढ़ापा हाथ आया है॥ 1।। 
​दबे फाईल के नीचे, सुहाने ख्वाब टूटे क्या।
मिले जो घाव दफ्तर से, कभी वो दर्द  छूटे क्या॥
कमाई चार पैसों की, बड़ा ही ताव लाया है।
चले थे हम जवानी ले, बुढ़ापा हाथ आया है॥ 2 ।।
​तरसते हैं कि बच्चों से, जरा दो बात हम कर लें।
घड़ी दो-चार अपनों के, सुहाने रंग में भर लें॥
मगर सब काम के डर ने, सदा हमको रुलाया है।
चले थे हम जवानी ले, बुढ़ापा हाथ आया है॥ 3 ।। 
​कमाते जिंदगी बीती, नहीं कुछ साथ चलना है।
सिकंदर की तरह ही, हम सभी को हाथ मलना है॥
समझ यह बात अब आई, जिसे दिल ने भुलाया है।
विधाता नौकरी पाकर, भला क्या खाक पाया है॥ 4 ।। 

निचोड़ा खून जीवन भर, उड़ाते शौक से बच्चे।
लगे हैं फूँकने पैसे, नहीं वो राह के सच्चे॥
सजाती रोज ही महफिल, प्रिया ने मन लुभाया है।
चले थे हम जवानी ले, बुढ़ापा हाथ आया है॥ 5 ।। 

​कमाई देख ज़ाया जो, कलेजा काँपता मेरा।
हुई है बंद किस्मत तो, मुझे नाकामियॉं घेरा॥
कठिन जो रात-दिन काँटे,खुशी से जी न पाया है।
चले थे हम जवानी ले, बुढ़ापा हाथ आया है॥ 6 ।। 

​बने सब स्वार्थ के साथी, न कोई दर्द को समझे।
तिजोरी खोखली करके, सभी खुद जाल में उलझे॥
पराया अंत में जाना, जिसे अपना बनाया है।
विधाता नौकरी पाकर, भला क्या खाक पाया है॥ 7 ।। 

गले से रोग लिपटा है, सही है वेदना भारी। 
मगर संतोष है मन में, समझ ली रीति यह सारी।। 
प्रतीक्षा मौत की अब तो, अशोकाकाश गाया है। 
चले थे हम जवानी ले, बुढ़ापा हाथ आया है।। 8 ।। 

डॉ.अशोक आकाश

ताटंक छंद- गीत खुशी के गाना है

ताटंक छंद -: "गीत खुशी के गाना है"
अब आया उत्कर्ष नवल नित, मिलकर दीप जलाना है।
पुलकित मन दुख भार भूलकर, गीत खुशी के गाना है।।

फूलों से पथ रोज़ सजाया, धैर्य हृदय में धारा है।
जब आँधी में दीप जलाया, तब जीवन उजियारा है।
निशि वासर तपकर खप जायें, तभी स्वर्ग सुख पाना है।
मन पुलकित दुख भार भूलकर, गीत खुशी के गाना है... 

सदमारग सत्कर्मों के पथ, तोड़ चले अंधियारे वो।
साहस का शृंगार हृदय में , जीवन शौर्य उतारे जो।। 
श्रम की बूंद-बूंद से सोना, अब हमको उपजाना है। 
मन पुलकित दुख भार भूलकर, गीत खुशी के गाना है।। 

संघर्षों की धूल झड़ी तो, भाग्य द्वार दौड़े आया।
जब दिन थे विपरीत याद है, धनिकों के कोड़े खाया।। 
अब तो कर्म किरण से जीवन, स्वर्ण सदृश दमकाना है। 
मन पुलकित दुख भार भूलकर, गीत खुशी के गाना है।।

डॉ.अशोक आकाश
बालोद छत्तीसगढ़
9755889199

Wednesday, June 3, 2026

मातु भवानी कृपा कीजिये - प्रदीप छंद

*मातु भवानी कृपा कीजिये*

गीत - प्रदीप छंद-16,13 पदांत 212

 *मातु भवानी कृपा कीजिये, दो ऐसा वरदान मॉं।
 हमारा, पुलकित रहे जहान मॉं...* 

*लाली चूड़ी बिंदी चूनर, सिन्दूर लाली से सजूँ।*
*लाली साड़ी लाल महावर, होठों में लाली रचूँ ॥*
*जवाकुसुम सी नित लाली हो, दो जीवन सम्मान मॉं ।*

*हो अखण्ड सौभाग्य हमारा, पुलकित रहे जहान मॉं...* 

*मधुर ध्वनि शुचि वन्दन गाऊँ, मंगल गीत उचारते।*
*घंटा शंख मृदंग बजाऊँ, माता तुम्हें पुकारते।*

*फूल कनेर  मदार चढ़ाऊँ, कर लूँ शिव आह्वान मॉं।*
*हो अखंड सौभाग्य हमारा, पुलकित रहे जहान मॉं॥*

डॉ.अशोक आकाश✍️
दिनॉंक-27-8-2025

Tuesday, June 2, 2026

स्वजन स्वीकार करो संदेश

​गीत: स्वजन स्वीकार करो संदेश
​मुखड़ा:
स्वजन स्वीकार करो संदेश, स्वजन स्वीकार करो संदेश।
जब मेरे आँगन में गूँजी, इस बिटिया किलकारी।
तब मेरी बगिया में महकी, नित नित नव मधुरिम क्यारी।।
अब मेरे ये प्राणदीप जा रही पिया के देश...
स्वजन स्वीकार करो संदेश...
​अंतरा 1:
उँगली थामी सिसक-सिसक कर, चलना जिसे सिखाया।
आज वही बिटिया रानी ने, पराया देश बसाया।।
बाबुल की गलियां सब छूटीं, छूटा सुंदर वेश।
स्वजन स्वीकार करो संदेश...
​अंतरा 2:
बचपन के वो खेल खिलौने, आँगन की वो क्यारी।
छोड़ चली तू लाडो अपनी, सखियाँ प्यारी-प्यारी।।
पिया नगर में सुख तुम पाना, तजकर सारा क्लेश।
स्वजन स्वीकार करो संदेश...
​अंतरा 3:
जिस घर की तू लक्ष्मी बनकर, पली बढ़ी सुख पाकर।
उस घर को भी स्वर्ग बनाना, पावन प्रीत जगाकर।।
मर्यादा की जोत जलाना, तजकर मद लवलेश।
स्वजन स्वीकार करो संदेश...
​अंतरा 4:
सदा सुहागन रहो लाड़ली, आशीषों की माला।
पीहर और ससुराल पक्ष में, चमके सदा उजाला।।
महके उपवन जीवन का यह, जैसे 
स्वजन स्वीकार करो संदेश...

डॉ.अशोक आकाश

Saturday, May 23, 2026

रक्तदान है महादान

*रक्तदान है महादान*
थैलीसीमिया पीड़ित बच्चों को सब मिल आजाद करो, 
रक्तदान है महादान तुम, रक्तदान फरियाद करो। 

महापुरुष थे वे भी  जिसने, परहित में ऐलान किया। 
देख राष्ट्र हित स्वहित त्यागते, जन जन गौरव गान किया।। 
इसीलिए समरस संस्था ने, जनहित में ऐलान किया।
रक्तदान प्रेरक संस्था बन, जन सेवा सम्मान किया।। 

अखिल विश्व से थैलीसीमिया, पीड़ित को आबाद करो... 
रक्तदान है महादान तुम, रक्तदान फरियाद करो... 

अंतरतम में झॉंको देखो, मूक वेदना क्रंदन को। 
थैलीसीमिया से व्याकुल जन की समझो स्पंदन को।। 
बूंद बूंद शोणित की पाकर, खिल उठती उपवन की कली। 
छँट जाता अवसाद तिमिर का, खिलता जीवन  कूंज गली।। 

पुण्य कर्म जीवन में कर लो, तुम सहर्ष यह नाद करो ...
रक्तदान है महादान तुम, रक्तदान  फरियाद करो...

रक्तदान से देह शिथिल हो, यह मिथ्या संशय भ्रम है। 
प्रकृति नियम है घट शोणित का, तनिक नही रुकता क्रम है।। 
अक्षय पात्र सदृश यह काया, स्वतः सृजन का दम भरता। 
मरणोन्मुख क प्राणदान दे, नव उत्साह सतत करता।। 

जब मानवता तुझमें जीव्त, मानवता की बात करो...
रक्तदान है महादान तुम रक्तदान फरियाद करो ...
 
ऊर्जा पुंज तरुण भारत में, करो प्रवाहित रक्त सिरा। 
परहित में जो अर्पित होवे, स्वार्थ चाहे वह भक्त गिरा।।
कष्ट मिटे पीड़ित शिशुओं का, पथ इनका निष्कंटक हो। 
थैलीसीमिया मुक्त धरा से, साथी अन्तरमन तक हो।। 

अखिल सृष्टि के महायज्ञ में, आओ पुण्य निनाद करें..
रक्तदान है महादान हम, रक्तदान फरियाद करें... 

मशीन कोई बना न पाई, इस दीपक का तेल कभी। 
कुदरत ने सौंपा हमको, जीवन का यह खैल सभी।। 
उठो देश के वीर जवानों, तुमको आगे आना है। 
मुरझाये मासूम कलियों का, फिर किस्मत चमकाना है।। 

अल्प रक्त से मरे न कोई, ऐसा यंत्र ईजाद करें... 
रक्तदान है महादान हम, रक्तदान फरियाद करें... 

मासूमों की ऑंखों में जो, छुपी हुई एक आस दिखे। 
रक्त कमी से मुरझाया जो, कोमल सा एहसास दिखे।। 
उनकी सॉंसें थम न जाये, मिलजुल कर सब हाथ बढ़े। 
बूंद-बूंद से जीवन देकर, बुझे चेहरे चमक चढ़े।। 
जीते जी ना कर पाये क्या, मर जाने के बाद करें। 

रक्तदान है महादान हम, रक्तदान फरियाद करें... 

रक्तदान ही जीवन गंगा, पावन इसका नाम सुनो। 
मानवता की सच्ची सेवा, इसका सुन्दर काम सुनो।। 
बिना किसी भी भेदभाव के, नस नस में नव प्राण  भरे। 
परम पुनीत पावन यज्ञ में, अब अमर योगदान करें।। 

थैलीसीमिया अंधियारा, अभी दूर और आज करें... 
रक्तदान है महादान हम, रक्तदान फरियाद करें... 

समरसता का भाव जगाऊँ, मैंने भी यह मान लिया। 
पीड़ित जन के आँसू पोंछूँ, मैंने यह प्रण ठान लिया।। 
गॉंव गली शहरों चौबारों, यह नारा अब गूंजेगा। 
रक्तदान ही धर्म हमारा, पीड़ित दुख सब भूलेगा।। 

समरसता की इस वेदी पर, स्वर्गिक सुख ऐलान करें। 
रक्तदान है महादान हम, रक्तदान फरियाद करें।। 
डॉ.अशोक आकाश
 ंेंंेंेंंंेंंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेंंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेंंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेंंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेंंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेंंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेंंेेंंंेंंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेंंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेंंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेंेंंेंंेंेंंंेंंेंेंेंेंंंेेंेेंेंेंंंेेंेंेंंेंेंंंेंंेंें

Thursday, May 21, 2026

छत्तीसगढ़ी कहानी - रानीगंज के ममता सदन

*​रानीगंज के ममता सदन*

       ​महानदी के तीर म बसे रानीगंज गाँव अपन आप म संस्कृति के एक धरोहर रीहिस। इहाँ के हरियर खेत अउ पक्का सड़क मनखे के मन मोह लेवय। ये गाँव के बीचों-बीच एक विशाल अउ जुन्ना हवेलीनुमा घर रहिस, जेकर बाहरी दीवार म बड़-बड़ आखर म लिखाय रहिस- 'ममता सदन'।
​'ममता सदन' के मुखिया रहिन पंडित विश्वनाथ शर्मा। विश्वनाथ जी अउ ओकर पत्नी शांता बाई बर ये घर सिर्फ ईंटा-पथरा के ढाँचा नहीं, बल्कि ओकर पुरखा मन के तपस्या अउ मान-मर्यादा के प्रतीक रीहिस। शर्मा परिवार के पूरे इलाका म अतका इज्जत रहिस कि कोनो भी विवाद होय, मनखे मन विश्वनाथ जी करा न्याय बर आवय। फेर विडंबना देखव, जऊन सियान पूरा गाँव के झगरा सुलझाय, आज ओकर खुद के घर भीतर 'अहंकार' अउ 'चुप्पी' के अइसे लड़ाई शुरू होगे रिहिस, जेकर कोनो समाधान ओला नइ सूझत रिहिस।

      ​विश्वनाथ जी के बेटा रविन्द्र, सहर म एक बड़े बैंक म मैनेजर रिहिस, अउ ओकर बहू प्रियंका गाँव के सरकारी स्कूल म प्रधान पाठिका। दूनों शिक्षित रहिन, गुणी रहिन, फेर समय के कमी अउ काम के बोझ ह ओखर मया ला कड़वाहट म बदल डारे रहिस। अहम् के टकराव हा बड़े बड़े घर ला बिखेर के छिहीं-बिहीं कर देथे, रानीगंज के ममता निवास में छोटे-छोटे बात जैसे- भोजन में नून हरदी कम होना या नाती अर्पण के पढ़ाई, विवाद के बड़े कारण बन जाय। आठ साल के नाती अर्पण ये सब देख के सहम जाय।
             ​एक संझा जब सुरुज डूबत रहिस, रसोई ले प्रियंका अउ रविन्द्र के बहस के अवाज बाहिर तक आये लगिस। अर्पण डर के मारे अपन दादा विश्वनाथ जी करा गिस, जऊन बाहिर बरामदा म बइठ के तुलसी में दीया बारके देखत रहिन।
अर्पण: "दादाजी, दाई-ददा फेर लड़त हें? का हमर घर टूट जाही?"
​विश्वनाथ जी के अंतस पीरा ले भरगे। ओ अर्पण ला अपन गोदी म बइठाइन अउ कहिन, "नहीं बाबू, घर ईंटा-पथरा के नइ होय, घर मनखे मन के मया ले बनथे। कभू-कभू बादल आ जाथे, फेर सुरुज के अंजोर ओला हटा देते।"
​आगू दिन, विश्वनाथ जी रविन्द्र अउ प्रियंका ला अपन करा बुलाइन। ओ कहिन, "देखव बेटा, मैं चाहत हँव कि आज हम घर ले कुछ अइसे जुन्ना चीज ला निकालन जऊन मन म कड़वाहट भरथे।"
​रविन्द्र अपन स्टडी रूम ले एक ठन टूटे गोड़ वाले कुर्सी ला निकालिस, ये कुर्सी ओला अपन संघर्ष के दिन में भागदौड़ करत खानी गिरे ले टूटे गोड़ के सुरता देवावत रीहिस। अउ प्रियंका रसोई ले एक ठन फूलकॉंस के जुन्ना लोटा निकालिस, जेकर पेंदा म छेदा रीहिस, जेन म भराय पानी ओला अपन कमजोर होवत रिश्ता के पेंदा के छेदा डाहर ले बोहावत मया के धार बरोबर लागे । विश्वनाथ जी मुस्कुरावत किहिन, "रवि, तैं ये कुर्सी ला बढ़ई करा बनवा के ले आन। अउ प्रियंका, तैं ये लोटा ला कसेर करा लेगके टपरवा के आन।"
​जब दूनों चीज सुधर के आ गे, त विश्वनाथ जी दूनों ला पास बइठा के समझाइन:-​"बेटा, जब ये कुर्सी टूटिस त ओला फेंके के बजाय हमन ओला सुधार के फेर उपयोगी बना लीन। उही बात रिश्ता के घलो हे। आज-कल मनखे मन रिश्ता म दरार आते साथ ओला तोड़ देथें, फेर असली समझदारी ओला टपरे म हे। रिश्ता ला सुधारे बर 'अहंकार' ला झुकना पड़थे अउ 'मया' ला सामने लाना पड़थे। जीवन के सफर लम्बा हे बेटा, अगर लड़त रहिबो त ये डोंगा बीच मझधार म बूड़ जाही।"
​ये बात सुन के रविन्द्र अउ प्रियंका के आँखी खुलगे, नवा शुरुआत करे बर ओ मन मिल के एक बड़े डाइनिंग टेबल अउ एक सुग्घर झूमर बिसा के आनिन। डाइनिंग टेबल ए बर, ताकि पूरा परिवार फेर एक संग बइठ के खाना खाय, अउ झूमर ए बर, ताकि घर के अंधियारी कोना म फेर मया के अंजोर आ जाय।
​अब 'ममता सदन' म फेर हँसी-खुशी गूँजे लगिस। उही फूलकॉंस के लोटा म सब झन पानी पीयँ अउ उही कुर्सी म बइठ के विश्वनाथ जी अपन नाती ला संस्कार के कहानी सुनावय।
एक दिन अर्पण ला अपन गोदी म बइठा के विश्वनाथ जी कहिन: "देख बेटा, समझदारी उही हे जऊन टूटे ला जोड़ दे। 'मया के टपरन' ही कोनो घर ला स्वर्ग बना सकथे।" अब रानीगंज के वो ममता सदन में सुम्मत के किलकारी फिर से गूंजत रीहिस।
 ​धैर्य अउ संयम ला भुला के, रिश्ता तोड़ना आसान हे, जोड़ना मुश्किल होथे, कोनो भी मुश्किल हल करे के कोशिश ले ही समाधान के दिशा पाथे, अउ कोनो अनबोलना संगी संग बात करे ले ही बात बनथे। घर के सियान मन अनुभव के उही झूमर बरोबर हें, जऊन अंधियार म रद्दा देखाथें।
        ०००
डॉ.अशोक आकाश