Wednesday, January 7, 2026

धरती के शृंगार का पर्व -हरेली

धरती के श्रृंगार एवं छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति का संवाहक पर्व - हरेली

    छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति में पर्वों की बड़ी महत्ता है, यहॉं बारहों महीने तरह-तरह के तीज त्यौहारों का प्रचलन है। सभी त्यौहारों में हरेली धरती के सिंगार का महत्वपूर्ण पर्व है छत्तीसगढ़ के सभी पर्व खेती किसानी से संबंधित उत्सव है। हरेली तिहार को हम हरियाली के नाम से भी जानते हैं ।  छत्तीसगढी संस्कृति के संवाहक पर्व के रूप में हरेली तिहार को जाना जाता है। छत्तीसगढ़ अपनी दो विशेषताओं के लिये विख्यात है, पहला कृषि दूसरा पर्व इस तरह - यहाँ पर जितने भी त्यौहार मनाए जाते हैं उनमें लोक मान्यता एवं परंपराएँ बहुतायत पाई जाती है। हरेली त्यौहार छत्तीसगढ़ी लोक-जीवन को अभिसिंचित करने - वाला त्यौहार है। ज्येष्ठ माह में ग्रीष्म की भीषण तपन सहकर अक्षय तृतीया के साथ छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक पर्व का शुभारंभ होता है। छत्तीसगढ़ी संस्कृति में खेती किसानी से संबंधित यह प्रथम त्यौहार है जब किसान विधि विधान से खेतों में बीजारोपण करता है और वर्षा के बाद अंकुर पश्चात धरती हरियाली से भर जाती है खेत में धान की फसल लहलहा उठती है। धान के पौधे परिपुष्ट होने लगते हैं तब किसान खेतों की हरियाली देख झूम उठता है ऐसे समय में सावन महीने की अमावस्या का आगमन होता है। इसी दिन को हम हरेली अमावस्या के नाम से जानते हैं। 
       इस साल यह त्योहार 28 जुलाई को मनाया जाएगा, इस दिन किसान सूयोदय से पूर्व गोधन के लिए विशेष प्रकार का असगंद कांदा एवं धामन कांदा के साथ गेहूं आटे की लोई पशुधन को खिलाया जाता है इसके पीछे पशुधन को वर्षाजनित व्याधि से छुटकारा का लक्ष्य होता है। खुशियों भरे वातावरण में घर कोठा की सफाई कर आंगन में मुरुम या रेत पर नांगर, गैंती, रांपा कुदाली, हंसिया, टंगिया, बसुला, बिंधना, आरी, पटासी, साबर, चटवार आदि कृषि औजारों तो व्यवस्थित रखकर गौरी गणेश स्थापित कर सुपारी, हल्दी, बंदन, दीपक जलाकर चावल आटा से सभी कृषि यंत्र एवं औजारों पर घर की सुहागन महिला हाथा देकर उसमें कुमकुम हल्दी लगाती है। पूजन में घर के सभी लोग पूरी आस्था से शामिल होते हैं। गुड मिश्रित चावल के आटे की चीला का भोग लगाकर नारियल तोड़ हवन देकर कच्चा नारियल और चीला का प्रसाद बाँटा जाता है। 
    
         बच्चे एवं युवा बाँस की गेंड़ी बना उस पर गलियों में चलने का आनंद लेते है। भोजन के पश्चात गाँव के चौक चौराहों में उत्सव का आयोजन किया जाता है जिसमें गेड़ी दौड़, बैल दौड़ रस्सी खींच, मटका फोड़, नारियल फेंक, कबड्डी खेल एवं डंडा नृत्य सुवा गीत के आयोजन से हरियाली त्यौहार के उत्सव का रंग देखते ही बनता है। संध्या गांव में अक्सर रामचरितमानस पाठ गायन से ग्रामीण जन की आस्था में वृद्धि करने वाला यह प्राचीन पर्व आस्थावान समाज निर्माण की दिशा में आदर्श स्थापित करता है। धरती की हरीतिम आभा से उत्साहित किसानों के इस पर्व का उत्साह देखते ही बनता है। छत्तीसगढ़ राज्य शासन द्वारा इस त्यौहार पर शासकीय आयोजन के माध्यम से गोधन की महत्ता प्रतिपादित होती है। कृषि आधारित इस पर्व से प्रकृति के प्रति छत्तीसगढ़ के पारम्परिक प्रेम से कृषि का आधार मजबूत होता है। छत्तीसगढ़ जन संस्कृति में दो तरह की विचाधारा के लोग निवास करते हैं पहला सत्ताहा दूसरा कबीरहा, जो देवता को मानते हैं उन्हे सत्ताहा कहा जाता है और जो कबीर को मानते हैं उन्हें कबीरहा कहा जाता है। कबीर पंथ को मानने वाले सत्य अहिंसा के पथगामी होते हैं इस पंथ में अधिकतम मानिकपुरी और साहू समाज के लोगों की बहुलता है। 

         जब से छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण हुआ है हर वर्ष हरेली तिहार को सरकारी उत्सव का रंग चढ़ता है । हर साल छत्तीसगढ़ शासन द्वारा बड़े बड़े आयोजन की तैयारी की जाती है। इस दिन बच्चे बड़े ही उल्लास स्कूलों में इस दिन गेड़ी नृत्य प्रतियोगिता का आयोजन किया जाएगा।देवता को मानने वाले परिवारों में अपने देवों को खुश करने इस दिन बलि प्रथा का प्रचलन है ऐसे परिवार जो अपने इष्ट देव की भी पूजा करते हैं और उन्हें खुश करने विशेष पूजा की जाती है। हमारे छत्तीसगढ़ में कबीर का बहुत बड़ा प्रभाव है, संत धमर्दास छत्तीसगढ़ के बहुत बड़े कबीर पंथ के संत हुए उनका प्रभाव भी हमारे छत्तीसगढ़ में पड़ा है, इनके अनुयायी अपने देवों को सेत यानी नारियल सेग मना लेते हैं। तंत्र मंत्र पर बहुतायत बहुतायत लोग विश्वास नहीं करते, इसे अंधविश्वास कहकर उपहास  उड़ाया जाता है लेकिन हरेली तिहार तांत्रिक साधना पर्व के रूप में भी विख्यात है। इस दिन तन्त्र साधकों की टोली तन्त्र साधना करते हैं। कुल मिलाकर हमारे छत्तीसगढ़ का यह पर्व जन जन में लोक संस्कृति के संवाहक पर्व के रूप में विख्यात है।

डॉ.अशोक आकाश
वरिष्ठ साहित्यकार
बालोद

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