*रानीगंज के ममता सदन*
महानदी के तीर म बसे रानीगंज गाँव अपन आप म संस्कृति के एक धरोहर रीहिस। इहाँ के हरियर खेत अउ पक्का सड़क मनखे के मन मोह लेवय। ये गाँव के बीचों-बीच एक विशाल अउ जुन्ना हवेलीनुमा घर रहिस, जेकर बाहरी दीवार म बड़-बड़ आखर म लिखाय रहिस- 'ममता सदन'।
'ममता सदन' के मुखिया रहिन पंडित विश्वनाथ शर्मा। विश्वनाथ जी अउ ओकर पत्नी शांता बाई बर ये घर सिर्फ ईंटा-पथरा के ढाँचा नहीं, बल्कि ओकर पुरखा मन के तपस्या अउ मान-मर्यादा के प्रतीक रीहिस। शर्मा परिवार के पूरे इलाका म अतका इज्जत रहिस कि कोनो भी विवाद होय, मनखे मन विश्वनाथ जी करा न्याय बर आवय। फेर विडंबना देखव, जऊन सियान पूरा गाँव के झगरा सुलझाय, आज ओकर खुद के घर भीतर 'अहंकार' अउ 'चुप्पी' के अइसे लड़ाई शुरू होगे रिहिस, जेकर कोनो समाधान ओला नइ सूझत रिहिस।
विश्वनाथ जी के बेटा रविन्द्र, सहर म एक बड़े बैंक म मैनेजर रिहिस, अउ ओकर बहू प्रियंका गाँव के सरकारी स्कूल म प्रधान पाठिका। दूनों शिक्षित रहिन, गुणी रहिन, फेर समय के कमी अउ काम के बोझ ह ओखर मया ला कड़वाहट म बदल डारे रहिस। अहम् के टकराव हा बड़े बड़े घर ला बिखेर के छिहीं-बिहीं कर देथे, रानीगंज के ममता निवास में छोटे-छोटे बात जैसे- भोजन में नून हरदी कम होना या नाती अर्पण के पढ़ाई, विवाद के बड़े कारण बन जाय। आठ साल के नाती अर्पण ये सब देख के सहम जाय।
एक संझा जब सुरुज डूबत रहिस, रसोई ले प्रियंका अउ रविन्द्र के बहस के अवाज बाहिर तक आये लगिस। अर्पण डर के मारे अपन दादा विश्वनाथ जी करा गिस, जऊन बाहिर बरामदा म बइठ के तुलसी में दीया बारके देखत रहिन।
अर्पण: "दादाजी, दाई-ददा फेर लड़त हें? का हमर घर टूट जाही?"
विश्वनाथ जी के अंतस पीरा ले भरगे। ओ अर्पण ला अपन गोदी म बइठाइन अउ कहिन, "नहीं बाबू, घर ईंटा-पथरा के नइ होय, घर मनखे मन के मया ले बनथे। कभू-कभू बादल आ जाथे, फेर सुरुज के अंजोर ओला हटा देते।"
आगू दिन, विश्वनाथ जी रविन्द्र अउ प्रियंका ला अपन करा बुलाइन। ओ कहिन, "देखव बेटा, मैं चाहत हँव कि आज हम घर ले कुछ अइसे जुन्ना चीज ला निकालन जऊन मन म कड़वाहट भरथे।"
रविन्द्र अपन स्टडी रूम ले एक ठन टूटे गोड़ वाले कुर्सी ला निकालिस, ये कुर्सी ओला अपन संघर्ष के दिन में भागदौड़ करत खानी गिरे ले टूटे गोड़ के सुरता देवावत रीहिस। अउ प्रियंका रसोई ले एक ठन फूलकॉंस के जुन्ना लोटा निकालिस, जेकर पेंदा म छेदा रीहिस, जेन म भराय पानी ओला अपन कमजोर होवत रिश्ता के पेंदा के छेदा डाहर ले बोहावत मया के धार बरोबर लागे । विश्वनाथ जी मुस्कुरावत किहिन, "रवि, तैं ये कुर्सी ला बढ़ई करा बनवा के ले आन। अउ प्रियंका, तैं ये लोटा ला कसेर करा लेगके टपरवा के आन।"
जब दूनों चीज सुधर के आ गे, त विश्वनाथ जी दूनों ला पास बइठा के समझाइन:-"बेटा, जब ये कुर्सी टूटिस त ओला फेंके के बजाय हमन ओला सुधार के फेर उपयोगी बना लीन। उही बात रिश्ता के घलो हे। आज-कल मनखे मन रिश्ता म दरार आते साथ ओला तोड़ देथें, फेर असली समझदारी ओला टपरे म हे। रिश्ता ला सुधारे बर 'अहंकार' ला झुकना पड़थे अउ 'मया' ला सामने लाना पड़थे। जीवन के सफर लम्बा हे बेटा, अगर लड़त रहिबो त ये डोंगा बीच मझधार म बूड़ जाही।"
ये बात सुन के रविन्द्र अउ प्रियंका के आँखी खुलगे, नवा शुरुआत करे बर ओ मन मिल के एक बड़े डाइनिंग टेबल अउ एक सुग्घर झूमर बिसा के आनिन। डाइनिंग टेबल ए बर, ताकि पूरा परिवार फेर एक संग बइठ के खाना खाय, अउ झूमर ए बर, ताकि घर के अंधियारी कोना म फेर मया के अंजोर आ जाय।
अब 'ममता सदन' म फेर हँसी-खुशी गूँजे लगिस। उही फूलकॉंस के लोटा म सब झन पानी पीयँ अउ उही कुर्सी म बइठ के विश्वनाथ जी अपन नाती ला संस्कार के कहानी सुनावय।
एक दिन अर्पण ला अपन गोदी म बइठा के विश्वनाथ जी कहिन: "देख बेटा, समझदारी उही हे जऊन टूटे ला जोड़ दे। 'मया के टपरन' ही कोनो घर ला स्वर्ग बना सकथे।" अब रानीगंज के वो ममता सदन में सुम्मत के किलकारी फिर से गूंजत रीहिस।
धैर्य अउ संयम ला भुला के, रिश्ता तोड़ना आसान हे, जोड़ना मुश्किल होथे, कोनो भी मुश्किल हल करे के कोशिश ले ही समाधान के दिशा पाथे, अउ कोनो अनबोलना संगी संग बात करे ले ही बात बनथे। घर के सियान मन अनुभव के उही झूमर बरोबर हें, जऊन अंधियार म रद्दा देखाथें।
०००
डॉ.अशोक आकाश
No comments:
Post a Comment