हृदय-नाद:- मॉं भारती राष्ट्र परिक्रमा
(छत्तीसगढ़ के हृदय-स्थल से संपूर्ण भारत की परिक्रमा)
मंगलाचरण एवं सनातन वैभव (मनहरण घनाक्षरी)
१.
आदि और अंतहीन, दिव्य शक्ति रूपिणी माँ,
तेरी कीर्ति सनातन, विश्व का विधान है।
ऋषियों की तप-स्थली, वेदों की पावन वाणी,
सर्व धर्म समभाव, तेरा ही वरदान है।
बुद्ध की अहिंसा और, नानक की गुरु-वाणी,
कण-कण माटी यहाँ, गौरव-विमान है।
सत्य-अहिंसा का मार्ग, तूने ही दिखाया जग,
तेरी उज्वलता से ही, ऊँचा ये जहान है।
२.
हृदय-प्रदेश माँ का, छत्तीसगढ़ धाम सोहे,
यहीं से अखंड रूप, होता द्योतमान है।
राम के ननिहाल से, अंग-अंग वंदना हो,
शीश पे हिमालय माँ, गरिमा की शान है।
भुजाएँ बनी हैं दो-दो, पूर्व और पश्चिम की,
चरणों में रत्नाकर, करता प्रणाम है।
दक्षिण का अंचल ये, भक्ति-रस सराबोर,
अंग-अंग तेरा माँ! भारत ये नाम है।
हृदय-स्थल की महत्ता
३.
हृदय के कमल से, वंदना मैं करूँ तेरी,
छत्तीसगढ़ धाम जहाँ, कीर्ति का वितान है।
कौशल्या की गोद खेलें, राम प्रभु अवतारी,
धान का कटोरा यह, सुयश की खान है।
अरपा औ’ पैरी धार, वंदन पखारें तेरा,
महतारी रूप यहाँ, भक्ति का विधान है।
सत्य और न्याय की, धरा यह पुनीत माई,
यहीं से अखंड राष्ट्र, का होता गान है।
पूर्वी भुजा (पूर्वोत्तर और पूर्व)
४.
उगे भानु पूर्व में जहाँ, अरुणाचल धन्य,
नागालैंड की धरा, अनुपम महान है।
असम की चाय महके, मेघालय मेघ-घर,
मणिपुर मिज़ोरम, सुरभि समान है।
त्रिपुरा की शक्ति पीठ, वंग-कला न्यारी माँ,
उत्कल के तट गूँजे, शंख का ही तान है।
झारखंड वन-प्रांतर, बिहार ज्ञान-भूमि,
पौरुष अपार जहाँ, शौर्य का निशान है।
भाल और मुकुट (उत्तर भारत)
५.
हिमगिरि भाल तेरा, मुकुट अनूप सोहे,
गंगा-यमु-धार जैसे, मोती की ही हार है।
ऋषि-मुनि देव-भूमि, उत्तराखंड पावन,
उत्तर प्रदेश जहाँ, प्रेम का अपार है।
सिखाती मर्यादा राम, कृष्ण का संदेश जहाँ,
ब्रज की पुनीत रज, स्वर्ग का द्वार है।
कश्मीर शीश रत्न, डल झील शोभा भरे,
माँ भारती का रूप, सबसे निराकार है।
६.
वीर-प्रसू हरियाणा, गीता का उपदेश जहाँ,
पार्थ का रथ हांकते, स्वयं भगवान हैं।
कुरुक्षेत्र की वह माटी, त्याग और तप वाली,
खिलाड़ी और जवानों का, अमित सम्मान है।
हिमाचल देव-कुंज, धौलाधार की ही ओट,
शिव के निवास से ही, धन्य ये जहान है।
पर्वत की कंदरा में, गूँजता है ऊँ-कार,
शांति और शक्ति का, अनूठा वरदान है।
पश्चिमी भुजा और मध्य-काया
७.
वीर-रस धार बहे, पंज-नद वीरों की,
राजपुती आन लिए, मरुधरा लाल है।
शौर्य की कहानी कहे, महाकाल मध्य बीच,
उज्जैनी की पुण्य प्रभा, काल का भी काल है।
महारानी झाँसी और, शिवाजी के दुर्ग यहाँ,
महाराष्ट्र तेज पुंज, गौरव विशाल है।
गुर्जर धरा पे सोहे, सोमनाथ ज्योति पुंज,
भक्ति और शक्ति का, अनूठा ये हाल है।
८.
गोवा का सुरम्य तट, मांडवी की लहरें जहाँ,
सागर की गोद में ही, सुखद विलास है।
अंडमान-निकोबार, सावरकर की तपस्या,
दमन-दीव लक्षद्वीप, गौरव-प्रकाश है।
कच्छ से कामरूप तक, कश्मीर से कन्या,
एक ही अखंड ज्योति, एकता की प्यास है।
विविधता में एकता का, विश्व को संदेश दे जो,
भारत ये माँ हमारी, अमर विश्वास है।
दक्षिणापथ और सागर-चरण
९.
कर्नाटक चंदन की, गंध मंद फैल रही,
आंध्रा-तेलंगाना जहाँ, वैभव का सार है।
केरल की हरियाली, तमिल की भक्ति-शक्ति,
संस्कृति की सरिता का, बहता बयार है।
सागर उताल तरंग, पखारे चरण तव,
रत्नगर्भा अंबिका का, सुखद संसार है।
सेतुबंध राम का, अखंडता का सूत्र यहाँ,
एक प्राण एक राष्ट्र, प्रेम का आधार है।
उपसंहार
१०.
विविध प्रदेश वेश, भाषा और बोली माँ,
किंतु एक सूत्र पिरो, राष्ट्र-माला धार है।
कोटि-कोटि कंठ यहाँ, जय-जयकार करें,
लोक-तंत्र दीप जला, तिमिर का पार है।
हृदय से नमन तुझे, भारती ओ विश्व-गुरु,
तेरी जय पताका झुके, सारा ये संसार है।
अमर सुहाग तेरा, अटल रहे ये धरा,
अर्पित तुझे ही माँ! ये जीवन का भार है।
डॉ.अशोक आकाश
कोहंगाटोला बालोद
9755889199
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